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Khela Hobe kya hai/Meaning of Khela Hobe in Hindi/What does khela hobe means in Hindi/‘खेला हौबे’-कहीं लोकतंत्र का खेल ना हो जाये

Khela Hobe kya hai/Meaning of Khela Hobe in Hindi/What does khela hobe means in Hindi/‘खेला हौबे’-कहीं लोकतंत्र का खेल ना हो जाये

 

‘खेला हौबे’-कहीं लोकतंत्र का खेल ना हो जाये

-ललित गर्ग-

पांच राज्यों में विधानसभा के लिए सिंहासन की लड़ाई जारी है, धमासान छिड़ा हुआ है। लेकिन सर्वाधिक चर्चा में पश्चिम बंगाल है, भारतीय जनता पार्टी ने सारी ताकत पश्चिम बंगाल में लगा रखी है, उसी कारण तृणमूल कांग्रेस एवं उसकी नेता ममता बनर्जी के लिये यह चुनाव बड़ी चुनौती बना हुआ है। प्रश्न है कि पश्चिम बंगाल ही क्यों महत्वपूर्ण बना हुआ है? क्या देश की राजनीति में अन्य चार प्रदेश कोई महत्व नहीं रखते? क्यों पश्चिम बंगाल चुनाव का महासंग्राम बना हुआ है? इस महासंग्राम की विडम्बना यह है कि इसमें जनता से जुड़े मुद्दों की अनदेखी हो रही है। त्रासदी बने है चुनावी परिदृश्य, जिसमें राजनीतिक दल एक-दूसरे को परास्त करने में जुटे हैं, नेता या तो अतिरंजित आरोप लगा रहे हैं या ऐसे कौतुक रच रहे हैं, जिनसे उनके करतब वायरल हो जाएं, चुनाव जीतने का हथियान बन जाये। इन स्थितियों में बीच आम मतदाता कोरा तमाशबीन बना हुआ है, न केवल मतदाता बल्कि लोकतंत्र भी तमाशा बन गया है। तृणमूल ने नारा दिया है- ‘खेला हौबे’ यानी खेल होगा। भाजपा भी बिना देर किए इस नारे को ले उड़ी। अब कांग्रेस और वाम के कार्यकर्ता भी इसे दोहरा रहे हैं। जिस तरह से मतदाता को भरमाने की प्रवृत्ति पांव पसार रही है, उससे आशंका उपजनी स्वाभाविक है कि कहीं हमारे लोकतंत्र के साथ तो खेल नहीं होने जा रहा?

Khela Hobe kya hai/Meaning of Khela Hobe in Hindi/What does khela hobe means in Hindi/‘खेला हौबे’-कहीं लोकतंत्र का खेल ना हो जाये


पश्चिम बंगाल का दुर्भाग्य है कि यहां के चुनावी संग्राम में आए दिन नए विवादों की आग जलाई जाती है। राजनीतिक दल इन फुंके हुए अलावों पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकने की कोशिश करते हैं। इस आघातकारी एवं लोकतांत्रिक हनन के सिलसिले को कब तक होने दिया जायेगा। भाजपा किसी भी कीमत पर इस प्रदेश को अपनी झोली में डाल लेना चाहती है और ममता बनर्जी सुई की नोक भी न देने की तर्ज पर जी-जान लड़ाए हुई हैं। इस खेल में कोई कम नहीं है, इसलिए हर बार एक नये घटनाक्रम रचे जाते हंै, चुनावी मुद्दे गढ़े जाते हैं। शोर है, चर्चा है, पर तथ्य और तर्क शिथिल हैं।

तृणमूल कांग्रेस एवं भाजपा के इस घमासान में दोनों ही मतदाता को लुभाने, गुमराह करने एवं सपने दिखाने में जुटेे हैं, एक बार फिर मतदाता ठगा जायेगा। इसलिये अपेक्षा है इन विडम्बनापूर्ण स्थितियों के बीच मतदाता को जागरूक होने की। पांच राज्य और विशेषतः पश्चिम बंगाल के चुनाव में मतदाता स्वयं को इतने सशक्त रूप में प्रस्तुत करें कि राजनीतिक दल चुनावों में उसकी अनदेखी करने का दुस्साहस न कर सके। यहां तक कि मतदाता को लुभाने की कोशिशें और उसे भरमाने के प्रयासों से भी राजनैतिक दल उपरत हों, यही वर्तमान की सबसे बड़ी अपेक्षा और एक सशक्त लोकतांत्रिक संदेश है।

पश्चिम बंगाल ही क्यों चर्चा में है, वहां की समस्याएं ही इतनी बड़ी कैसे हो गयी? असम में भी तो वे सारी समस्याएं मौजूद हैं, पर वहां ऐसा हंगामा बरपा नहीं है। असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी की समस्याएं भी ज्वलंत हैं, लेकिन तकलीफदेह स्थिति तो यह है कि इन राज्यों से गंभीर मुद्दे नदारद हैं। क्या तमिलनाडु में दंड लगाते राहुल गांधी और असम में स्थानीय महिलाओं के साथ थिरकती प्रियंका की तस्वीरों के साथ शीर्ष भाजपा नेताओं की किसानों या दलितों के यहां भोजन की तस्वीरों में ही चुनावी महासंग्राम का हश्र होना है? क्या इससे किसानों की दशा सुधर जाएगी, दलित मुख्यधारा का हिस्सा बन जाएंगे, महिलाओं के हालात बदल जाएंगे और कुपोषण के मारे इस देश के अधिकांश लोग दंड-बैठक लगाने लायक हो जाएंगे? ऐसे तमाम प्रश्न हैं, जो चुनाव-दर-चुनाव उत्तर हासिल करने के लिए छटपटाते रहते हैं। इन सवालों में ही चुनावों के महासंग्राम बन जाने की दर्दनाक दास्तान छिपी हुई है। समय आ गया है, जब संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र खुद को पारदर्शी बनाने की पहल करे।

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जनतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण पहलू चुनाव है। यह राष्ट्रीय चरित्र का प्रतिबिम्ब है। जनतंत्र में स्वस्थ मूल्यों को बनाये रखने के लिए चुनाव की स्वस्थता और उसमें आम मतदाता की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है। राजनीतिक दलों से पहले मतदाता को जागना होगा। सभी राजनीतिक दल तो अपने घोषणा-पत्र प्रकाशित करते हैं- जनता को पांच वर्षों में अमीर बना देंगे, हर हाथ को काम मिलेगा, सभी के लिए मकान होंगे, सड़कें, स्कूल-अस्पताल होंगे, बिजली और पानी होगा। जनता मीठे स्वप्न लेती रहती है। कितने ही पंचवर्षीय चुनाव हो गये और कितनी ही पंचवर्षीय योजनाएं पूरी हो गईं पर यह दुनिया का आठवां आश्चर्य है कि कोई भी लक्ष्य अपनी समग्रता के साथ प्राप्त नहीं हुआ। मतदाता हर बार ठगा गया, भरमाया गया। फिर भी उसकी आंखें क्यों नहीं खुलती?

आज नारों और नोटों से चुनावी लड़ाई लड़ी जा रही है, चुनाव लड़े जा रहे हैं- सत्ता प्राप्ति के लिए। जो जितना लुभावना नारा दे सके, जो जितना धन व्यय कर सके, वही आज मतदाता को भरमा सकता है। वर्तमान चुनावी माहौल में लोकतंत्र की कराह साफ-साफ सुनाई दे रही है। यह वक्त राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों को कोसने की बजाय मतदाताओं के जागने का है। आज मतदाता विवेक से कम, सहज वृति से ज्यादा परिचालित हो रहा है। इसका अभिप्रायः यह है कि मतदाता को लोकतंत्र का प्रशिक्षण बिल्कुल नहीं हुआ। सबसेे बड़ी जरूरत है कि मतदाता जागे, उसे लोकतंत्र का प्रशिक्षण मिले। हमें किसी पार्टी विशेष का विकल्प नहीं खोजना है। किसी व्यक्ति विशेष का विकल्प नहीं खोजना है। विकल्प तो खोजना है भ्रष्टाचार का, अकुशलता का, प्रदूषण का, भीड़तंत्र का, गरीबी के सन्नाटे का, महंगाई का, राजनीतिक अपराधों का। यह सब लम्बे समय तक त्याग, परिश्रम और संघर्ष से ही सम्भव है।

पांच राज्यों के चुनावों में मतदाता जागना होगा। उसे ही कमर कसनी होगी। उसे चुनावी महायज्ञ में अपनी राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का अघ्र्य चढ़ाना होगा। पर क्या हम इसके लिये तैयार हैं? अथवा कोई तैयारी कर रहे हैं? राजनीतिक जोड़तोड़ और रेवड़ियां बांटने के खेल राजनीतिक दलों को ही मुबारक हों, लेकिन मतदाता की जागरूकता ही राष्ट्र को और लोकतंत्र को शुद्ध सांसे दे सकती है और इसके लिये व्यूह-रचना तो मतदाता को भी करनी होगी। मेरा वोट किसी को क्यों मिले? जिसे मैंने वोट दिया था, क्या वह मेरी अपेक्षाओं पर खरा उतरा है? वोट देने के मेरे निर्णय को गलत बातों ने तो प्रभावित नहीं किया था? जिसे मैंने वोट नहीं दिया था, क्या उसने अपनी कमियों को दूर करने की कोई कोशिश की है? ये और ऐसे अनेक सवाल हैं, जो मतदाता को लगातार खुद से पूछने होंगे। हमारा दुर्भाग्य यह है कि मतदाता की उदासीनता और उपेक्षा राजनीतिक भ्रष्टाचार एवं अपराधीकरण का सबसे बड़ा कारण है। मतदाता को सोचना होगा कि अपराधी हमारा वोट कैसे पा लेते हैं? राष्ट्र की धन-सम्पदा से खिलवाड़ करने वाले भ्रष्टाचारी हमारे आदर्श कैसे बन जाते है? क्यों हम भ्रष्टाचारियों, अवसरवादियों और अपराधियों को वोट देते हैं और फिर वे हम पर राज करते हैं? हम इन स्थितियों को चुपचाप स्वीकार किए रहते हैं। लेकिन आखिर कब तक? कब तक हम ठगे जाते रहेंगे? कब तक मूक दर्शक बनकर राष्ट्र को लूटता हुआ देखते रहेंगे?
सच बात तो यह है कि मतदाता का काम सिर्फ विवेकपूर्ण ढंग से वोट देना ही नहीं होता, इस बात की लगातार जांच करते रहना भी होता है कि उसके वोट का सही उपयोग हो रहा है या नहीं। सवाल राजनीतिक दलों के स्वार्थों का ही नहीं है, सवाल मतदाता के साथ अक्सर होने वाले विश्वासघात का है। और इस बात का भी है कि मतदाता स्वयं को जनतंत्र के योग्य बनाने के लिए क्या कर रहा है?  विकास के नाम पर लम्बे-चैड़े बजट के बावजूद क्यों सूखे के हालात, अशिक्षा, बेरोजगारी, कुपोषण की स्थिातियां देखनी पड़ती हैं? ऐसे सवालों का एक लम्बा सिलसिला मतदाता के दिमाग में उठना चाहिए। सवाल यह भी है कि राजनीतिक स्वार्थ अक्सर समाज और देश के हितों से बड़े क्यों हो जाते हैं? धृतराष्ट्र की आंखों में झांक कर देखने का प्रयास करेंगे तो वहां शून्य के सिवा कुछ भी नजर नहीं आयेगा। इसलिए हे मतदाता प्रभु! जागो! ऐसी रोशनी का अवतरण करो, जो दुर्योधनों के दुष्टों को नंगा करें और अर्जुन के नेक इरादों से जन-जन को प्रेरित करें।  प्रेषकः


 (ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

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