पर्यावरण संरक्षण में मिल का पत्थर साबित हो रहा है जल-जीवन-हरियाली अभियान


( विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून पर विशेष)

 पर्यावरण संरक्षण में मिल का पत्थर साबित हो रहा है जल-जीवन-हरियाली अभियान

 मुरली मनोहर श्रीवास्तव

 पिछले कुछ दिनों से पूरे विश्व में कोविड-19 के रुप में आयी  महामारी मानव जाति के लिए एक बड़ी चुनौती के रुप में सामने आयी है। मानव से मानव में फैलने वाली कोरोना संक्रमण वैश्विक महामारी के रुप में सबके सामने एक चुनौती लेकर आयी है। तकनीक, आविष्कार, मेडिकल रिसर्च जैसे तमाम बड़े-बड़े कार्य अनेक क्षेत्रों में किए जा रहे हैं बावजूद इसके मनुष्य के सामने इस आपदा से बाहर निकलना सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। 

  औद्योगिक क्रांति के बाद विकास की अंधी दौड़ से पृथ्वी पर प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ने लगा। इसको देखते हुए पर्यावरण संरक्षण पर वैश्विक मंथन की भी शुरुआत हुई। लोगों को जागरुक करने के लिए, पहली बार 5 जून 1972 में विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। जबकि 5 जून 1974 को पर्यावरण दिवस मनाया गया, जिसमे 119 देशों ने पर्यावरण सम्मेलन में भाग लिया था और इसकी शुरुआत स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम से हुई थी। संयुक्त राष्ट्र द्वारा संचालित विश्व पर्यावरण दिवस दुनिया का सबसे बड़ा वार्षिक आयोजन है। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य प्रकृति की रक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाना और दिन प्रतिदिन बढ़ रहे पर्यावरणीय समस्याओं को देखना है। पर्यावरण संरक्षण के महत्व को समझाने के लिए समर्पित करने के लिए इस दिवस की शुरुआत हुई। पर्यावरण संरक्षण को लेकर हर स्तर पर प्रयास हो रहे हैं। पर्यावरणविद पर्यावरण से खिलवाड़ के बाद की जिस चुनौती की बात करते थे, आज सबके सामने हैं।

बिहार के मुख्यमंत्री ने पर्यावरण सुरक्षा को हमेशा प्राथमिकता में ऊपर रखा है। बिहार पर्यावरण संरक्षण के मामले में हमेशा प्रयत्नशील रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जल-जीवन-हरियाली अभियान की बड़े पैमाने पर शुरुआत की है। जल संरक्षण, हरित आवरण बढ़ाना, सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना तथा जीव-जंतुओं को संरक्षण देने के लिए इस अभियान में 11 अवयवों को शामिल किया गया है। मुख्यमंत्री ने जल-जीवन-हरियाली अभियान का मतलब समझाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि जल है, हरियाली है तभी जीवन है। चाहे वह जीवन मनुष्य का हो या पशु पक्षी का। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने पर्यावरण के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था कि पृथ्वी हमारी जरुरतों को पूरा करने में सक्षम है, लालच को नहीं। 
  जब से सृष्टि की उत्पति हुई है सभी धर्मों ने पर्यावरण को विशेष महत्व दिया है और इसे ही जीवन का मूल ऊर्जा स्त्रोत माना है। हिंदू धर्म में तो प्रकृति पूजन की परंपरा विशिष्ट है। बौद्ध धर्म का मानना है कि संसार के जीव-जंतु एवं वनस्पति आपस में सामाजिक रुप में परस्पर रुप से जुड़े हुए हैं। इस ग्रह पर मनुष्य की उपेक्षा जैव विविधता और प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र में ह्रास का मूल कारण है। बाइबल के अनुसार, प्रकृति का सम्मान और उन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए ताकि लोगों के साथ एक स्वस्थ्य संबंध स्थापित किया जा सके। वहीं इस्लाम का मानना है  मनुष्य द्वारा जानवरों या पौधों की किसी भी प्रजाति के पूर्ण विनाश को उचित नहीं ठहराया जा सकता है और न ही इसके प्राकृतिक उद्भव से अधिक हिसाब से कटाई की जानी चाहिए। श्रीगुरु ग्रंथ साहिब के अनुसार भगवान ने अपने प्रकाश से ब्रह्मांड का निर्माण किया। आकाश, पृथ्वी, वृक्ष और जल, ये सभी भगवान की रचना हैं। जबकि जैन धर्म में सम्मिश्रण को प्राकृतिक संसाधनों के लिए हथियार समझा जाता है। सांस लेने और बोलने के दौरान विभिन्न छोटे जीवों की हत्या न हो इसके लिए कई जैन धर्म के अनुयायी मास्क भी पहनते हैं। जो मास्क आज की तारीख में कोरोना संक्रमण से बचने के लिए पहनना जरूरी हो गया है।

  धर्मग्रंथ हों या फिर पर्यावरणविद सभी ने पर्यावरण सुरक्षा को अहम बताया है। बिहार में शुरु हुए जल-जीवन-हरियाली अभियान भविष्य में बिहार पर प्राकृतिक आपदा के खतरे को कम करेगा, इसी उद्देश्य से इस अभियान की शुरुआत की गई है। यह अभियान भावी पीढ़ी का जीवन सुरक्षित करने के लिए शुरू किया गया है। जल-जीवन-हरियाली अभियान पर तीन वर्षों में बिहार सरकार 24,524 करोड़ रुपए खर्च कर रही है और यह अभियान मिशन मोड में चलाया जा रहा है। लोगों में जागृति लाने के लिए जल-जीवन-हरियाली अभियान के लिए पूरे बिहार में जागरुकता सम्मेलन किया गया। सार्वजनिक आहर, पईन, पोखरों का अतिक्रमणमुक्त कराना और उसका जीर्णोद्धार कराकर जल संचयन का काम किया जा रहा है, उससे भूजल स्तर भी बनाए रखने के लिए लगातार काम किया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षापात में कमी हो रही है। ऐसे में कभी सूखे की स्थिति तो कभी बाढ़ की स्थिति बन रही है। 

  बिहार राज्य जैव विविधता, जल स्त्रोतों, विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्रों, वनों एवं वन प्राणियों के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद जलवायु परिवर्तन से होने वाले असंतुलन एवं खतरों के प्रति बिहार पूरी तरह सजग है। इन कुप्रभावों को नियंत्रित करने की दिशा में अपनी पूरी क्षमता से सरकार प्रयत्नशील है। बिहार राज्य कृषि प्रधान राज्य है जिसके आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रुप से कृषि संबंधी कार्यों पर निर्भर है। उन्नत एवं सफल कृषि कार्य हेतु जल की पर्याप्त उपलब्धता अनिवार्य है। प्राकृतिक असंतुलन के कारण राज्य को अक्सर बाढ़ तथा सुखाड़ की विभीषिका का सामना करना पड़ता है। नदियों एवं जलस्त्रोतों के लगभग सभी उदगम स्थल प्राकृतिक वनों के अंदर अवस्थित है। मृदा एवं जलस्त्रोतों के संरक्षण हेतु अनेक महत्वाकांक्षी योजनाओं पर काम किया जा रहा है। भू- सतह पर अवस्थित जलस्त्रोतों जैसे नदियों, नालों, नहरों के अतिरिक्त भू-गर्भ जल की उपलब्धता हेतु भू-गर्भ जल संवर्द्धन एवं संरक्षण में राज्य में अवस्थित प्राकृतिक  आर्द्रभूमियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। आर्द्रभूमि की पहचान एवं संरक्षण हेतु सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। 

बिहार राज्य में भी गंगा नदी के किनारे-किनारे वृक्षारोपण एवं पारिस्थितिकी विकास के कार्य किए जा रहे हैं। इन वृक्षारोपण कार्य से बाढ़ के दौरान जल आवेग को कम कर गंगा नदी द्वारा गाद संचयन को नियंत्रित करने में सहयोग होगा। वनाच्छादन बढ़ाने के लिए राज्य के किसानों को कृषि वानिकी के लिए प्रोत्साहित करने, जागरुकता फैलाने, क्षमता विकास करने एवं तकनीकी प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की गई है। वनाच्छादन में वृद्धि, प्रदूषण नियंत्रण, पर्यावरण संरक्षण एवं पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने के साथ-साथ वन्य प्राणियों का संरक्षण एवं संवर्द्धन का कार्य भी किया जा रहा है। राज्य ने वन संवर्द्धन, पारिस्थितिकी संतुलन, प्रदूषण नियंत्रण, वन्य प्राणी संरक्षण के साथ इको टूरिज्म के के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है इससे दूरगामी उद्देश्यों को प्राप्त करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। इस प्रकार विश्व पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए जिस प्रकार लॉकडाउन में लोगों ने एहतियात बरतते हुए खुद के साथ पर्यावरण को संरक्षित किया है, इस बात को समझते हुए आगे भी सजग होकर काम करते रहना होगा।


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