आत्मनिर्भरता से जागेगा स्वाभिमान



आत्मनिर्भरता से जागेगा स्वाभिमान

दुलीचंद कालीरमन

जब से चीनी वायरस’  कोरोना की महामारी शुरू हुई है, विश्वभर में वैश्विक-व्यवस्था  को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। इस बहस के केंद्र में चीन है। चीन को लेकर आशंकाएं पिछले कई वर्षों से चल रही थी। लेकिन सारे देश अपने-अपने स्वार्थ में या कर्जदार बने मूकदर्शक बन एक अनजान दिशा में आगे बढ़े जा रहे थे। तथाकथित विकास की एक ऐसी दिशा में, जिसकी मंजिल के बारे में तथाकथित झंडा बरदार भी अनिश्चित थे।

 कोरोना महामारी के इस दौर ने इस वैश्विक व्यवस्था के खिलाफ बहुत से देशों को मौका दे दिया, जिन्हें चीन से शिकायत थी। 1945 से 2020 तक संयुक्त राष्ट्र संघ की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगातार बड़ा हो रहा था। केवल कुछ शक्तिशाली देश बाकी विश्व को हाँक रहे थे। कुछ-कुछ सुगबुगाहट या विरोध के स्वर बीच-बीच में भारत जैसे विकासशील देशों देश उठाते थे। लेकिन उनको विकसित देशों द्वारा वीटो पावर के नाम पर शांत कर दिया जाता था। 

 चीन के साथ भारत का व्यापार चीन के पक्ष में एकतरफा सा हो गया है। इसके साथ-साथ चीन से आयात  भारत में बेरोजगारी का भी एक  प्रमुख कारण बन गया है । जब भारत ने चीन की चाल को समझ कर आत्मनिर्भरता की अंगड़ाई ली तो चीन ने भारत की सीमाओं पर अपनी चालबाजी दिखानी शुरू कर दी। यह वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती साख तथा चीन के विरोध में दुनिया भर में उठ रही आवाजों को दबाने का प्रयास है । भारत का सदा बहार पड़ोसी नेपाल भी चीन की कठपुतली बन गया है । आने वाले दिनों में पाकिस्तान भी कुछ ऐसी हरकतें करेगा जिससे भारत का ध्यान भटके। यह सब कुछ चीन के इशारों पर होगा । इसलिए भविष्य में किसी सैनिक गतिरोध को देखते हुए हमें रणनीतिक आयतों के मामले में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देनी होगी।

 विश्व व्यापार संगठन व वैश्वीकरण के नाम पर एक ऐसी व्यवस्था कड़ी कर दी गई जिससे पूरे विश्व की सप्लाई-चेन चीन से नियंत्रित हो रही थी तथा बाकी विश्व केवल ग्राहक बनकर रह गया था। विश्व के कुछ देश तो चीन के "आर्थिक-दास" बनकर रह गए थे। ऐसे छोटे-छोटे आर्थिक स्थिति से कमजोर देश जिनके कंधे पर चीन ने तथाकथित 'आर्थिक-मदद' के नाम पर हाथ रखा और वे देश  कर्ज के जाल में फंसते चले गए।  चीन ने "विश्व व्यापार संगठन" जैसी संस्थाओं को भी वित्त पोषण के नाम पर अपना तोता बना लिया  जो कोरोना काल में हर कदम पर चीन के बचाव में खड़ी नज़र आयी ।

दुनिया आज भी एक आदर्श विकास के मॉडल की तलाश में है। बीच-बीच में नए 'विकास के मॉडल' आते गए। लेकिन समय के आईने में उनका अक्स धुंधला पड़ता चला गया। कभी मार्क्सवाद दुनिया के वंचितों का मसीहा बनने का दंभ भरता था और उन का कल्याण करने निकला था। 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद पूंजीवाद ने यह कहना शुरू किया कि निजी संपत्ति का निर्माण होगा तो वह गरीब तबके तक भी पहुंचेगा। लेकिन आज उसका भी हश्र देख लिया जब पूंजीवाद भी वक्त के उपजे सवालों को हल नहीं कर पा रहा है

 भारत में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने "आत्मनिर्भर-भारत" की एक नई बहस शुरू की है । यह पहला मौका है जब शीर्ष नेतृत्व "लोकल के लिए वोकल" हुआ है । यह हृदय परिवर्तन रातो-रात भी नहीं हुआ। बल्कि जब भारत के राजमार्गों पर मजदूरों के रक्त रंजित पैरों के निशान पड़ रहे थे तो फिर एक बार वही सवाल राष्ट्रीय स्तर पर उठा कि क्या हमारे शहर और गांव आत्मनिर्भर हैं। आज इसका जवाब सबको मिल गया है।  प्रशासन और राजनीति के शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्ति चीन से अधिक से अधिक विदेशी फैक्ट्रियों के पलायन की आशा में अपने यहां पलक-पावडे बिछा कर बैठे हैं । कुछ राज्यों ने श्रम कानूनों को भी बदला गया है । लेकिन यह सुधार किस को राहत देने के लिए हैं?

अगर गांव आत्मनिर्भर होते तो यह करोड़ों मजदूर शहर में पिंजरे नुमा कोठरियों में नहीं रहते और संकटकाल में गांवों को पलायन नहीं करते। दरअसल शहर को मजदूर तो चाहिए लेकिन वह अपने मजदूरों को शहरी नागरिक बनने का मौका नहीं देता। उसे सिर्फ इतना ही मिलता पाता है जिससे वह अपना पेट भर सके और कुछ बचा कर गांव में परिजनों के पास भेज सकें। अब जब सारे मजदूर अपने गांव में लौट रहे हैं तो मजदूरों पर ही सियासत शुरू हो गई है। कोई बसों की लिस्ट दे रहा है तो कोई उनके कागजात जांच रहा है। लेकिन मूल मुद्दा अभी भी अनुत्तरित है कि शहरी अर्थव्यवस्था का पहिया कैसे घूमेगा ? फैक्ट्रियां बिना मजदूरों के कैसे चलेंगी ? पंजाब-हरियाणा जैसे चावल उत्पादक राज्य में धान की फसलों के लिए  मजदूरों की कमी के संकट खड़ा हो गया है। जिससे किसानों का लागत मूल्य बढ़ जाएगा । लॉकडाउन के बाद शहरों से गांव में जो श्रमिक पलायन हुआ है उसका एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि गांव में तकनीकी रूप से कुशल श्रम शक्ति पहुंची है। जिससे ग्रामीण पारंपरिक अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक तथा गुणात्मक के परिणाम आ सकते हैं।

 आत्मनिर्भर भारत अभियान का नारा मौखिक तौर पर सुहाना लगता है। लेकिन इसकी आत्मनिर्भरता को राष्ट्र की सीमाओं के साथ-साथ शहरों और गांवों को भी आत्मनिर्भर बनाना होगा ताकि किसी विपदा की घड़ी में देश में अराजकता का माहौल में बने। हर देश की अपनी भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक स्थितियां अलग-अलग होती हैं । सच्चाई से मुंह फेर कर पूरे विश्व पर कोई एक व्यवस्था नहीं थौपी जा सकती । आत्मनिर्भरता भारतीय परिपेक्ष में नई नहीं है, बल्कि इसे वर्तमान संदर्भ में हकीकत में बदलना होगा।

 ग्राम स्वराज की भावना को फिर से बदलते परिवेश में परिभाषित करने की आवश्यकता है । गांव में कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां तभी संभव है जब ग्रामीण भारत की आधारभूत संरचना के विकास में रुचि ली जाए। सड़क, बिजली की उपलब्धता, लालफीताशाही का समापन आदि कुछ उपायों से इसे सुधारा जा सकता है। बिना आधारभूत संरचना के विकास के कोई भी कंपनी चीन से भारत का रुख करेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। केवल सस्ता श्रम-बल ही नहीं अपितु कई अन्य सुविधाएं ऐसी कंपनियों की प्राथमिकता होती हैं।

 आजादी के बाद महात्मा गांधी का विकास का दर्शन 'ग्राम-स्वराज' आधारित था तो जवाहरलाल नेहरू पश्चिम और विशेषकर समाजवाद से प्रेरित थे। भारत की दो-तिहाई जनसंख्या गांव में रहती है। लेकिन सरकारी विकास की नीतियों में गांव कभी भी केंद्र बिंदु नहीं रहे। उद्योगो का विकास शहरों तक केन्द्रित रहा जिसका परिणाम शहरों पर जनसंख्या का अनावश्यक दबाव बढ़ता चला गया। ग्रामीण भारत से युवा रोजी-रोटी की तलाश में शहरों में अप्राकृतिक परिवेश में घुटने रहे। जिससे 'सामाजिक विचलन' और सामाजिक अनैतिकता संबंधी अपराधों में वृद्धि हुई। हमे तत्काल श्रम – आधारित उधोगों को गावों में स्थापित करने के लिए स्वदेशी उद्धोगपतियों तथा नए स्टार्टअप्स को कुछ विशेष रियायते देनी होगी तथा उन्नत तकनीक उपलब्ध करवानी होगी ताकि भारत की युवा-शक्ति का सदुपयोग हो सके और देश नए स्वाभिमान के साथ आत्मनिर्भर बन सके ।



दुलीचंद कालीरमन

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