मांसाहार , चीन , वेद का धर्म और विश्व शांति



मांसाहार , चीन , वेद का धर्म और विश्व शांति

डॉ राकेश कुमार आर्य

संसार में चीन एक कम्युनिस्ट देश है । यहां की कुल जनसंख्या के 91% लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। यद्यपि कम्युनिस्ट सरकार ने यहां पर किसी भी धर्म को न मानने की अनिवार्यता घोषित कर रखी है । कम्युनिस्ट पार्टी के 9 करोड़ से अधिक कार्यकर्ताओं के लिए यह कड़े निर्देश हैं कि वह किसी भी धर्म को नहीं अपनाएंगे और यदि कोई कार्यकर्ता किसी धर्म का अनुकरण करता पाया गया तो उसके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्यवाही की जाती है । इसके उपरांत भी 91% बौद्ध धर्म अनुयायी जनसंख्या के साथ चीन विश्व का एकमात्र ऐसा बड़ा देश है जहां सबसे अधिक बौद्ध रहते हैं।

हम सभी जानते हैं कि बौद्ध धर्म वैदिक धर्म में आए दोषों के विरुद्ध महात्मा बुद्ध के द्वारा की गई एक क्रांति का नाम था । उस समय वेदों के नाम पर यज्ञ में हिंसा का तांडव देखकर महात्मा बुध्द का ह्रदय द्रवित हो गया था । यज्ञों में हो रही ऐसी हिंसा को रोकने के लिए और वेद की ऋचाओं का सही अर्थ बताकर उन्होंने लोगों को फिर से सही मार्ग पर लाने का कार्य किया था । सम्राट कनिष्क के समय तक बौद्ध धर्म कोई अलग धर्म नहीं था । जब बौद्ध धर्म हीनयान और महायान नामक दो विभागों में विभक्त हुआ तो धीरे-धीरे इन लोगों ने अपने आपको वैदिक धर्मावलंबियों से अलग घोषित करना आरंभ किया।

भारत में आपको ऐसे बहुत लोग मिल जाएंगे जो अपने भाषणों या लेखों में अक्सर यह कहते हैं कि यह देश महात्मा बुद्ध और महात्मा गांधी का देश है , जो कि अहिंसा के अवतार थे। कहना न होगा कि इस प्रकार के सुर को निकालने वाले कांग्रेसी और कम्युनिस्ट दोनों हैं । पर जैसे गांधीजी के अहिंसावाद को कांग्रेसियों ने ही मिट्टी में मिला दिया है , वैसे ही महात्मा बुद्ध के अहिंसावाद को भी उन्हीं के अनुयायियों ने मिट्टी में मिला दिया है ।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन के एक तिहाई लोग ऐसे हैं जो मांसाहार छोड़ने का दावा करते हैं। वहीं, अमरीका में दो तिहाई लोग दावा करते हैं कि वे पहले से कम मांस खा रहे हैं। वर्तमान विश्व का यह भी एक कुख्यात तथ्य है कि वैश्विक स्तर पर मांसाहार की खपत में बीते 50 वर्षों में तेजी से वृद्धि हुई है। परिणाम स्वरूप 1960 के मुक़ाबले मांस का उत्पादान पांच गुना बढ़ा है। साल 1960 में मांस का उत्पादन 70 मिलियन टन था जो कि 2017 तक 330 टन तक पहुंच गया है। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस दौरान विश्व की जनसंख्या में दोगुने से भी अधिक की वृद्धि हुई है।

1960 के आरम्भ में वैश्विक जनसंख्या लगभग तीन अरब थी , जबकि इस समय विश्व की जनसंख्या पौने 8 अरब के लगभग है। वर्ष 2010 में अमरीका और ऑस्ट्रेलिया ने वार्षिक मांस की खपत के दृष्टिकोण से सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त किया था। वहीं, न्यूजीलैंड और अर्जेंटीना ने प्रतिव्यक्ति 100 किलोग्राम मांस की खपत के हिसाब से सबसे ऊंचा स्थान स्थान प्राप्त किया था। पश्चिमी यूरोप के अधिकतर देशों में प्रति व्यक्ति वार्षिक मांस की खपत 80 से 90 किलोग्राम है। एक औसत इथियोपियन व्यक्ति मात्र सात किलोग्राम मांस खाता है। रवांडा और नाइजीरिया में रहने वाले लोग आठ से नौ किलोग्राम मांस खाते हैं। ये आंकड़ा किसी भी औसत यूरोपीय व्यक्ति की तुलना में 10 गुना कम है।

बीबीसी की उपरोक्त रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट होता है कि विश्व के सबसे अमीर देशों में मांस सबसे अधिक खाया जाता है । जबकि निर्धन देशों में मांस की खपत बहुत कम है । इसका अभिप्राय है कि जो देश अपने आपको विकसित या आधुनिक मानते हैं अधर्म वहीं पर अधिक बढ़ रहा है , अर्थात जीवों की हिंसा वहीं पर अधिक हो रही है ।

चीन ने भी अपने आपको "आधुनिक और विकसित राष्ट्र" बनाने के लिए अपनी परंपरागत धार्मिक मान्यताओं का परित्याग कर आगे बढ़ना आरंभ किया । जिसका परिणाम यह निकला कि सारे संसार को शांति का संदेश देने वाले बौद्ध धर्म का अनुयायी होते हुए भी चीन सारे संसार के लिए एक भस्मासुर के रूप में उभर कर सामने आया । माओत्से तुंग के नेतृत्व में इसने अहिंसा का परित्याग कर हिंसा का सहारा लिया । भारत में रोमिला थापर जैसे इतिहासकार सम्राट अशोक की तो अहिंसा को भी कोसते हैं , परंतु अपने वर्तमान आका चीन की हिंसा को भी सहन करते हैं। इन इतिहासकारों के इस प्रकार के दोगले आचरण पर कांग्रेसमन साध जाती है । चीन की हिंसा में भी उन्हें कोई दोष दिखाई नहीं देता।
तेजी से प्रगति करते देश चीन और ब्राज़ील ने पिछले कुछ वर्षों में तेजी से आर्थिक प्रगति की है। इसके साथ ही इन देशों में मांस के उपभोग में वृद्धि हुई है। चीन में एक औसत व्यक्ति 1960 के दशक में प्रतिवर्ष 5 किलोग्राम से कम मांस खाता था , लेकिन 80 के दशक में ये आंकड़ा 20 किलोग्राम तक पहुंच गया. वहीं, बीते कुछ वर्षों में मांस की खपत 60 किलोग्राम प्रति व्यक्ति तक पहुंच गई है।

जहां तक हमारे देश भारतवर्ष की बात है तो भारत में 1990 के बाद से अब तक औसत आय में तिगुनी वृद्धि हुई है , लेकिन मांस की खपत में बढ़ोतरी नहीं हुई है। एक देशव्यापी सर्वे के अनुसार भारत में दो तिहाई लोग कम से कम किसी एक तरह का मांस खाते हैं। भारत में प्रति व्यक्ति मांस की खपत 4 किलोग्राम है, जो कि संसार भर में सबसे कम है।

ऐसा केवल इसलिए है कि भारतवर्ष के लोग अभी भी अपनी धार्मिक परंपराओं के आधार पर मांस खाना या जीवों पर हिंसा करना पाप मानते हैं। महात्मा बुध्द का सभी प्राणियों पर दया करने का वैचारिक दृष्टिकोण सबसे अधिक भारत में ही जीवित है । यद्यपि भारतवर्ष में बौद्ध धर्म के अनुयायी मात्र 5% ही हैं , परंतु क्योंकि अहिंसा भारतीय धर्म का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है इसलिए वेद की मान्यताओं में आस्था रखने वाले बहुसंख्यक हिंदू समाज के लोग मांस से दूरी बनाकर रहने में ही लाभ देखते हैं।

आज जबकि चीन भारत की सीमाओं पर अपनी सेनाओं को लिए खड़ा है और थोड़ी सी असावधानी से भी हम एक महाभयंकर युद्ध की ओर जा सकते हैं। तब यह बात बहुत अधिक विचारणीय हो गई है कि महात्मा बुध्द जैसे शांतिवादी व्यक्तित्व की "वैचारिक हत्या" किसने की है ? यदि उपरोक्त आंकड़ों पर एक बार फिर दृष्टिपात किया जाए तो जो चीन मांसाहार के मामले में 1960 के दशक में मात्र 5 किलोग्राम प्रति व्यक्ति के स्तर पर खड़ा था , उसने 2017 तक प्रति व्यक्ति 60 किलोग्राम मांस परोसने का निर्णय लेकर सचमुच महात्मा बुद्ध की हत्या कर दी है। चीन की इस तथाकथित उपलब्धि से विश्व शांति प्रभावित हुई है । जब मनुष्य केवल और केवल खून पीना और खून अर्थात मांस को खाना अपना धर्म बना लेता है तो धर्म का मूल तत्व अर्थात दया उसके भीतर से विलुप्त हो जाती है और जैसे ही दया विलुप्त होती है वैसे ही मानवता भी वहाँ से अपना बोरिया बिस्तर बांध कर भाग खड़ी होती है । तब उस व्यक्ति ,संस्था या राष्ट्र के हाथों में आया हुआ कोई भी हथियार मानवता का भक्षक हो सकता है । संपूर्ण विश्व के बुद्धिजीवियों को आज चीन से इसीलिए खतरा है कि यह विश्व के विनाश में बहुत खतरनाक भूमिका निभा सकता है ?

तनिक सोचिए , इस्लाम का सारा भाईचारा खून पीने और खून खाने में लगा हुआ है , ईसाइयत की प्रेम और करुणा की बातें भी खून की थालियों में सराबोर हुई पड़ी हैं और बौद्ध धर्म जैसा शांतिप्रिय धर्म भी इसी खून की थाली में लथपथ है। तब विश्वशांति का सपना साकार होना कैसे संभव है ? निश्चित रूप से वेद धर्म के अनुयायियों को उठ खड़ा होने का संकल्प लेना होगा । भारत में दलित वर्ग के लोगों को भी इन घटनाओं से बहुत कुछ सोचने समझने की आवश्यकता है । उन्हें समझना चाहिए कि जो कम्युनिस्ट यहां पर बौद्ध धर्म या महात्मा बुद्ध के प्रति आस्था व्यक्त कर रहे हैं , उन्हीं का आदर्श माओत्से तुंग और चीन महात्मा बुद्ध के आदर्शों की हत्या कैसे कर चुका है ? यदि कम्युनिस्ट और उनके साथ मिलकर मुस्लिम इस देश में सत्ता परिवर्तन करने में सफल हुए तो उस समय महात्मा बुद्ध के आदर्शों की हत्या सबसे पहले होगी।

सारे संसार को यह संदेश समझना होगा कि वैदिकी अहिंसा और वेद के मानवतावाद से ही विश्व शांति संभव है। प्रधानमंत्री श्री मोदी को योग को वैश्विक मान्यता दिलाने में सफलता मिली है , पर अभी वेद को विश्व ग्रंथ के रूप में मान्यता दिलाने का बड़ा काम भारत के लिए एक चुनौती बना हुआ है । जिस दिन योग के साथ-साथ वेद संसार का धर्म ग्रंथ घोषित हो जाएगा और विश्व के सभी संविधानों को भी वेद के अनुसार संशोधित कर दिया जाएगा , उस दिन मानवता पूर्णतया सुरक्षित हो जाएगी।

हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि चीन अपना आदर्श उस माओत्से तुंग को मानता है , जिसने तीन करोड़ लोगों को मरवा दिया था और जो साम्राज्यवाद का जनक था । भारत के कम्युनिस्ट चीन को अपना आदर्श मानते हैं और साथ ही माओ के विचारों से भी प्रेरणा लेते हैं । यही कारण रहा कि 1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया था तो चीन की लाल सेना का स्वागत हमारे देश के कम्युनिस्टों ने किया था । अरुणाचल प्रांत में जब चीन भीतर तक घुसने में सफल हो गया था तो इन कम्युनिस्टों ने इस पर भी तालियां बजायी थीं । इतना ही नहीं , तब इन्होंने भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को देश का प्रधानमंत्री मानने से इंकार करते हुए माओ त्से तुंग को भारत का प्रधानमंत्री कहकर पुकारना आरंभ कर दिया था । 

जब तक गांधीजी जीवित रहे तब तक उनकी लंगोटी में भी इन्हें साम्राज्यवाद दिखाई देता था । जबकि आज कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों गलबहियां हैं । इतना ही नहीं , भारत के इतिहास का विकृतिकरण करने में भी दोनों ने मिलकर काम किया है। यदि अब भारत और चीन का युद्ध होता है तो देश के भीतर हिंसा की गतिविधियों में संलिप्त रहने वाले कम्युनिस्टों का आचरण एक बार फिर देखने योग्य होगा। इसके साथ ही कांग्रेस इनसे दूर रहती है यह इनके साथ जाती है , यह भी देखने योग्य होगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत


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