अधिकार से पहले कर्तव्य, अध्याय - 6 : भारतीय संविधान और मौलिक कर्तव्य





अधिकार से पहले कर्तव्य, अध्याय - 6 : भारतीय संविधान और मौलिक कर्तव्य

 राकेश कुमार आर्य

भारत प्राचीन काल से व्यक्ति के मौलिक कर्तव्य पर बल देता आया है । प्रख्यात इतिहासकार के. पी. जायसवाल के अनुसार प्राचीन भारत में गणतंत्र की अवधारणा रोमन या ग्रीक गणतंत्र प्रणाली से भी पुरानी है।

भारत की लोकतांत्रिक विचारधारा कर्तव्यपरक है

आज अनेकों इतिहासकार और विद्वान लेखकों का यह प्रबल मत है कि भारत में प्राचीन काल से लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने की परम्परा रही है। लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने की भारत की इसी परम्परा में संसार में प्रचलित वर्तमान लोकतंत्र के बीज छिपे हुए हैं।

इसके उपरांत भी हमारा मानना है कि संसार में प्रचलित वर्तमान लोकतंत्र और भारत के लोकतंत्र और लोकतांत्रिक विचारधारा में मौलिक अन्तर है। संसार में प्रचलित वर्तमान लोकतंत्र और लोकतांत्रिक परम्परा जहां व्यक्ति के अधिकारों पर अधिक बल देती हुई दिखाई देती है वहीं भारत का प्राचीन लोकतंत्र और उसके लोकतांत्रिक मूल्य व्यक्ति को कर्तव्यपरायण बनाकर उसे दूसरों के अधिकारों का संरक्षक बनाने की भावना पर काम करते हुए अधिक दिखाई देते हैं । वास्तव में संसार के लिए भारत के इन्हीं लोकतांत्रिक मूल्यों का महत्व अधिक है। क्योंकि इन्हीं लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनाने से संसार में लड़ाई , झगड़े , दंगे , फसाद आदि पर अंकुश लगाया जा सकता है और स्थाई शान्ति की दिशा में विश्व समुदाय आगे बढ़ सकता है। संसार में जब तक मानवतावाद का प्रचार-प्रसार नहीं होगा या संसार जब तक मानवतावाद को नहीं अपनाएगा तब तक संसार में आसुरी प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त किया जाना असंभव भी कहा जाएगा । मानवतावाद का प्रचार - प्रसार तभी हो सकता है , जब प्रत्येक व्यक्ति मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए सर्वप्रथम अपने आपको कर्तव्य परायणता के भाव से बांध ले।

भारत के सभी वैदिक ग्रन्थ वेदादि तथा महाभारत और रामायण आदि ऐतिहासिक ग्रन्थ भी लोगों को अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिये प्रेरित करती हैं । पूरा का पूरा वैदिक वांग्मय मनुष्य निर्माण के लिए कर्तव्य पथ को प्रशस्त करता हुआ दिखाई देता है । वेद आदि शास्त्रों में भी मनुष्य निर्माण के लिए उसके नैतिक और आध्यात्मिक पक्ष पर अधिक बल दिया गया है । आध्यात्मिक उन्नति के माध्यम से लोक व्यवस्था में शान्ति स्थापित करने के लिए व्यक्ति के भीतरी संसार को सुधारने पर बल दिया गया है । वेद आदि धर्म ग्रंथ हमें यह बताते हैं कि व्यक्ति की भीतरी शुचिता बहुत आवश्यक है । यदि भीतरी शुद्धि हो गई तो बाहरी जगत अपने आप शुद्ध और पवित्र हो जाता है । भीतरी शुद्धि के लिए व्यक्ति का नैतिक और कर्तव्य परायण होना आवश्यक है । जिसके लिए उसे धर्मानुरागी बनना पड़ता है ।क्योंकि धर्मानुरागी व्यक्ति ही मर्यादा , संयम धैर्य और विवेक के साथ कर्तव्य पालन में अग्रसर हो सकता है। जिसके लिए मनुष्य से हर स्थिति और परिस्थिति में कर्तव्यपरायण बने रहने की अपेक्षा की गई है ।

गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि व्यक्ति को पूर्ण कर्तव्य भावना से अपने कर्म को करते रहना चाहिए । श्री कृष्ण जी का मंतव्य है कि व्यक्ति को अधिकार प्रेमी न होकर कर्तव्यप्रेमी होना चाहिए । निष्काम भाव से रहें और अपना कर्म करें । जब वह निष्काम भाव की बात करते हैं तो उसका अभिप्राय भी कर्तव्यप्रेमी होकर काम करने से है । क्योंकि उसका कर्म पर ही अधिकार है , फल पर नहीं । इसलिए उसे कर्तव्य निर्वाह करने में अपनी कर्तव्यपरायणता का परिचय देना चाहिए। भारत का मौलिक लोकतांत्रिक चिंतन इसी प्रकार की विचारधारा से प्रेरित और प्रभावित रहा है।

गांधी जी का विचार था कि “हमारे अधिकारों का सही स्रोत हमारे कर्तव्य होते हैं और यदि हम अपने कर्तव्यों का सही ढंग से निर्वाह करेंगे तो हमें अधिकार मांगने की आवश्यकता नहीं होगी।”

हमारे संविधान में मौलिक कर्तव्य

भारत के संविधान ने देश की एकता ,अखंडता और सामाजिक समरसता को बनाए रखने के उद्देश्य से देश के नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों की व्यवस्था की है । वास्तव में देश के नागरिकों के अपने समाज व देश के प्रति क्या कर्तव्य हो सकते हैं ? और कैसे वह देश की एकता और अखंडता को बनाए रखकर देश के सामाजिक परिवेश को भी समरस बनाए रखने में सरकार का सहयोग कर सकते हैं ? - इस उद्देश्य से प्रेरित होकर ही इन मूल कर्तव्यों की व्यवस्था संविधान में की गई है ।

वास्तव में मूल कर्तव्यों की व्यवस्था देश के मूल संविधान में नहीं थी । इन्हें 1976 में सरकार द्वारा गठित 'स्वर्णसिंह समिति' की सिफारिशों पर, 42वें संशोधन द्वारा संविधान में जोड़ा गया । 1976 में मूल कर्तव्यों की कुल संख्या 10 रखी गई थी , परंतु 2002 में संविधान के 86 वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से इनकी संख्या बढ़ाकर 11 कर दी गई है । 2002 के इस संवैधानिक संशोधन के माध्यम से प्रत्येक माता-पिता या अभिभावक को यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य सौंपा गया कि उनके छः से चौदह वर्ष तक के बच्चे या वार्ड को शिक्षा का अवसर प्रदान कर दिया गया है। 

 मूल कर्तव्य नागरिकों को प्रेरित करते हैं कि वह संविधान सहित भारत के सभी राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करें और भारत की महान सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखने की दिशा में भी अपनी सक्रिय सहभागिता निभाएं । इसके अतिरिक्त भारत की सामासिक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में भी अपना सक्रिय सहयोग दें। जिससे भारत की महान सांस्कृतिक विरासत और सामासिक संस्कृति की महान परंपराओं के आधार पर देश को विश्व मंचों पर सम्मान दिलाया जा सके ।
वास्तव में देश के प्रति हमारे यह कर्तव्य बहुत महत्वपूर्ण हैं ।यदि देश का प्रत्येक निवासी अपने देश को विश्व का सिरमौर बनाने के प्रति संकल्पित हो जाए और उस दिशा में कर्तव्य भाव से अपना कार्य भी करना आरंभ कर दे तो निश्चय ही इसके अच्छे परिणाम निकलते हैं। भारत की सांस्कृतिक विरासत इतनी महान और तेजस्वी है कि उसके माध्यम से संसार आज भी आलोकित हो सकता है । उस दिशा में हमारे देश के निवासी सोचें और कर्तव्य भाव से प्रेरित होकर कार्य भी करना आरंभ करें , इसीलिए संविधान में इस प्रकार के मूल कर्तव्यों का समावेश किया गया।

भारत प्राचीन काल से ही प्रेम ,अहिंसा और बंधुत्व की भावना में विश्वास रखता आया है। प्रेम ,अहिंसा और बंधुत्व की इस पवित्र भावना से परिवार से लेकर राष्ट्र तक का परिवेश भाईचारे वाला बनता है । सभी लोगों के मध्य सद्भाव और सहयोग को बढ़ावा मिलता है। जिससे राष्ट्र में शांति और व्यवस्था बनी रहती है। यही कारण है कि भारतीय संविधान में रखे गए मूल कर्तव्य हमारे लिए यह भी व्यवस्था करते हैं कि सभी भारतीयों को सामान्य भाईचारे की भावना को बढ़ावा देने, पर्यावरण और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करने, वैज्ञानिक सोच का विकास करने, हिंसा को त्यागने और जीवन के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की दिशा में प्रयास करने के कर्तव्य भी सौंपते हैं।  
जो लोग सार्वजनिक संपत्ति को हिंसा के माध्यम से या तो आग लगा देते हैं या किसी भी कारण से नष्ट करने का काम करते हैं , उनके बारे में यह समझना चाहिए कि वह अपने मौलिक कर्तव्यों से दूर भागकर देश की सामासिक संस्कृति के विपरीत कार्य कर रहे हैं । संविधान में रखे गए मौलिक कर्तव्यों की भावना का सम्मान करते हुए देश के किसी भी नागरिक को सार्वजनिक संपत्ति को आग लगाने या नष्ट करने का कोई अधिकार नहीं है । यदि इसके उपरांत भी कोई नागरिक किसी भी कारण से सार्वजनिक संपत्ति को जलाता है या नष्ट करता है तो समझिए कि वह राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने में चूक कर रहा है और एक नैतिक अपराध भी कर रहा है । हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अधिकार कर्तव्य से उपजते हैं । यदि कर्तव्य अकर्तव्य में परिवर्तित हो गया है तो समझिए कि अधिकारों का हनन अपने आप हो गया है । 

नागरिक इन कर्तव्यों का पालन करने के लिए संविधान द्वारा नैतिक रूप से बाध्य हैं। नैतिकता का अभिप्राय धर्म के उस पवित्र बंधन से है जिसका निर्वाह करना प्रत्येक मनुष्य का परम कर्तव्य है । कर्तव्य का निर्वहन न करना अधर्म और अनैतिकता को प्रोत्साहित करना होता है । इसलिए संविधान में रखे गए इन मौलिक कर्तव्यों का निर्वाह करना नैतिक रूप से बाध्य माना जाना उचित ही है । 

यद्यपि निदेशक सिद्धांतों की भान्ति मौलिक कर्तव्य भी न्यायोचित नहीं हैं। इनका उल्लंघन या अनुपालना न होने पर किसी नागरिक के विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हो सकती। ऐसे कर्तव्यों का उल्लेख मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा तथा नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिज्ञापत्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय लेखपत्रों में है, अनुच्छेद 51ए भारतीय संविधान को इन संधियों के अनुरूप लाता है।

निरर्थक नहीं हैं मौलिक कर्तव्य

मौलिक कर्तव्यों का निर्वाह किया जाना संवैधानिक बाध्यता नहीं है । कुछ लोगों का मानना है कि मौलिक कर्तव्यों का पालन किया जाए या न किया जाए , इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । इसलिए इनका संविधान में होना या न होना कोई अर्थ नहीं रखता । संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि मौलिक कर्तव्यों का उल्लंघन या अनुपालना न होने पर किसी नागरिक के विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाही न होने का अर्थ यह भी नहीं है कि हमारे संविधान में रखे गए मौलिक कर्तव्यों का प्रावधान कोई अर्थ नहीं रखता या यह केवल निरर्थक ही हैं।

एक धार्मिक और सभ्य व्यक्ति को सुसंस्कृत नागरिक के रूप में मान्यता दी जाती है । सुसंस्कृत व्यक्ति वही होता है जो अंतरात्मा की आवाज पर सबसे धर्मानुसार प्रीति पूर्वक यथायोग्य व्यवहार करता है । उसकी अंतरात्मा ही उसके लिए न्यायाधीश बन जाती है। आत्मानुशासन में रहकर वह व्यक्ति वही करता है जो न्यायोचित , धर्मसंगत , नीतिसंगत और समाज , राष्ट्र व प्राणीमात्र के हित में सर्वथा उचित होता है। ऐसी सुसंस्कृत मानव समुदाय से अपेक्षा की जाती है कि वह अनिवार्यत: इन मौलिक कर्तव्यों का पालन इसलिए करेंगे कि उनके ऐसा करने से समाज के सभी लोगों के अधिकारों का संरक्षण स्वयं ही हो जाएगा। इन सुसंस्कृत लोगों की देखादेखी समाज का सामान्य वर्ग इन मौलिक कर्तव्यों का पालन करना अपने लिए वैसे ही अनिवार्य मानेगा जैसे यह सुसंस्कृत लोग करते हुए देखे जाएंगे । इस प्रकार मौलिक कर्तव्यों का प्रावधान संविधान में करने का अभिप्राय है कि धीरे-धीरे मौलिक कर्तव्यों का पालन करना हमारा राष्ट्रीय संस्कार बन जाए और वह हमारे सांसों में इस प्रकार रम जाए कि उनकी अनुपालना न करने या उल्लंघन करने का विचार तक हमें छूने न पाए ।

मौलिक कर्तव्य के अंतर्गत दो प्रकार के कर्तव्य को समाविष्ट किया गया है कुछ कर्तव्य नैतिक कर्तव्य के रूप में आते हैं तो कुछ नागरिक कर्तव्य के रूप में माने जाते हैं । उदाहरण के लिये ‘स्वतंत्रता के लिये हमारे राष्ट्रीय संघर्ष को प्रेरित करने वाले महान आदर्शों का पालन करना’ एक नैतिक कर्तव्य है, जबकि ‘संविधान का पालन करना और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज एवं राष्ट्रीय गान का आदर करना’ एक नागरिक कर्तव्य है। स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय संघर्ष को प्रेरित करने वाले महान आदर्शों का पालन करने में ' वंदेमातरम' का सम्मान करना अपने आप सम्मिलित है । इसी प्रकार कांग्रेस के नेता गांधीजी यदि स्वतंत्रता के उपरांत 'रामराज्य' की स्थापना का संकल्प लेकर चल रहे थे तो 'रामराज्य' की स्थापना करने के लिए प्रयास करना भी हमारा नैतिक कर्तव्य है।

कुछ मौलिक अधिकार भारतीय नागरिकों के साथ-साथ विदेशी नागरिकों को प्राप्त हैं, परंतु मौलिक कर्तव्य केवल भारतीय नागरिकों पर ही लागू होते हैं। संविधान के अंतर्गत उल्लेखित मौलिक कर्तव्य भारतीय वैदिक परंपरा, पौराणिक कथाओं,धर्म एवं पद्धतियों से भी संबंधित हैं। इस प्रकार के कर्तव्यों के निर्वाह की अनिवार्यता को स्थापित करके भारतीय संविधान ने भारतीय इतिहास और धर्मग्रंथों की उस परम्परा को अपनी मान्यता प्रदान की है , जिसे हम हिंदुत्व के जीवंत मूल्य या वैदिक संस्कृति के प्राणतत्व के रूप में जानते हैं।

संविधान के अंतर्गत इन मौलिक कर्तव्यों को लागू करने के लिये भी कोई विशेष प्रावधान नहीं किये गए हैं इसलिये इनके उल्लंघन पर तब तक किसी भी प्रकार का दंड नहीं दिया जा सकता जब तक संविधान में इसके लिये विशिष्ट प्रावधान न किया जाए।संविधान के अनुच्छेद 20(1) के अनुसार किसी व्यक्ति को अपराध का दोषी ठहराए जाने से पूर्व उस अपराध के संबंध में कानून होना अनिवार्य है और उस कानून का उल्लंघन भी होना चाहिये।

सामूहिक सहभागिता की भावना हो बलवती

देश के नागरिकों के भीतर देश की सरकारों की जनहितकारी नीतियों को लागू कराने में अपनी उपस्थिति प्रकट करने की भावना का जागरण करने के लिए मौलिक कर्तव्यों का प्रावधान किया जाना अनिवार्य है । इस प्रकार के प्रावधान से देश के जिम्मेदार नागरिक अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए राष्ट्र व समाज की कल्याण एवं उत्थान में अपनी सहभागिता प्रकट कर सकते हैं। किसी भी देश के सर्वांगीण उत्थान एवं विकास के लिए यह आवश्यक भी है कि उसके उत्थान एवं विकास में सभी जिम्मेदार नागरिक अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें । ऐसी सामूहिक सहभागिता से राष्ट्रवाद की भावना भी प्रबल होती है। राष्ट्रवाद की प्रबल भावना से हमारा अभिप्राय है कि सामूहिक सहभागिता से होने वाली उन्नति एवं विकास पर सभी लोग अपना सामूहिक अधिकार मानते हैं।

इस संबंध में संयुक्त राज्य अमेरिका को सबसे उत्कृष्ट उदाहरण माना जा सकता है। अमेरिका द्वारा अपने नागरिकों को ‘सिटिज़न्स अल्मनाक’ नाम से एक दस्तावेज़ जारी किया जाता है । जिसमें सभी नागरिकों के कर्तव्यों का विवरण दिया होता है।

इसका एक अन्य उदाहरण सिंगापुर भी है। जिसके विकास की कहानी नागरिकों द्वारा कर्तव्यों के पालन से आरम्भ हुई थी। परिणामस्वरूप सिंगापुर ने कम समय में ही स्वयं को एक अल्प विकसित राष्ट्र से विकसित राष्ट्र में बदल दिया। वास्तव में जब किसी भी देश के नागरिक अपने मौलिक कर्तव्यों की ओर ध्यान देते हैं तो उनके भीतर सामूहिक कर्तव्य भावना इस प्रकार विकसित होती है कि वह सभी अपने राष्ट्र और उसकी उन्नति के प्रति समर्पित हो जाते हैं । जिसका परिणाम उस राष्ट्र का तेजी से विकास होने में देखा जाता है । जिन देशों के नागरिकों ने अपने कर्तव्यों के प्रति नीरसता का प्रदर्शन करना आरंभ किया वे देश पतन के गर्त में चले गए और जिन देशों के नागरिकों ने अपने अधिकारों को छोड़कर पहले कर्तव्यों पर ध्यान देना आरंभ किया उन देशों ने उन्नति के कीर्तिमान स्थापित किये ।

मौलिक कर्तव्य देश के नागरिकों के लिये एक प्रकार से सचेतक का कार्य करते हैं। यह उन्हें इस बात के प्रति सचेत और सावधान करते हैं कि तुम्हें अपने राष्ट्र की उन्नति में किस प्रकार सहायक हो जाना है ? राष्ट्र रूपी गाड़ी का कौन सा पुर्जा बनकर तुम गाड़ी को गतिशील रख सकते हो और कैसे उसे सम्मानजनक स्थिति में उसके गंतव्य तक पहुंचाने में अपनी सहायता प्रदान कर सकते हो ? हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अधिकारों के संघर्ष में 'अपने - अपने लिए अधिकतम लाभ प्राप्त कर लो' - ऐसा भाव देशवासियों में पाया जाता है , जबकि कर्तव्य परायणता में 'दूसरों के लिए अपना भी छोड़ दो' - का भाव पाया जाता है। निश्चय ही पहली भावना स्वार्थपरक है तो दूसरी भावना परोपकारपरक है। राष्ट्र उन्नति के लिए स्वार्थपरक सोच कभी भी अच्छी नहीं कही जा सकती । इसके लिए तो परोपकारपरक भावना का होना ही आवश्यक और अपेक्षित होता है।

ध्यातव्य है कि नागरिकों को अपने देश और अन्य नागरिकों के प्रति उनके कर्तव्यों के बारे में ज्ञान होना चाहिये। ये राष्ट्र के प्रति अनुशासन और प्रतिबद्धता की भावना को बढ़ावा देने के साथ ही राष्ट्रोन्नति में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी सहायता करते हैं।


डॉ राकेश कुमार आर्य 

संपादक : उगता भारत


Post a Comment

0 Comments

 विश्व के लिए खतरा है चीन