क्षितिज - राजीव डोगरा 'विमल'



क्षितिज

राजीव डोगरा 'विमल'

जीवन क्षितिज के अंत में
मिलूंगा फिर से तुमको,
देखना तुम
मैं कितना बदल सा गया हूं
मिलकर तुमको।

जीवन क्षितिज के अंतिम
छोर में देखना
मेरे ढलते जीवन की
परछाई को,
कितनी बिखर सी गई है
मिलकर तुमको।

जीवन क्षितिज के अंत में
देखना मेरी
डगमगाती सांसों को,
कितना टूट सी गई है
मिलकर तुमको।

राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक)
(भाषा अध्यापक)
गवर्नमेंट हाई स्कूल,ठाकुरद्वारा।
पिन कोड 176029
9876777233
7009313259

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1 Comments

  1. सुन्दर रचना।
    मिलुगा तुझ से अंतिम छण में
    जब विदाई दोगी अंतिम चरण में।

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