जब बाबा साहेब ने इस्लाम के नाम पर दंगों को कहा था 'राजनीतिक गुंडागर्दी'


जब बाबा साहेब ने इस्लाम के नाम पर दंगों को कहा था 'राजनीतिक गुंडागर्दी'


डॉ राकेश कुमार आर्य

आजकल 'सोशल मीडिया' पर ऐसी पोस्ट अक्सर आपको पढ़ने को मिल जाएंगी जिनको देखकर लगता है जैसे डॉ अम्बेडकर जी मुस्लिम धर्म की मान्यताओं से बहुत अधिक सहमत थे और मुस्लिम व दलित समाज के लोग ही वास्तविक भारतीय हैं , शेष सभी लोग विदेशी हैं। ऐसी पोस्ट डालने वाले माँ भारती से द्वेष रखते हैं जो कि जानबूझकर देश में ऐसा परिवेश सृजित कर रहे हैं कि बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के विषय में ऐसा लगने लगे जैसे वह ब्राह्मण विरोधी और मुस्लिम प्रेमी थे। जबकि सच इसके विपरीत है । बाबासाहेब ने जहाँ तथाकथित उस ब्राह्मणवाद का विरोध किया जो किसी वर्ग विशेष के अधिकारों का हनन करने की व्यवस्था करता था , वहीं उन्होंने वंचित और दलित समाज को मुस्लिमों के जाल में न फंसने के लिए भी समय-समय पर आवश्यक चेतावनी दी। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'थॉट्स ऑन पाकिस्तान' में पाकिस्तान के बनाने में मुस्लिमों के विचारों की गहन समीक्षा की ।

जो लोग आज हरिजनों को मुस्लिम प्रेम का पाठ पढ़ा रहे हैं और इस सारे कार्य को बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों के अनुकूल सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं , उन्हें यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए । इसके साथ - साथ जो लोग इस प्रकार के षड़यंत्र को भारत में असफल करना चाहते हैं , उन्हें भी तर्क देने के लिए इस पुस्तक का अध्ययन करना चाहिए । क्योंकि इसमें बाबासाहेब अम्बेडकर जी ने बहुत कुछ ऐसा स्पष्ट किया है जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है , जब यह पुस्तक लिखी गई थी। सचमुच इस पुस्तक में उन्होंने बहुत कुछ स्पष्ट किया है।

मुस्लिम भाईचारा केवल मुसलमानों के लिए है

मुस्लिमों के भ्रातृभाव की चर्चा अक्सर होती है और इस मजहब को अमन का धर्म सिद्ध करने का भी प्रयास किया जाता है । जबकि सच यह है कि मुस्लिमों का भाईचारा सार्वभौम नहीं है , ना ही यह सार्वजनीन है । यह एक मुस्लिम का दूसरे मुस्लिम के प्रति है , इससे अन्यत्र किसी काफिर या विधर्मी के लिए नहीं।

अपनी उपरोक्त पुस्तक में बाबासाहेब लिखते हैं -- -”इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है, मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच जो भेद यह करता है, वह बिल्कुल मूर्त और स्पष्ट है। इस्लाम का भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृत्व है। यह बंधुत्व है, परन्तु इसका लाभ अपने ही निकाय के लोगों तक सीमित है और जो इस निकाय से बाहर हैं, उनके लिए इसमें सिर्फ घृणा ओर शत्रुता ही है। इस्लाम का दूसरा अवगुण यह है कि यह सामाजिक स्वशासन की एक पद्धति है और स्थानीय स्वशासन से मेल नहीं खाता, क्योंकि मुसलमानों की निष्ठा, जिस देश में वे रहते हैं, उसके प्रति नहीं होती, बल्कि वह उस धार्मिक विश्वास पर निर्भर करती है, जिसका कि वे एक हिस्सा हैं। एक मुसलमान के लिए इसके विपरीत या उल्टे सोचना अत्यन्त दुष्कर है। जहाँ कहीं इस्लाम का शासन है, वहीं उसका अपना विश्वास है। दूसरे शब्दों में, इस्लाम सच्चे मुसलमानों को भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट सम्बन्धी मानने की इज़ाजत नहीं देता। सम्भवतः यही वजह थी कि मौलाना मुहम्मद अली जैसे एक महान भारतीय, परन्तु सच्चे मुसलमान ने, अपने, शरीर को हिन्दुस्तान की बजाए येरूसलम में दफनाया जाना अधिक पसंद किया।” बाबा साहेब की इस चेतावनी को हमारे दलित भाइयों को इस समय अवश्य समझना चाहिए । जिन लोगों ने 1947 में इस चेतावनी को नहीं समझा था उन्होंने पाकिस्तान या बांग्लादेश में जाकर या रहकर इसके घातक परिणाम भुगतकर देख भी लिए हैं । इतना ही नहीं अभी हरियाणा के मेवात में जो कुछ हमारे हरिजन भाइयों के साथ मुस्लिमों ने किया है वह भी इसी असावधानी का परिणाम है कि लोगों ने बाबा साहेब की चेतावनी को समझा नहीं।

राष्ट्रीय मुसलमान होना भ्रामक है

कांग्रेस ने हिन्दू महासभा जैसे राष्ट्रवादी संगठनों के राष्ट्रवादी विचारों का उपहास उड़ाते हुए उस समय कुछ मुस्लिमों के राष्ट्रवादी मुसलमान होने का भी एक पाखण्ड रचा था। जो लोग कांग्रेसी मंच पर आकर हिन्दू महासभा या भारतवर्ष की संस्कृति और इतिहास नायकों को गाली देते थे उन्हें कांग्रेस के लोग महिमामण्डित करते हुए राष्ट्रवादी मुसलमान होने की संज्ञा दिया करते थे । ऐसे राष्ट्रवादी मुसलमानों के लिए इतना होना ही पर्याप्त था कि वे मुस्लिम लीगी न होकर कांग्रेस के होने का नाटक करते थे । यद्यपि अपने अन्तर्मन से वह मुस्लिम लीग का भी कहीं ना कहीं समर्थन करते पाए जाते थे । कांग्रेस की विचारधारा दोगली रही । अतः कांग्रेस के मंच भी इस दोगलेपन से अछूते नहीं थे । यही कारण था कि कांग्रेस के मंचों पर छद्मवेशी लोग अपने आपको राष्ट्रवादी कहते रहे और कांग्रेस उन्हें राष्ट्रवादी होने का प्रमाण पत्र देती रही। यद्यपि इसी समय इन छद्मवेशियों को पहचानने में यदि कोई व्यक्ति सबसे अधिक सफल हो रहा था तो वह बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर थे।

इस सन्दर्भ में उन्होंने लिखा -”लीग को बनाने वाले साम्प्रदायिक मुसलमानों और राष्ट्रवादी मुसलमानों के अन्तर को समझना कठिन है। यह अत्यन्त सन्दिग्ध है कि राष्ट्रवादी मुसलमान किसी वास्तविक जातीय भावना, लक्ष्य तथा नीति से कांग्रेस के साथ रहते हैं, जिसके फलस्वरूप वे मुस्लिम लीग् से पृथक पहचाने जाते हैं। यह कहा जाता है कि वास्तव में अधिकांश कांग्रेसजनों की धारणा है कि इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है, और कांग्रेस के अन्दर राष्ट्रवादी मुसलमानों की स्थिति साम्प्रदायिक मुसलमानों की सेना की एक चौकी की तरह है। यह धारणा असत्य प्रतीत नहीं होती। जब कोई व्यक्ति इस बात को याद करता है कि राष्ट्रवादी मुसलमानों के नेता स्वर्गीय डॉ. अंसारी ने साम्प्रदायिक निर्णय का विरोध करने से इंकार किया था, यद्यपि कांग्रेस और राष्ट्रवादी मुसलमानों द्वारा पारित प्रस्ताव का घोर विरोध होने पर भी मुसलमानों को पृथक निर्वाचन उपलब्ध हुआ।” (पृ. 414 - 415 )

भारत में इस्लाम का बीजारोपण मुस्लिम आक्रान्ताओं की देन


भारत में मुस्लिम आक्रमणकारियों के अत्याचारों पर वर्तमान इतिहास या तो मौन साध जाता है या उनका वर्णन कुछ इस प्रकार करता है कि उस समय इस प्रकार की बर्बरता शासकों में सर्वत्र पाई जाती थी अर्थात मुस्लिमों का उस समय बर्बर होना कोई बड़ी बात नहीं थी । संपूर्ण संसार में ऐसा होना उस समय का एक प्रचलन था । इस प्रकार के इतिहास लेखन से हिंदू समाज के लोग भ्रमित हो जाते हैं । उन्हें लगता है कि शायद उस काल के विषय में यही सत्य है। वर्तमान इतिहास में कुछ ऐसे भी भ्रम पैदा किए गए हैं जिनसे लगता है कि मुस्लिम आक्रमणकारी भारत में इस्लाम के जनक नहीं थे । उन्होंने अपनी तलवार के बल पर इस्लाम को भारत में नहीं फैलाया । इसके विपरीत सत्य यह है कि धीरे-धीरे जब इस्लाम भारत के वैदिकधर्मियों के सम्पर्क में आया तो उन्हें लगा कि इस्लाम के भीतर बहुत सारे ऐसे गुण हैं जो उनके स्वयं के धर्म में भी नहीं मिलते । फलस्वरूप उन्होंने स्वेच्छा से इस्लाम स्वीकार किया।

इस भ्रांति का निवारण करते हुए भीमराव अम्बेडकर जी लिखते हैं :-- ”मुस्लिम आक्रान्ता निस्संदेह हिन्दुओं के विरुद्ध घृणा के गीत गाते हुए आए थे। परन्तु वे घृणा का वह गीत गाकर और मार्ग में कुछ मन्दिरों को आग लगा कर ही वापस नहीं लौटे। ऐसा होता तो यह वरदान माना जाता। वे ऐसे नकारात्मक परिणाम मात्र से सन्तुष्ट नहीं थे। उन्होंने इस्लाम का पौधा भारत में लगाते हुए एक सकारात्मक कार्य भी किया। इस पौधे का विकास भी उल्लेखनीय है। यह ग्रीष्म में रोपा गया कोई पौधा नहीं है। यह तो ओक (बांज) वृक्ष की तरह विशाल और सुदृढ़ है। उत्तरी भारत में इसका सर्वाधिक सघन विकास हुआ है। एक के बाद हुए दूसरे हमले ने इसे अन्यत्र कहीं भी अपेक्षाकृत अपनी ‘गाद’ से अधिक भरा है और उन्होंने निष्ठावान मालियों के तुल्य इसमें पानी देने का कार्य किया है। उत्तरी भारत में इसका विकास इतना सघन है कि हिन्दू और बौद्ध अवशेष झाड़ियों के समान होकर रह गए हैं; यहाँ तक कि सिखों की कुल्हाड़ी भी इस ओक (बांज) वृक्ष को काट कर नहीं गिरा सकी।” (पृ. 49) बात स्पष्ट है कि भारत में इस्लाम का प्रचार - प्रसार और विस्तार इस्लाम की उस तलवार ने किया जो इस्लाम के तथाकथित बादशाहों के हाथों में रही या उनके उन सैनिकों के हाथों में रही जो उनके इशारे पर हिन्दुओं को लूटना और उनकी औरतों के साथ बलात्कार करना या उन्हें बलात अपने घर में रखना अपना नैसर्गिक अधिकार मानते थे।

साम्प्रदायिक दंगे इस्लाम का मौलिक संस्कार


भारत में यदि निष्पक्ष रूप से साम्प्रदायिक दंगों का इतिहास लिखा जाए तो यह तथ्य स्थापित हो जाएगा कि भारत में साम्प्रदायिक दंगे उतने ही पुराने हैं जितना पुराना इस्लाम है। मुस्लिम बादशाहों या सुल्तानों के काल में सुनियोजित ढंग से होने वाले नरसंहार इन सांप्रदायिक दंगों का वह वीभत्स स्वरूप था जब हिंदू केवल और केवल एक असहाय और निरीह प्राणी के रूप में इनकी तलवार का शिकार बनता था , परन्तु उन अत्याचारों को भुला देने की बात वर्तमान इतिहास करता है । जिससे यह भ्रम स्थापित हो जाता है कि भारतवर्ष में साम्प्रदायिक दंगे तो अंग्रेजों या उसके बाद स्वतन्त्र भारत में होने आरम्भ हुए जब हिन्दुओं का शासन हुआ । इससे ऐसा लगता है कि जैसे भारतवर्ष में अंग्रेजों और हिन्दुओं ने ही मुसलमानों के विरुद्ध साम्प्रदायिक दंगे कराने आरम्भ किए । उससे पहले इस्लाम तो भाईचारे के आधार पर शासन कर रहा था । जिसका परिणाम यह भी हुआ है कि भारतवर्ष में हिन्दू समाज को हिंसक और असहिष्णु समाज के रूप में स्थापित करने की जोरदार वकालत होने लगी ।

उससे पहले इस्लाम के शासनकाल में कहीं साम्प्रदायिक दंगों का कोई उल्लेख नहीं है , जो लोग इस प्रकार की मूर्खतापूर्ण बातें स्थापित कर इतिहास को भ्रम और सन्देह की पोटली बनाकर प्रस्तुत करते हैं , उन्होंने भारत के साथ बहुत बड़ा बड़ा धोखा किया है , क्योंकि उन्होंने ऐसी मान्यता को स्थापित कर भारत के अत्यन्त उदार और मानवता प्रेमी हिन्दू या वैदिक धर्म को असहिष्णु और दूसरों पर अत्याचार करने वाले समाज के रूप में स्थापित कर दिया है । जिससे मुस्लिमों की अंधी साम्प्रदायिक नीतियों और राजनीति को भी मानवता प्रेमी दिखाने में यह लोग किसी सीमा तक सफल हो गए हैं। बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने इस भ्रांति को तोड़ते हुए अपनी पुस्तक में लिखा :--”तीसरी बात, मुसलमानों द्वारा राजनीति में अपराधियों के तौर-तरीके अपनाया जाना है। दंगे इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि गुंडागर्दी उनकी राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है।” (पृ. 267) दंगों को मुस्लिमों की गुंडागर्दी कहने का साहस कांग्रेस के गांधीजी और नेहरू नहीं कर पाए , परन्तु भीमराव अंबेडकर जी ऐसे पहले नेता हैं , जिन्होंने मुस्लिमों के दंगा प्रेम को उनकी राजनीतिक गुंडागर्दी का नाम दिया।

बाबासाहेब का यथार्थवादी इतिहास दर्शन

इतिहास में ऐसे अनेकों उदाहरण हैं , जब मुसलमानों ने हिन्दुओं के नरसंहार करने वाले लोगों को हिन्दुओं के द्वारा युद्ध क्षेत्र में मारे जाने पर शहीद का दर्जा दिया । आज हम उन्हें इतिहास में इसी नाम से सम्मान के साथ बुलाते हैं । इतिहासकारों की इसी सोच के चलते हमारे अनेकों वीर योद्धा जहाँ इतिहास में उपेक्षा की भट्टी में डाल दिए गए , वहीं जो लोग मानवता के हत्यारे रहे , उन्हें सम्मान देने के लिए हम बाध्य कर दिए गए या कहिए कि अभिशप्त कर दिए गए। स्वामी श्रद्धानन्द जी जैसे आर्य संन्यासी के हत्यारे को गांधीजी ने भाई कहकर सम्मान के साथ बुलाया। इसी प्रकार देश का बंटवारा करने वाले जिन्नाह को भी 'कायदे आजम' कहने वाले गांधी ही पहले व्यक्ति थे।
आज ऐसे अनेकों लोग हैं जो बाबासाहेब का नाम लेकर गांधी जी के इस हिन्दू विरोधी इतिहास दर्शन को उचित मानते हैं और कुछ ऐसा प्रदर्शन करते हैं जैसे अंबेडकर जी भी गांधी जी के इस दृष्टिकोण से सहमत थे । जबकि सच यह है कि अम्बेडकर जी का इतिहास दर्शन नितान्त यथार्थ पर आधारित था । वह यथार्थवादी दृष्टिकोण के साथ इतिहास को समझने का प्रयास करते थे और इसी रूप में इतिहास को प्रस्तुत करना भी अपना नैतिक दायित्व समझते थे।

अपने इस इतिहास दर्शन को स्पष्ट करते हुए बाबासाहेब ने अपनी उपरोक्त पुस्तक में लिखा -”महत्व की बात यह है कि धर्मांध मुसलमानों द्वारा कितने प्रमुख हिन्दुओं की हत्या की गई ? मूल प्रश्न है उन लोगों के दृष्टिकोण का, जिन्होंने यह कत्ल किये। जहाँ कानून लागू किया जा सका, वहाँ हत्यारों को कानून के अनुसार सज़ा मिली; तथापि प्रमुख मुसलमानों ने इन अपराधियों की कभी निन्दा नहीं की। इसके विपरीत उन्हें ‘गाजी’ बताकर उनका स्वागत किया गया और उनके क्षमादान के लिए आन्दोलन शुरू कर दिए गए। इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण है लाहौर के बैरिस्टर मि. बरकत अली का, जिसने अब्दुल कयूम की ओर से अपील दायर की। वह तो यहाँ तक कह गया कि कयूम नाथूराम की हत्या का दोषी नहीं है, क्योंकि कुरान के कानून के अनुसार यह न्यायोचित है। मुसलमानों का यह दृष्टिकोण तो समझ में आता है, परन्तु जो बात समझ में नहीं आती, वह है श्री गांधी का दृष्टिकोण।”(पृ. 147 - 148)

जब गांधी जी 'हिन्दू मुस्लिम - भाई -भाई' का नारा लगा रहे थे तब बाबासाहेब यहाँ पर भी अपना वास्तविक और न्याय संगत दृष्टिकोण हिन्दू और मुसलमान के विषय में प्रस्तुत कर रहे थे । गांधीजी नितान्त काल्पनिक दृष्टिकोण को अपनाकर ऐसी दो विचारधाराओं को एक साथ बैठाने का प्रयास कर रहे थे , जिसमें दोनों का एक साथ बैठना सम्भव ही नहीं था। क्योंकि एक विचारधारा दूसरी विचारधारा को समाप्त कर सर्वत्र अपना परचम लहराना चाहती थी और दूसरी विचारधारा अपनी सहिष्णुता और उदारता के कारण उसे स्वीकार करना तो चाहती थी , परंतु इस शर्त पर ही स्वीकार करना चाहती थी कि वह अपनी परम्परागत कार्य नीति और कार्य योजना को छोड़े तो कोई बात बने ।

इस पर गांधीजी का एक ही तर्क रहता था कि जैसे भी हो हिन्दुओं को मुसलमानों को गले लगाना ही चाहिए । वे अपनी प्रवृत्ति छोड़े या न छोड़ें परंतु हिंदू उनके हाथों कटता - मिटता रहे और यह सब कुछ स्वीकार करके उन्हें गले लगाता रहे । इसके विपरीत डॉ अम्बेडकर एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाकर चलने वाले राजनीतिज्ञ थे । उन्होंने स्पष्ट रूप से अपनी उपरोक्त पुस्तक में यह लिखा कि हिन्दू और मुसलमान दोनों ही अलग-अलग प्रजातियां हैं । स्पष्ट है कि प्रजातियां अपना अलग-अलग अस्तित्व बनाए रखना चाहती हैं। यद्यपि वैदिक धर्म में विश्वास रखने वाले लोगों का मानवतावाद सबको गले लगाकर चलने में विश्वास रखता है , परन्तु यह मानवतावाद इतना सरल भी नहीं है कि जो इसको काट रहा हो यह उसे भी अपना मानने की मूर्खता करे । जो इसकी नीतियों में विश्वास रखता है और मानवतावाद को सर्वोपरि मानता है , उसके साथ यह अपना कलेजा सौंपकर चलने में विश्वास रखता है और जो कलेजा खाकर दूसरों को साथ लेने की बात करता हो , उससे यह वैसे ही दूरी बनाता है जैसे एक प्रजाति दूसरी प्रजाति से दूरी बनाती है।

बाबासाहेब ने इस संबंध में स्पष्ट लिखा है कि :-- ” आध्यात्मिक दृष्टि से हिन्दू और मुसलमान केवल ऐसे दो वर्ग या सम्प्रदाय नहीं हैं जैसे प्रोटेस्टेंट्‌स और कैथोलिक या शैव और वैष्णव हों , बल्कि वे तो दो अलग-अलग प्रजातियां हैं।” (पृ. 185 )

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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