यह समय आर्थिक नीतियों की समीक्षा का है।



यह समय आर्थिक नीतियों की समीक्षा का है।

दुलीचंद कालीरमन

कोरोना वायरस को लेकर दुनिया के लगभग सभी देश इसके लिए चीन को आरोपित कर रहे हैं। दाल में कुछ काला भी है। आखिर चीन ने अपने देश में कोरोना को इतना जल्दी कैसे नियंत्रण कर लिया और इस वायरस को वुहान से बाहर भी नहीं फैलने दिया। जबकि बाकी विश्व में मृतकों की संख्या दो लाख के आंकड़े को पार कर गई है। चीन  कोरोना वायरस संबंधी कोई भी सूचना सांझी नहीं कर रहा है, केवल माल बेच रहा है, व्यापार बढ़ा रहा है।

 भारत अपनी संकल्प शक्ति व सरकार द्वारा समय पर लिए गए लॉकडाउन के निर्णयों से हम बीमारी के ग्राफ को झुकाने में सफल हुए हैं। हमें लॉकडाउन के कारण आर्थिक कीमत भी चुकानी पड़ी है। लेकिन आज एक सवाल बड़ा प्रासंगिक हो जाता है कि क्या वैश्वीकरण और निजीकरण के बलबूते कोरोना की लड़ाई लड़ी और जीती जा सकती थी?

जिस एयर इंडिया को घाटे का सौदा बताकर बेचने के प्रयास हो रहे थे, लेकिन कोई भी खरीददार नहीं मिल रहा था। याद कीजिए विदेशों से भारतीयों को निकालकर यही एयर इंडिया ही लेकर आई थी। कोरोना  के खिलाफ युद्ध में एक सैनिक की तरह लड़ रहे डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, पुलिस, सफाई कर्मचारी क्या किसी निजी कंपनी के हैं ?

 सरकार अपने संसाधनों के बिना कुछ नहीं कर सकती थी। यह एयर-इंडिया, स्वास्थ्य विभाग, रेलवे, क्या  इन के बिना कोरोना से लड़ा जा सकता था ? अकेले रेलवे ने ही एक लाख से ज्यादा बिस्तरों की व्यवस्था अपनी रेलों में कर दी है। माल गाड़ियों के माध्यम से देश में कहीं भी खाद्यान्न व दूसरी जरूरत की चीजों की कमी नहीं होने दी।

जो संस्थाएं, नीति-निर्माता या व्यक्ति हर समस्या का समाधान निजीकरण में ढूंढते थे, वे जरा स्थिति का अनुमान लगाएं कि अगर यह सभी सेवाएं निजी हाथों में होती तो क्या होता ? क्या हम तब  इतनी सफलता और कुशलता से कोरोना से लड़ सकते थे ?

 वैश्वीकरण का भी यही हाल है। सभी को पता है कि इस सारे संकट के पीछे चीन है। लेकिन कोई भी देश खुलकर कुछ भी ज्यादा नहीं बोल पा रहा। क्योंकि टेस्टिंग किट भी चीन से चाहिए, वेंटिलेटर भी वही देगा और डाक्टरों के लिए पर्सनल प्रोटक्शन इक्विपमेंट चीन से ही आएंगे। यह स्थिति है कि कोई मारे भी और रोने भी नहीं देता।

 भारत में कोरोना का कहर नियंत्रण में रहने का एक अन्य कारण हमारा खानपान है। जिससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी रहती है। अब तो आयुष मंत्रालय ने देशी काढ़े व अन्य रसोई में प्रयोग होने वाली हल्दी, इलायची, काली-मिर्च, दालचीनी की उपयोगिता पर अपनी मुहर लगा दी है। भारतीय मौसम के हिसाब से हमें अपनी देशी खानपान व जीवन शैली को अपनाए रखना होगा।

कोरोना के बाद की विश्व-व्यवस्था बिल्कुल अलग होगी। जिस प्रकार “विश्व स्वास्थ्य संगठन” जैसे संगठनों पर उंगलियां उठ रही हैं। “विश्व व्यापार संगठन” पहले ही मृत प्राय हो चुका है। हर देश की प्राथमिकता स्वावलंबन की दिशा में होगी। वैश्विक आर्थिक मंदी तो आना लाजमी है। चीन दुनिया की नजरों में विलेन बन चुका है। भारत की अपनी आबादी ही 130 करोड़ है। हमारे यहां मांग में कमी नहीं आएगी बल्कि यहां स्वयं के उद्योग लगाने के लिए सरकारों को प्रोत्साहन देने के अपने प्रयासों को और भी तेज करना होगा ताकि वे स्वावलंबी हो और भारत की बेरोजगारी की समस्या भी दूर हो सके। विकसित देशों की जो बड़ी-बड़ी कंपनियां चीन में अपने कारखाने चला रही थी, वे भारत का रुख करेंगी। ऐसे में हमें अपनी प्राथमिकताएं और शर्तें अपनी अग्रिम योजनाओं के अनुसार तय करनी होंगी।

एक कहावत हैं कि संकट काल में ही किसी भी व्यक्ति की सर्वोच्च क्षमता का पता चलता है। भारतीय उद्योग जगत ने इतने कम वक्त में वेंटिलेटर, टेस्टिंग किट, पर्सनल प्रोटक्शन इक्विपमेंट बना कर यह साबित कर दिया है। आर्थिक मंदी के दौर में सरकार को आर्थिक मदद देने के लिए भारतीय उद्यमी भी पीछे नहीं रहे। हम दिन रात-दिन विदेशी ब्रांड को धारण करके आधुनिक होने का गर्व करते हैं। वे विदेशी कंपनियां इस लड़ाई में कहीं नहीं दिखाई दी।

 अब सरकारों तथा आम नागरिकों की यह जिम्मेदारी है कि वर्तमान परिस्थितियों में कोरोना काल से सबक लेकर अपनी प्राथमिकताएं तय करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की पंचायतों के सरपंचों के साथ अपने संबोधन में यह कहा था कि यह समय स्वावलंबन की सीख दे रहा है। स्वावलंबन के लिए स्वदेशी और ग्राम आधारित रोजगारपरक उद्धयोग ही आशा की किरण है । आशा है कि आगामी नीतियाँ इसी दिशा में बनेगी ताकि भारत अपनी बुनियादी समस्याओं से निबट सके तथा विश्व गुरु का अपना स्थान पुन: प्राप्त कर सके।


दुलीचंद कालीरमन
करनाल
9468409948

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