एक बुराई ..... छोड़ दूं???---प्रीति शर्मा "असीम"



एक बुराई ..... छोड़ दूं???


प्रीति शर्मा "असीम"


मैं किस-किस से लडूँगा ।
इस समाज के ,
उस हिस्से से लडूं .....
जिसमें औरत
और मर्द के लिए
अलग-अलग मापदंड हैं ।

जहां औरत आज भी ,
अपनी पहचान की पबंध है ।

बेटियां काबिल
होकर भी ,
बाप पर बोझ हैं ।

बेटी बचाओ की आड़ में ,
बेटी न हो,
आज भी यहीं सोच है।

बलात्कारी की पैरवी में ,
झूठी गवाही चलती है ।

झूठी शान के लिए ,
प्यार की बलिबेदी पर,
आज भी बेटियां चढ़ती हैं।

मैं किस -किस से लडूंगा।
समाज के ,
उस हिस्से से,
उन औरतों से लडूं ।

जो अपनी आजादी का ,
नाजायज फायदा उठाती हैं।

रिश्तो को,
तार-तार कर जाती हैं ।
कानूनी दांव-पेचों से  ,
पुरुषों को हराती हैं ।
अपने फायदे ,
निकालने के लिए दहेज,
बलात्कार,
अत्याचार के झूठे
मुकदमे करवाती है।

मैं किस- किस से लडूंगा।

या समाज की,
उस सोच से लडूं।
जहां कोई बोलता  ही नहीं

समाज ,,,,,,,,,,,,,क्या कहेगा???
प्रताड़ना सहते  रहते।

वो ...............औरत हो
या मर्द समाज के डर से ,
जब कह नहीं पायेंगा।
अपने हालातों से,
कैसे निकल पायेंगा।
खुद को खुद में,
दफन कर जायेंगा।

मैं किस किस से लडूंगा।

समाज के,
उस हिस्से से लडूं।
हिन्दू-मुस्लिम,
भेदभाव से भरे ,
आरक्षण के अंधकार से।

किस से कहूँ......
ना नाश करें ।
इन्सानियत पर,
भरोसा करें।।

समाज में,
किस-किस से लडूं ।

जहां जुबाने हैं ।
सबकी दो -धारी ।

किसी के दोस्त नहीं ,
दिलों में है दुश्मनी भरी ।
हर एक के मुंह पर ,
उसके जैसे हो जाते है।

हम क्यों बुरे बने ।
यह कह घर पीछे  हट जाते है ।।

मैं क्या -क्या कहूं -------।
मैं किस किस से लडूं।

उस प्रशासन से लडूं ।
जिसमें देश की,
अहमियत से बड़ी,
सियासत हो जाती है ।
वोट को लेने के लिए,
चोर बाजारी हो जाती है ।।

उन स्कूलों से लडूं ,
जिनमें मां सरस्वती की ,
नीलामी हो जाती है ।

उन लोगों से लडूं।
जो चंद पैसों के लिए ,
जिंदगी में मिलावट कर जाती है।

या फिर
अपनी सोच से लडूं।
छोड़ दूं ।
यह सोच .......क्यों
बार-बार
मेरी सोच पर ,
हावी हो जाती है।


प्रीति शर्मा "असीम"
नालागढ़ ,हिमाचल प्रदेश

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