कच्चा तेल सस्ता तेल, मंहगा क्यों बिक रहा देश में

कच्चा तेल सस्ता तेलमंहगा क्यों बिक रहा देश में


लिमटी खरे
कोरोना कोविड 19 के चलते समूची दुनिया में तेल की कीमतें इतिहास में सबसे गिरावट के दौर से गुजर रही हैं। इंटरनेशनल मार्केट में कच्चा तेल पिछले तीन माह में छप्पन डालर प्रति बैरल से गिरकर महज 22 डालर पर जा पहुंचा है। इस हिसााब से भारत की तेल कंपनियों के द्वारा 19 डालर प्रति बैरल के हिसाब से अप्रैल माह में कच्चा माल खरीदा था।
जब समूची दुनिया में कच्चे तेल के दाम अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुके हैं तब सूबाई सरकारों के द्वारा पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी का फैसला हैरान करने वाला ही माना जा सकता है। जब कच्चा तेल महंगा खरीदा जा रहा था तब जो दाम से उन दामों से ज्यादा दाम पर अगर यह तब बिक रहा है जब तेल के दाम जमीन पर गिरे हैं।
इसका सीधा तातपर्य है कि जब भी पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें कर लादकर बढ़ाई जाती हैं, तो उसका सीधा असर जनता पर ही पड़ता है। टोटल लॉक डाउन में कर संचय न करने वाली सरकारों के द्वारा पेट्रोलियम पदार्थों पर वेट बढ़ाकर इसका बोझ जनता पर ही डालने का प्रयास किया गया है।
असम और तेलंगाना के बाद देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब, झारखण्ड आदि राज्यों ने पेट्रोल डीजल पर वेट बढ़ा दिया गया है। राज्यों में पेट्रोल पर दो रूपए और डीजल पर सात रूपए की बढ़ोत्तरी की गई है। डीजल मंहगा होने का मतलब है सामग्रियों का परिवहन मंहगा होना और डीजल का सबसे ज्यादा उपयोग किसानों के द्वारा किया जाता है।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पिछले तीन माहों में कच्चे तेल के दामों में लगभग साठ फीसदी की गिरावट दर्ज किए जाने के बाद भारत में तेल कंपनियो के द्वारा लगभग उन्नीस डालर प्रति बैरल की दर से कच्चा तेल खरीदे जाने के बाद भी पेट्रोल एवं डीजल के दामों में कमी न किए जाने से तेल कंपनियों की मंशा पर सवाल उठने लाजिमी ही हैं। जब कच्चा तेल सस्ता खरीदा जा रहा है तब देश में पेट्रोल और डीजल सस्ता बिकना चाहिए। याद पड़ता है कि 1987 में खाड़ी युद्ध के दौरान सरकार के द्वारा खाड़ी युद्ध के चलते पेट्रोल पर तीन रूपए का खाड़ी अधिभार लगाया गया था। इसके बाद 33 साल में भी इस तीन रूपए की बढ़ोत्तरी को कम नहीं किया गया है। कहने का तातपर्य महज इतना ही है कि जो बढ़ गया सो बढ़ गया, वह अब शायद ही कम हो पाए।
इतना ही नहीं लगभग तीन माहों से पेट्रोल एवं डीजल के दामों में स्थिरता ही दिख रही है। राज्य सरकारों को पहले ही पेट्रोल एवं डीजल की मद से भारी भरकम राजस्व की प्राप्ति हो रही थी, फिर इस आपदा के समय इसके दामों में बढ़ोत्तरी आखिर क्यों की जा रही है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में कमी का फायदा आम जनता को क्यों नहीं मिल पाया!
यह बात भी कही जा रही है कि इस तरह के करारोपण आदि से उपभोक्ताओं पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। इसका बोझ तेल कंपनियों पर होगा, जो सस्ते दाम में इसे समायोजित करेंगी। इसका तातपर्य यही लगाया जा सकता है कि इससे संचित राजस्व का बड़ा हिस्सा सरकार के खाते में ही पहुंचेगा।
यह बात भी साफ दिखाई दे रही है कि कोरोना के संक्रमण के चलते सरकारों की माली हालत भी बहुत ही खराब हो चुकी है। सरकारें अपनी वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए पेट्रोल, डीजल और शराब का सहारा लेने पर मजबूर होती दिख रही हैं। सरकारों को यह नहीं भूलन चाहिए कि पेट्रोल और डीजल की दरों के बढ़ने का सीधा असर आम जनता पर ही पड़ता है। इससे माल ढुलाई मंहगी होगी और मंहगाई बढ़ेगी। लगभग पचास दिनों से घरों पर बैठे लोगों को वैसे भी घर चलाना मुश्किल हो रहा है तब पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाकर सरकार उनकी दुश्वारियां ही बढ़ाती दिख रही है।
आप अपने घरों में रहें, घरों से बाहर न निकलें, सोशल डिस्टेंसिंग अर्थात सामाजिक दूरी को बरकरार रखें, शासन, प्रशासन के द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए घर पर ही रहें।


लिमटी खरे
(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

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