मातृभूमि की मुक्तता के लिए प्रत्येक स्तर पर निरंतर प्रयासरत रहने वाले स्वातंत्र्यवीर सावरकर।


स्वतंत्रता वीर सावरकर

सुरेश मुंजाल
     
भारत काे स्वातंत्र्य दिलवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई    भारतमाता के वीर सुपुत्र क्रांतीकारियों ने ! ऐसे क्रांतिकारियों में प्रथम स्थान प्राप्त करनेवाले, अर्थात  स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर ! ‘सावरकर का दूसरा अर्थ, अर्थात ‘तप’, ‘तेज’, ‘त्याग’, ‘तारुण्य/याैवन’, तीक्ष्ण/धारदार ‘तलवार’, यह उद्गार पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयीजी के है। उनके इस वाक्य से ही सावरकरजी का अधिकार कितना बडा था, इसकी थोडी बहुत कल्पना हम कर सकते है। 

   ऐसे सूर्य के समान तेजस्वी सावरकरजी पर काँग्रेस के पूर्व  अध्यक्ष राहुल गांधी आैर संपूर्ण ‘टुकडे टुकडे गैंग’ आग बरसा रही है। उनके बारे में झूठी बाते फैलाकर समाज का बुद्धिभेद किया जा रहा है. उनके बारे में  ग़लत वक्तव्य किया जा रहा है।   इस पार्श्वभूमिपर सावरकरजी के तेजस्वी  जीवन के कुछ अंश यहाँ दे रहे है.

       क्रांतिकार्य के अतुलनीय कार्य के लिए स्वातंत्र्यवीर सावरकरजी काे ब्रिटिशों ने अंदमान में काले पानी की 50 वर्ष की कारावास की सजा सुनाई । तब स्वातंत्र्यवीरजी ने ‘मेरा क्या हाेगा ?’, ऐसे नही कहा, उन्हाेंने  न्यायालयमें ही न्यायाधीशाें काे आवेशसे पूछा कि, ‘मेरे दंड पूर्ण होने तक तुम इस देश में रहाेगे क्या ?

इस संदर्भ में लेखक श्री. श्रीकांत विठ्ठल ताम्हनकर कहते है, ‘हम जो नारियल बाजार से लाते है, उस नारियल पर एक सख्त कवच रहता है। ऐसे कवचवाले नारियल काे छिलकेवाला नारियल कहते है। ऐसे छिलकेवाले नारियल का सख्त कवच निकालना आैर बीचवाले आवरण काे हटा कर के उसमें रेशा निकालना, इसकाे ‘छिलका कुटना’ कहते है. ऐसे रेशे को कूट के १ किलो रस प्रतिदिन निकालने से उनके हाथ छिलकर रक्त से भर जाते थे.

      श्री. ताम्हनकर आगे कहते है  कि , ‘अाजकल घर में उपयाेग में लानेवाला तेल बाेतल अथवा थैली में मिलता है. कोल्हूपर (घाणी) तेल कैसे निकलता है, यह अनेक लोगों को ज्ञात नही होता पहले कोल्हू से तेल निकालने के लिए बैल या भैस का प्रयोग करते थे। 

 अंदमान में कारागृह अधिकारी यातना देने के लिए पशुओं की जगह बंदियों का प्रयोग करते थे। लंगोट पहनकर तेल के घाणी काे खींचना पडता था और प्रतिदिन कम से कम 15 किलो तेल प्रत्येक बंदी काे निकालना पडता था। गति अल्प हाेने पर, पीठपर मारते थे। कोल्हू घुमाते घुमाते भाेजन करना पडता था। शरीर से बहनेवाले पसीने के साथ अन्न ग्रहण करना पडता था।
पीनेका पानी दिन में २ कटोरी से अधिक नही मिलता था। 

    यह दंड उपराेक्त २ दंडों की तुलना में कम हाेती थी; परंतु वॉर्डन मुसलमान हाेने के कारण यह छूट मुसलमान कैदियों काे ही अधिक मिलती थी, अन्य  कैदियाें के साथ मिलना ना हाे, इसलिए  दीवार काे लगे हुए लाेहे के हुक से बेडी के साथ हाथ बांध दिए जाते थे। पैर व हाथों मे लोहे के छल्ले चेन से बंधे रहते थे। ऐसी स्थिती में बंदियों काे दो दो दिन-रात खडा हाेना पडता था। मलमूत्र विसर्जन वहीं करना पडता था आैर बाद में उसे स्वयं काे ही साफ करना पडता था। 

    30 अगस्त 1911 से 20 फरवरी 1912 तक अर्थात लगभग 6 महीने स्वातंत्र्यवीर सावरकरजी काे इस प्रकार का दंड दिया गया। अन्य  किसी के  साथ भी उनका उस समय संपर्क नही हाेने दिया ।भारतमाता के स्वतंत्रता के लिए इस प्रकार की भयंकर यातना सहनेवाले स्वातंत्र्यवीराें पर आरोप करनेवाले इन नतद्रष्टाेंकी पात्रता है क्या ? आगे दिये गए सूत्राें से सावरकरजी का दिव्यत्व ध्यान में आयेगा। 

1.वीर सावरकर ने मातृभूमि की जयकार की इसलिए सावरकर ब्रिटिश सरकार का अनुदान प्राप्त करने वाले कॉलेज के छात्रावास से निकाले जाने वाले 'पहले भारतीय छात्र' थे।

2. लोकमान्य तिलक, परांजपे आदि के साथ सार्वजनिक रूप से पुणे में विदेशी कपड़ों की विशाल होली जलाने वाले वह 'पहले भारतीय नेता' वीर सावरकर हैं!

3. ऐसे समय में जब 'राज्य ’या स्वराज्य’ सिर्फ एक शब्द था, तब संपूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता ’भारत का लक्ष्य घोषित करने वाले सावरकर' पहले राजनीतिक नेता’ थे।

4 वीर सावरकर ने विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा व्यक्त की; इसलिए जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने 'बैरिस्टर' की उपाधि से वंचित कर दिया था, स्वातंत्रय वीर सावरकर ऐसे 'पहले बैरिस्टर!'

5. देशभक्ति दिखाई तो सावरकर जी की डिग्री भारतीय विश्वविद्यालय ने वापिस ले ली थी, ऐसे 'पहले स्नातक!'

6. सावरकर भारतीय स्वतंत्रता के प्रश्न को अंतर्राष्ट्रीय महत्व देने वाले 'पहले भारतीय स्नातक नागरिक' थे।

7. सावरकर एक पुस्तक के पहले लेखक हैं जिनकी पुस्तकों को प्रकाशित या प्रकाशित होने से पहले दोनों देशों की सरकारों द्वारा जब्त कर लिया गया था।

8. सावरकर, जिन्होंने ब्रिटिश अदालत के अधिकार का उल्लंघन किया, वह 'पहले विद्रोही भारतीय नेता' थे!

9. सावरकर "विश्व के पूरे इतिहास में पहले राजनीतिक कैदी थे !" (सावरकर "हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में गिरफ्तार होने वाले"विश्व इतिहास में पहले राजनीतिक कैदी थे ।)

10. जब कागज़-लेखन के साधन उपलब्ध नहीं थे, तो उन्होंने जेल की दीवार के किनारे एक कांटे के से 'कमला' जैसी सुंदर कविताएँ लिखीं और वैदिक दृढ़ता के साथ छंद के उन सहस्राब्दियों को याद किया और फिर उन्हें दूसरों के माध्यम से भारत में प्रस्तुत किया।

11. सावरकर, जिन्होंने स्वेच्छा से मृत्यु का सामना किया और एक तरह से आत्मसमर्पण किया जो केवल योगी पुरुषों के अनुरूप थे, 'पहले सशस्त्र क्रांतिकारी!'

12. 15 वर्ष की उम्र में, सावरकर स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र क्रांति की शपथ लेने वाले पहले क्रांतिकारी बन गए।

13. दो बार आजीवन कारावासों की अमानवीय सजा दी गई फिर भी 'यह सरकार क्या 50 वर्ष चलेगी? ', ऐसी अंग्रेजों को चुनौती देने वाले स्वातंत्र्यवीर सावरकर पहले नेता! 

14. स्वातन्त्र्यवीर सावरकर, प्रथम धर्मवीर जिन्होंने आजीवन कारावास और प्रतिबंध के दौरान भी हिन्दू धर्म की हानि को रोकने के लिए पवित्रता की नींव रखी, जिन्होंने रत्नागिरि काल में अस्पृश्यता उन्मूलन का महान कार्य किया, वह 'प्रथम समाज सुधारक' हैं!

15. Government द फर्स्ट फिलॉसफर! ’(भारत की नेहरू सरकार ने हिंदू कोड बिल में वही परिभाषा अपनाई है), जो हिंदुत्व को हिंदू दर्शन की पृष्ठभूमि से वैज्ञानिक और मुक्त तरीके से परिभाषित करती है।

16. स्वातंत्र्यवीर सावरकर 17 वर्ष पहले ही भारत को विभाजन के खतरे से आगाह करने वाले पहले 'दूरदर्शी महापुरुष' थे।

   ये सूत्र साबित करते हैं कि सावरकर को 'क्रांतिकारियों का ताज' क्यों कहा जाता है। उन पर आरोप लगाना,उज्ज्वल सूरज पर थूकने के समान है । यह भी उतना ही सच है कि इस तरह के आरोप सावरकर की प्रतिभा को प्रभावित नहीं करेंगे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनके उत्तम विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए, भारत में जन्म होने वाले हर देशभक्त का मार्गदर्शन करते रहेंगे। इस महानता के लिए उनको मेरा हार्दिक अभिनन्दन!

लेखक

सुरेश मुंजाल 

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