सीता नवमी प्राकट्य दिवस पर विशेष



सीता नवमी प्राकट्य दिवस पर विशेष


राज शर्मा ( संस्कृति संरक्षक)

माता सीता भगवती लक्ष्मी की अंशरूपा त्रेतायुग में भगवान नारायण अवतारी श्रीराम चन्द्र की तमाम लीलाओं में समान रूप से सहभागी रही । सीता के जीवन चरित्र से नारियों को संकट की परमावस्था में भी उम्मीद की एक किरण जगा कर सभी संकटो को झेलने की प्रेरणा मिलती है ।

माता सीता मिथिला (जो वर्तमान में नेपाल का हिस्सा है )नरेश राजा जनक की पुत्री थी । जो उन्हें अकाल के समय धरती को स्वयं हल द्वारा जोतने के मंथन स्वरूप प्राप्त हुई थी । जनक नाम एक विभूषित उपाधि का नाम है जो उनके पूर्वजों द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के नाम से जोड़ता है । जनक का वास्तविक नाम सीरध्वज था जिनका जन्म वेजान देह के मंथन से हुआ था । इसीकारण इन्हें विदेहराज जनक भी कहते हैं। 

उद्भव स्थिति संहारकारिणीं हारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामबल्लभाम्॥

माता सीता का प्राकट्य दिवस वैशाख शुक्ल पक्ष नवमी तिथि को मनाया जाता है इसे सीता नवमी भी कहा जाता है इस वर्ष यह पर्व 2 मई को मनाया जाएगा । 

सीता नवमी का विशेष शुभ मुहूर्त
10:35 मिनट प्रातः से 01:11 दोपहर
नवमी तिथि का प्रारम्भिक काल
01 मई 01:24 दोपहर
नवमी तिथि का समाप्तिकाल
02 मई 11:33 मध्याह्न काल

सुनहु देव रघुवीर कृपाला, यहि मृग की अति सुन्दर छाला।
मारहु नाथ इसे तुम जाई, कृपा सिन्धु सुन्दर रघुराई।।

माता सीता का नाम सतीत्व की गरिमा को तदवद बनाए रखने के लिए मोक्ष की सीढ़ी का कार्य करता है । माता सीता को दर्शन शास्त्र  का गूढ़ ज्ञान था । 

माता सीता एक महारानी होने के साथ साथ धीर वीर वीरांगना भी है जिन्होंने आपत्ति काल में भी अपना धैर्य न खोया बल्कि आपत्ति के सामने पहाड़ बनकर खड़ी रही ।



राज शर्मा ( संस्कृति संरक्षक)
आनी कुल्लू हिमाचल प्रदेश

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