सज गयी मधुशाला - विनोद निराश



सज गयी मधुशाला

विनोद निराश, देहरादून

सूने गुरुद्वारे, सूना शिवाला,
सूनी पड़ी हर सू पाठशाला।
कर के बन्द मंदिर-मस्जिद  ,
वो खोल बैठे लो मधुशाला।

खुश होकर घूम रहा आज ,
सूनी सड़कों पर मतवाला।
गले लगाकर मिल रहे सब  ,
मुद्दत बाद मिला पीनेवाला।

भूल गए राशन की लाइन,
देखी कतार दरे - मधुशाला।
राजस्व की याद उसे ही आई,
राशन लाया जो लूंगी वाला।

क्या करेगा कोरोना उसका ,
हाथ में जिसके हो मधुहाला।
अर्थ व्यवस्था की व्यवस्था में ,
सज गयी फिर से  मधुबाला।

घर में बैठे-बिठाये लोगों को ,
राह दिखा रही संध्याबाला।
द्वार खुला आओ पीने वालों ,
कब से खाली बैठी साकीबाला।

दुःख-दर्द, थकान मिटा अपनी ,
थाम हाथ में हाला का प्याला।
पी के भूल जाएगा सब कुछ ,
मस्जिद हो, या हो शिवाला।

क्या सोचे आके मयखाने में,
बुझा दिल में लगी  ज्वाला।
पी जब तक है, जिस्म-ओ-जां,
तेरे बाद रोयेगा, रोने वाला।

मौत बंट रही जब बाजारों में,
करेगा क्या, निराश रखवाला।

लघु परिचय
 विनोद निराश
पुत्र = श्री ओमप्रकाश
पता - ए -114 , नेहरू कॉलोनी , देहरादून , उत्तराखण्ड
शिक्षा - स्नातकोत्तर
सम्प्रति-पत्रकारिता
रूचि -लेखन
विधा- ग़ज़ल , कविता , लघुकथा , मुक्तक ,  कहानी आदि।
दूरभाष = 09719282989

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