प्रकृति का संदेश





प्रकृति का संदेश


आर के रस्तोगी

न करो तुम दोहन मेरा ,
न करो तुम दूषित मुझको |
हे ! मानव मै कोई वायरस नहीं
प्रकृति का संदेश है तुझको ||

सदियो से मनमानी करता आया ,
मनमुटाव मुझसे करता है आया |
जल और वायु जो जीवन उपयोगी ,
उनको सदा तू दूषित करता आया ||

धरा और गगन को तूने न छोड़ा ,
उच्चे उच्चे शिखरो को न छोड़ा |
उनको काट कर सुरंग बनाई ,
जीव जन्तुओ को भी न छोड़ा ||

किए तूने नये नये कारनामे ,
गगन पर किए नये फसाने |
चाँद मंगल को भी है घेरा ,
बनाना चाहता है उन पर डेरा ||

सागर का भी मंथन किन्हा,
उसमे रहने वालो का जीवन छीना |
इसमे भी बारूद की सुरंग बिछाई ,
मुश्किल हो गया उनका जीना ||

नये नये अन्वेष्ण है करता ,
अपनी कब्र खुद ही खोदता |
फिर करता प्रकृति पर दोषारोपण ,
नासमझी के काम तू है करता ||

दे रही है प्रकृति तुझको चेतावनी ,
बन्द कर मानव तू अपनी शैतानी |
वरना ये वायरस तुझको खा जायेगा,
फिर तू अपने हाथ मलता रह जायेगा ||

आर के रस्तोगी
गुरुग्राम

Post a Comment

1 Comments

लद्दाख में बढ़ती चीन की सेनाएं : हर छलछंद और जयचंद पर नजर रख आगे बढ़ने की आवश्यकता है