मूल्य निर्धारण की हिन्दू नीति



भाग-7, मूल्य निर्धारण की हिन्दू नीति

 संकलनकर्ता : राजीव मिश्र

अति प्राचीन काल में भी हमारे ऋषियों ने समाज जीवन के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान दिया था. उन ऋषियों की सोच गतिशील थी जिसमें नित्य बदलती परिस्थितियों और चुनौतियों का विचार किया गया था. 

ह्वेनसांग द्वारा दिए गए विवरण से स्पष्ट होता है कि उसके समय मे विपन्नों, विधवाओं, संतान हीन व्यक्तियों तथा अन्य असहाय नागरिकों के लिए शासन द्वारा तथा वैश्य समाज द्वारा धर्मशालाओं और सुसज्जित औषधालय की व्यवस्था की जाती थी. कौटिल्य के मतानुसार तो विधवाएं, विकलांग लड़कियां, भिक्षुणियां, वेश्याओं की वृद्ध माताएं, राजा की बूढी सेविकाएं तथा मंदिर सेवा से निकाली गई मंदिर सेविकाए (देवदासियां) भी आजीविका से वंचित नहीं रहनी चाहिए.  

'लेबर प्रॉब्लम्स इन एशियंट एंड मिड इवल इंडिया' में श्री शीतला प्रसाद मिश्रा ने दर्शाया है कि प्रशासन उन कर्मचारियों से कर नहीं लेता था जो प्रशासन का कार्य करते थे. ह्वेनसांग ने लिखा है कि प्रशासन की नीति उदार थी, लोगों में से बंधुआ मजदूर नहीं लिए जाते थे और सुनिश्चित मजदूरी देकर काम कराया जाता था. राज्य कर्मचारियों को वेतन के स्थान पर भूमि प्राप्त होती थी तथा मजदूरों को मजदूरी. 

मेगस्थनीज के मतानुसार, मजदूरों तथा कारीगरों की सुरक्षा को शासन प्राथमिकता देता था. उन्हें कर देने की छूट थी. संकट के समय उन्हें शासन की ओर से सहायता मिलती थी तथा शासकीय व्यय से अन्य भी सुविधाएं प्राप्त होती थी.  यदि नियोजक (employer) कारीगर के किसी अंग को चोट पहुंचाता तो उसे मृत्युदंड दिया जाता था. कर्मचारियों की सुरक्षा तथा दुर्घटनाओं से बचाव के लिए की जाने वाली सुनियोजित व्यवस्था का निर्देश अल-ब-रूनी ने भी किया है. 

राज्य कर्मचारियों से कर की राशि अदा करने के बदले में, निर्धारित कार्य से अधिक काम लेने का चलन था.  वशिष्ठ ने लिखा है कि कारीगर लोग महीने में 1 दिन राज्य के लिए बिना मजदूरी के लिए काम करें (वशिष्ठ स्मृति १९-१-४९०) गौतम ने यही नियम कारीगरों, मजदूरों, मल्लाहो तथा सारथियों के लिए भी लगाया है (गौतम स्मृति -१०-३९७). मेगस्थनीज़ ने भी राज्य के लिए इस अवैतनिक (Honorary) सेवा का निर्देश किया है, परंतु यह भी लिखा है कि जलपोत और शस्त्रास्त्र बनाने वालों को शासन की ओर से मजदूरी और भोजन मिलता था. 

मौर्य काल में नागरी प्रशासनिक  इकाइयों (सिविल बोर्ड) के अधीन कारखानों में उच्च कोटि का कच्चा माल प्रयुक्त होता था तथा नगर निगम के द्वारा वहां के कर्मचारी वेतन पाते थे.

व्यक्तिगत स्वतंत्रता का दम घोटनेवाला या मनुष्य के स्वाभाविक विकास को बौना बनाने वाला केन्द्रीयकरण तब नहीं था. हमारे महर्षियों ने अर्थशास्त्र के सभी पहलुओं का चिंतन किया है जिसकी व्याप्ति उनके मत में बहुत ही बड़ी है. 

डॉ० बोकारे के इंगित पर, आर्थिक क्षेत्र में कार्यरत कुछ राष्ट्रीय संगठनों ने मांग की है कि हर उत्पाद के लागत मूल्य घोषित किए जाएं, चाहे वह औद्योगिक हो या कृषि - उत्पाद हों.  

यह निर्विवाद तथ्य है कि रिकार्डियन सिद्धांत और हेक्सर ओहलिन के विदेश व्यापार सिद्धांत में अंतर होते हुए भी, दोनों सिद्धांत लागत मूल्य पर ही निर्भर हैं. मूल्य निर्धारण की हिंदू नीति का पारंपरिक आधार है लागत मूल्य, उपयोगिता मूल्य और उपलब्धता.  इस संदर्भ में लेखक ने डॉक्टर अंबेडकर, पिगू, पैटिनकिन तथा लार्नर के  विचारों का भी निर्देश किया है. 

अपनी संस्कृति से लेखक कितने समरस हुए हैं और साम्प्रतकालीन विषम परिस्थिति की आवश्यकताओं के प्रति कितने सचेत हैं - यह दिखाने को ये सारी बातें यथेष्ठ रूप में पर्याप्त हैं. 

 तीसरा विकल्प -स्व० दत्तोपंत ठेगडी



 संकलनकर्ता: राजीव मिश्र
नई दिल्ली, 1 मई 2020

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