दोहरे झटके से कैसे उभरेगा बॉलीवुड



दोहरे झटके से कैसे उभरेगा बॉलीवुड

ब्रजेश सैनी 

"ये सारा खेल वक्त का ही तो है , जिसने हमे बदला भी और तोडा भी "    सच में कुछ इस शायरी की तरह आज बॉलीवुड सोच रहा होगा । हमेशा अपनी आँखों से बोलने वाला शख्स इरफ़ान खान जो इस तरह ख़ामोशी से चला गया । यह हम कैसे बर्दास्त कर ले । वक्त का खेल ही कुछ ऐसा है जनाब अभी इरफ़ान खान को गये 24 घण्टे भी नही गुजरे थे । हम दूसरे दिन सुबह अख़बार में इरफ़ान खान के निधन की खबर तक नही पढ़ पाये की वक्त ने  बॉलीवुड के शोमैन कहे जाने वाले फिल्म अभिनेता और निर्देशक राज कपूर के बेटे ऋषि कपूर छोड़कर चले गए । 2020 पहले से ही हमारे साथ  टी-20 की तरह खेल रहा है संकट के बीच हमारा मनोरंजन करने वाला बॉलीवुड आज बुरे दौर से गुजर रहा है  उसने  सोचा भी नही होगा की कल और कल क्या हो रहा है । 

लगातार दो दिनों में दो बड़े कलाकारों को खोना बॉलीवुड के लिए  सदमे से कम नही है इरफ़ान खान  फिल्म जगत  के एक ऐसे विरले अभिनेता थे जिन्होंने बॉलीवुड ही नही हॉलीवुड में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी थी । इरफ़ान की  आवाज से ज्यादा आँखे बोलती थी । छोटे पर्दे से शुरुआत करने वाला ये सितारा ऐसा चमकेगा किसी ने सोचा भी नही था ।  संघर्ष की दुनिया में नाम और शोहरत की चमक में निखरने वाला हीरो अंदर से एक और लड़ाई लड़ रहा था वो बेफिक्र था लेकिन इरफ़ान के  वक्त के पहिए ने उसे 54 साल की उम्र में ही रोक दिया । 3 दिन भी नही बीते थे इरफ़ान खान की माँ को गुजरे । मगर ऐसा लगता है कि माँ के आंचल को छोड़ना नही चाहता था  लेकिन खुदा  ने कुछ रीति किया कुछ विपरीत किया । और कुछ ऐसा ही ऋषि कपूर के साथ किया। 

एक के बाद एक हीरो को खो देने का गम देश और बॉलीवुड कैसे भूल जाये। ये वक्त ही तो था जिसने एक झटके में सबकुछ बदलकर रख दिया । प्रतिभा के अलावा इरफ़ान ख़ान के पास जो कुछ भी था, वो बॉलीवुड में उनके ख़िलाफ़ ही काम करता था. फिर चाहे वो उनका चेहरा-मोहरा हो, उनकी भाव-भंगिमा या फिर किसी आम इंसान जैसा तौर-तरीका. उनमें किसी भी तरह का कोई भड़काऊपन नहीं था और यही उन्हें सबसे अलग करता था । सच कहें तो इरफ़ान ख़ान जैसे अंतरराष्ट्रीय सिनेमा के लिए ही बने थे और ऐसा हुआ भी. अपने करियर के आख़िर में उनकी फ़िल्मों को दुनिया भर में शोहरत मिली. उनकी फ़िल्में ऑस्कर तक गईं. वहां तक गईं जिन पर हॉलीवुड के एंगली, वेस एंडर्सन, डैनी बॉयल और जॉन फ़ॉरो को भी गर्व होता । क्या इरफ़ान की भारतीय फ़िल्में कम प्रभावशाली थीं. नहीं, वो ज़्यादा प्रभावशाली थीं और हमारे लिए ज़्यादा प्यारी भी. आख़िर इरफ़ान ने इस सिनेमाई चुनौती पर जीत कैसे हासिल की? इसका जवाब पुराना है: ख़ुद की तरह बनकर. इरफ़ान ख़ान सच में ऐसे थे जैसा हिंदी सिनेमा ने पहले कभी देखा ही नहीं था ।

 इरफ़ान की एक बात जो ख़ास लगती थी बहुत से एक्टर जहां स्टार जैसा दिखने के लिए नखरे और चोंचले करते हैं, वहीं इरफ़ान एकदम मस्तमौला थे. जैसे कि उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत ही न हो. वो लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए कभी कुछ करते नज़र नहीं आते थे. लेकिन इसके बावजूद, अगर वो छोटे से सीन में भी आएं तो आप उनसे अपनी नज़रें नहीं हटा पाएंगे. सलाम बॉम्बे फ़िल्म का वो चिट्ठी लिखने वाला शख़्स याद है । हिंदी फिल्म जगत में एक  बहुचर्चित नाम ऋषि कपूर शायद वह एकलौते कपूर खानदान के चिराग थे जिन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई । ऋषि कपूर के अभिनय की ख़ासियत के अलावा उनका बिंदास कैरेक्टर लोगों को बहुत भाता था । बॉलीवुड के शोमैन कहे जाने वाले फिल्म अभिनेता और निर्देशक राज कपूर के बेटे ऋषि कपूर बीते दो सालों से कैंसर से जंग लड़ रहे थे. साल 2018 में ऋषि कपूर कैंसर का इलाज कराने के लिए न्यूयॉर्क गए थे. कई महीनों तक वहां पर इलाज़ कराने के बाद ऋषि कपूर ने 2019 में भारत वापसी की थी. 

लेकिन भारत वापस आने के बाद भी लगातार उन्हें अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ रहे थे. इससे पहले वे फ़रवरी महीने में दो बार अस्पताल में भर्ती हो चुके थे । आज बॉलीवुड में हर कोई अपने अपने तरीके से ऋषि कपूर को याद कर रहा है । वर्ष 2017 में उनकी किताब आई खुल्लम खुल्ला. उनकी किताब की इसलिए भी ख़ूब चर्चा हुई क्योंकि ऋषि कपूर ने उसमें कई बातें खुलकर लिखीं थी  80 के दशक की चर्चित फिल्म अमर अकबर एंथोनी जिसमे मुख्य किरदार में अभिताभ बच्चन , विनोद खन्ना , और ऋषि कपूर थे । पहले अमर और अब अकबर ने साथ छोड़ दिया । इस मुश्किल घड़ी में एंथोनी अमिताभ बच्चन ने सोचा भी नही होगा की उनके साथ कुछ इस तरह साथ छोड़ देंगे ।  बॉलीवुड को पिछले दो दिनों में दो बड़े आघात लगे है वक्त का खेल ही ऐसा है कि कोई भी इस दुःख की घड़ी में शामिल नही हो पा रहा है । जिस हीरो की एक झलक के लिए लाखों की संख्या में भीड़ उमड़ जाती है आज कुछ ही लोग शव को दफनाने पर मजबूर है  बॉलीवुड इस बड़े झटके से कैसे उबर पायेगा ।

ब्रजेश सैनी 


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