कोविड- 19 परीकथा नहीं है हकीकत जानिए

कोविड- 19 परीकथा नहीं है हकीकत जानिए


लिमटी खरे
कोरोना कोविड 19 के चलते देश में लॉक डाउन का तीसरा चरण जारी है। पहले 21 दिन फिर 19 दिन उसके बाद जैसी उम्मीद थी कि इसे 14 दिन बढ़ाया जाएगा, अंततः वही हुआ। सरकार क्या किसी के पास भी जादू की छड़ी नहीं है कि उसे घुमाकर इस संक्रमण से बाहर निकल जा सकता है।
कुछ महीनों के लिए हमें इस तरह की परिस्थितियों में रहने की आदत डालना ही होगा, क्योंकि वर्तमान समय में कम से कम कुछ माहों के लिए इस तरह की परिस्थितियां हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं। जो लोग लॉक डाउन को अनावश्यक बता रहे हैं उन्हें देश के आंकड़ों पर नजर डालकर विदेशों में जहां लॉक डाउन को विलंब से लागू किया गया है, उससे इन आंकडों का मिलान करना चाहिए। अमेरिका और इंग्लेण्ड को उदहारण के बतौर देखा जा सकता है जहां लॉक डाउन विलंब से लागू किया गया।
जिस तरह शारीरिक व्याधियों से ग्रसित मरीज को हल्का भोजन दिया जाता है, और शनैः शनैः उसे पहले की तरह ही भोजन देने की प्रक्रिया अपनाई जाती है उसी तरह लॉक डाउन में धीरे धीरे छूट प्रदाय की जा रही है। ग्रीन और आरेंज जोन में कुछ छूट सशर्त दी गई हैं। छूट तय कर दी गई हैं, पर इन्हें किस सीमा तक लागू करना है यह बात राज्य सरकारों और जिलों के प्रशासन पर निर्भर करने की जवाबदेही सौंपी गई है। इस तरह अब जिलों के प्रशासन पर ही सब कुछ निर्भर होगा।
सरकारों को यह भी देखना होगा कि सूबों में मजदूरों के पास रोजगार के पर्याप्त साधन या संसाधन हैं अथवा नहीं! जिनके पास छोटे रकबे हैं, वे भी बहुत परेशान हैं। गरीबों को सरकारी स्तर पर दी जाने वाली इमदाद पर नजर रखने की जरूरत है। जिलों के प्रशासन के द्वारा इस मामले में मुंहदेखा रवैया अपनाने के आरोप भी लग रहे हैं। सबसे ज्यादा मरण तो निम्न मध्यम वर्ग के लोगों की है। वे चाहकर भी अपनी इज्जत और स्वाभिमान के कारण किसी के सामने हाथ नहीं फैला पा रहे हैं। इस तरह के अनेक घरों में फाका मस्ती का आलम हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
हुक्मरान अपनी शान में चाहे जो भी कशीदे गढ़ें, विपक्ष के नेता इस मामले में चाहे जो भी आरोप प्रत्यारोप लगाएं, पर सच्चाई यह है कि आज भी देश में लगभग अस्सी फीसदी या यूं कहा जाए कि नब्बे फीसदी लोग असुरक्षित आर्थिक वातावरण में ही जीवन यापन करने पर मजबूर दिख रहे हैं। इसका सीधा सा उदहारण यह है कि आजीविका की तलाश में अपना घर छोड़कर बाहर गए मजदूरों को अगर भोजन, पानी और अन्य दीगर जरूरी चीजें मिल रही होतीं तो वे घर वापसी के लिए इस कदर व्याकुल या व्यथित क्यों दिखते!
आज जरूरत इस बात की है कि सरकारों को चाहिए कि वे अपने अपने सूबों में कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दें। कुटीर उद्योग का तातपर्य ही यह था कि लोग घरों में रहकर आजीविकोपार्जन कर पाएं या कम लागत के उद्योग धंधों को बढ़ावा मिल पाए। वर्तमान में मास्क, सैनेटाईजर की मांग बहुत ज्यादा है। जो मजदूर घर वापस आ रहे हैं उनके लिए इस तरह के उद्योगों को आरंभ कराया जा सकता है। इसके साथ ही साथ खेती किसानी को बढ़ावा किस तरह मिले इस बारे में भी विचार करने की जरूरत महसूस की जा रही है।
इस महामारी ने एक बात और स्थापित कर दी है कि जो रास्ता गांव से शहर की ओर जाता है वही, रास्ता शहर से गांव की ओर वापस भी आता है। आज लोग गांव की ओर वापस लौट रहे हैं। दिल्ली में प्रदूषण को देखते हुए कुछ समय पहले तक लोग कहा करते थे कि इससे तो गांव की आबोहवा भली। आज गांव गांव मोबाईल, नेटवर्क, संसाधन मौजूद हैं। कहने का मतलब महज इतना है कि गांव में रहकर भी या छोटे शहरों में रहकर भी आजीविकोपार्जन के बेहतर विकल्प तैयार किए जा सकते हैं। वैसे भी कहा जाता है कि घर की आधी रोटी भली!
इस महामारी ने देश के युवाओं के लिए नए मार्ग खोलने की राह प्रशस्त की है। अब सब कुछ हुक्मरानों और सरकारों पर ही निर्भर है कि वे किस तरह इस विकल्प को भुना पाते हैं। कोरोना का संक्रमण कब दम तोड़ेगा यह कहना मुश्किल ही है, और इसके संक्रमण ने आर्थिक रीढ़ को तोड़कर रख दिया है। अब स्थानीय स्तर पर ही रोजगार की व्यवस्थाएं करना इकलौता विकल्प दिख रहा है।
समझना होगा कि यह परीकथा नहीं है कि सरकार ने छड़ी घुमाई और कोरोना गायब, अब तो तब तक इंतजार करना पड़ सकता है जब तक इसकी दवा विकसित नहीं हो जाती। इसलिए हकीकत को समझना ही होगा, उससे रूबरू होना ही होगा।
आप अपने घरों में रहें, घरों से बाहर न निकलें, सोशल डिस्टेंसिंग अर्थात सामाजिक दूरी को बरकरार रखें, शासन, प्रशासन के द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए घर पर ही रहें।

लिमटी खरे
(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

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