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बच्चों के लिए मनोरंजक स्कूल है पुस्तक 'समरीन का स्कूल'



बच्चों के लिए मनोरंजक स्कूल है पुस्तक 'समरीन का स्कूल'


समीक्षक - सतविन्द्र कुमार राणा

पुस्तक: समरीन का स्कूल (बाल कहानी संग्रह)
लेखक: राधेश्याम भारतीय
पृष्ठ: 84
मूल्य: ₹100
प्रकाशन: बोधि प्रकाशन, जयपुर।


बच्चों को एक नए स्कूल में, उसकी नई कक्षाओं में, नए सहपाठियों सरीखे पात्रों से मिलवाने का कार्य राधेश्याम भारतीय रचित बाल कहानी संग्रह 'समरीन का स्कूल' करता प्रतीत होता है। इस संग्रह की सभी कहानियों के कथानक स्कूल या उसके इर्द-गिर्द ही जान पड़ते हैं। इस स्कूल में कहानियों के रूप में कुल बारह कक्षाएं हैं।

 सपने देखना मानव का प्राकृतिक स्वभाव है। बालमन के सपने सुहाने होते हैं। शायद बड़ों के जैसी अतिमहत्वाकांक्षाएँ बालकों में नहीं होती, तथापि उनमें भी कुछ पा लेने की, कुछ बन जाने की ललक या तो स्वाभाविक होती है, अथवा इसका निर्माण उनके मनस पटल पर किया जाता है। लेखक ने अपनी प्रथम कहानी 'गोलू का सपना' के द्वारा न केवल अच्छे सपने देखने की, अपना लक्ष्य निर्धारित करने की प्रेरणा दी है, अपितु उनकी प्राप्ति के लिए दृढ़ निश्चय के साथ परिश्रम करने के लिए भी प्रेरित किया है। 

लेखक ने सहजता से पत्थर का मानवीकरण करते हुए बच्चों में परोपकार की भावना का निर्माण करने और परोपकार के कारण अनुभव होने वाले अलौकिक सुख की अनुभूति करवाने का काम अपनी कहानी 'पुल' के माध्यम से किया है। यह कथा सम्पूर्ण रूप से  बालकों के लिए मनोरंजक भी है। इसमें बाल गीत के आने से यह और भी रौचक हो गयी है। ऐसा ही काव्य प्रयोग लेखक ने कुछ अन्य कथाओं में भी किया है। वही व्यक्ति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का सर्वोचित उपयोग कर पाता है, जिसके अंदर संकोच अथवा झिझक नहीं होती। जो बेबाकी से अपने विचार रख सकने में सक्षम होता है। 

बालकपन में ही बेबाकी के गुण का निर्माण होना परिहार्य होता है। इस प्रकार के गुण के सहजता से निर्माण में सहायक कथा है 'ईनाम'। जिसमें नायक बालक अपनी झिझक पर पार पाकर संतोष का अनुभव करता है।  संकोच पर विजय को ही वह सबसे बड़ा ईनाम समझता है। आदर्श विद्यालय एवं आदर्श शिक्षक का रोल मॉडल पेश करती कहानी है शीर्षक कहानी 'समरीन का स्कूल'। जिसके माध्यम से लेखक  स्कूल में जाने वाले बाल-बालाओं के मन से स्कूल का भय दूर करने की प्रेरणा देता है। 

 शिक्षक को विद्यायल में प्रथम बार आने वाले विद्यार्थियों अथवा अन्य विद्यार्थियों के साथ जो आदर्श व्यवहार करना चाहिए वह यह कहानी बताने में सफल हुई है। यह बाल उपयोगी कथा होते हुए बाल मनोविज्ञान आधारित कथा का भी विशिष्ट उदाहरण है। अनेक बाल कहानी संग्रहों में पशु-पक्षियों को पात्र बनाकर प्रस्तुत करने की परंपरा पंचतंत्र के जमाने से ही रही है। लेखक भी इस परंपरा से अछूता नहीं रहा। परीक्षाओं में अनैतिक चलन और चतुराई के दुष्परिणाम से बालकों को सचेत करने का काम करती है कहानी 'चतुर लोमड़ी'

 बात पर्यावरण सुरक्षा की हो, खेल में सद्भावना की हो या भारतीय जीवन मूल्यों की, परम्पराओं की हो, लेखक ने इन सभी पक्षों से बालकों को अवगत करवाने का कार्य अपनी बाल कहानियों के माध्यम से किया है। निश्चित ही एक वयस्क के रूप में मैं यह प्रतिक्रिया लिख रहा हूँ, लेकिन यह बताते हुए मुझे किंचित भी संकोच नहीं कि मेरी आठ साल की बिटिया ने इन सभी कहानियों को मुझसे बारम्बार सुना है। सुनते हुए उसके मन में कई जिज्ञासाएं उभरी जिनका समाधान मैं कर पाया। 

लेखन शैली प्रभावित करने वाली है। भाषा सहज सरल एवं बालकों के लिए सुग्राह्य है। कुछ नए शब्दों से भी बालकों का सामना होगा, जो उनके शब्दकोष में  वृद्धि करने में सहायक सिद्ध होगा। 

ऐसा कोई भी घर नहीं जिसमें कभी न कभी बालक नहीं होते। इस लिहाज से यह पुस्तक हर घर में होनी चाहिए, ताकि हर घर के बालक इसका लाभ उठा सकें।


©सतविन्द्र कुमार राणा

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