दयानन्द संस्थान की संचालिका एवं जनज्ञान मासिक पत्रिका की सम्पादिका माता पण्डिता राकेशरानी जी नहीं रही



(माता राकेशरानी जी को श्रद्धांजलि)
दयानन्द संस्थान की संचालिका एवं जनज्ञान मासिक पत्रिका की सम्पादिका माता पण्डिता राकेशरानी जी नहीं रही

मनमोहन कुमार आर्य


जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु अवश्य होती है। गीता में हम इस मान्यता को पढ़ते हैं तो यह सत्य प्रतीत होती है। हम देखते हैं कि हमारे माता-पिता सहित अनेक परिवारजन तथा मित्र आदि संसार में हमारे साथ रहे, हम परस्पर एक दूसरे को सुखों का आदान प्रदान करते रहे और एक दूसरे के दुःख में सम्मिलित होते रहे परन्तु इनमें से अनेक संसार से मृत्यु का वरण कर जा चुके हैं और जो हैं, उनका भी गमन निश्चित है। इसी सिद्धान्त का पालन समय समय पर होता देखते रहते हैं। अपने प्रिय जनों के जाने पर हमें मार्मिक पीड़ा होती है और अन्यों के प्रति भी हृदय सहानुभूति व्यक्त करता है। आज ऐसी ही दुःखद एवं पीड़ाजनक घटना घटी है। कल व आज की रात्रि समय में ऋषि दयानन्द का स्वप्न हृदय में संजोए अहर्निश लेखन, प्रकाशन तथा सम्पादन द्वारा वैदिक धर्म का प्रचार करने वाली आर्यजगत में प्रसिद्ध माता पंडिता राकेशरानी जी इस संसार को छोड़कर चली गईं। उन्होंने जीवन में अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये। दिल्ली में आपके पति श्री भारतेन्द्र नाथ जी जो बाद में महात्मा वेदभिक्षु जी के नाम से विख्यात हुए, उनके साथ मिलकर आपने दिल्ली में वेद-मन्दिर तथा दयानन्द-संस्थान की स्थापना की थी। दयानन्द संस्थान से जनज्ञान मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी विगत 55 वर्षों से किया जा रहा है। इस पत्रिका के माध्यम से आपने एक ओर चारों वेदों का सरल सुबोध वेदभाष्य भव्य साज सज्जा के साथ प्रकाशित कर देश के आर्यों व हिन्दुओं के घर-घर में पहुंचाने का संकल्प लिया था और उसमें आपने बड़ी सफलता भी प्राप्त की थी। इसी के साथ आपने छोटे बड़े अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का प्रकाशन भी किया। वैदिक धर्म के प्रचार साहित्य का भी आपके द्वारा बहुत बड़ी संख्या में प्रकाशन किया गया है जिसके कारण आपको 40 से अधिक मुकदमें झेलने पड़े। सभी मुकदमों में आप विजयी हुईं। सेकुलर दलों की सरकारों की तुष्टिकरण की नीति के कारण आपको परेशान किया गया था। इन मुकदमों के कारण आपको कितने कष्ट झेलने पड़े होंगे इसका हम अनुमान लगा सकते हैं। आपने यह सब कष्ट ऋषि दयानन्द के सिद्धान्तों की रक्षा तथा ईश्वरीय ज्ञान वेद तथा वैदिक विचारों के प्रचार प्रसार के लिये सहन किये थे। यह जान व समझ कर सन्तोष होता है। ऋषि दयानन्द व उनके कुछ प्रमुख अनुयायियों ने भी अपने जीवन को इसी प्रकार व इससे भी अधिक तपाया था। आर्य वही कहलाता है जो धर्म की रक्षा व प्रचार के लिये संघर्षरत रहे। नेता या पदाधिकारी बनना आर्यसमाजी होने की पहचान नहीं होती अपितु किसने ईश्वर, वेद, ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज के लिये जितने कष्ट सहन किये, उसी से उस व्याक्ति की महत्ता का प्रकाश होता है। 

इस समय जनज्ञान पत्रिका एक अंक हमारे पास है। इसमें प्रकाशित विज्ञापन के अनुसार जनज्ञान प्रकाशन की ओर से 47 बड़े-छोटे ग्रन्थ तथा 20 लघु पुस्तिकायें प्रकाशित की गई हैं। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। यह एक महत्कार्य है जिसके लिये माता जी व महात्मा वेद भिक्षु जी आर्यसमाज के वन्दनीय हैं। हमारा सौभाग्य है कि हम भी लम्बे समय से इस पत्रिका से जुड़े हैं। वर्तमान समय में भी यह पत्रिका हमारे पास आती है। इसमें जो सामग्री होती है वह आर्यसमाज की अन्य पत्रिकाओं में नहीं होती। इस पत्रिका की सजावट, लेखों के विषय तथा पृष्ठ संख्या की दृष्टि से यह आर्यसमाज की अन्य पत्रिकाओं से भिन्न एवं अनूठी प्रतीत होती है। हमें यह पत्रिका रुचिकर एवं ज्ञानवर्धक लगती है। माता राकेशरानी जी का इस पत्रिका को प्रकाशित करना एक महत्वपूर्ण कार्य था। यह पत्रिका न केवल आर्यसमाज के लोगों द्वारा अपितु हिन्दु समाज के बन्धुओं द्वारा भी रुचि से पढ़ी जाती है। पत्रिका में लेखों का चयन करते हुए ध्यान रखा जाता है कि वह सम्पूर्ण रूप में आर्यसमाज के सिद्धान्तों के अनुकूल हों। क्रान्तिकारियों व बलिदानियों सहित देशभक्त नेताओं व विद्वानों पर भी प्रायः लेख छपते रहते हैं। इस प्रकार की उत्कृष्ट सामग्री का इस पत्रिका में प्रकाशन किया जाता है। हम आशा करते हैं बहिन दिव्या आर्या जी इस प्रकाशन को जारी रखेंगी। आर्यसमाज के बन्धुओं को इस पत्रिका का सदस्य बनकर सहयोग करना चाहिये। इस पत्रिका के माध्यम से आर्यसमाज के सिद्धान्त व मान्यतायें हमारे सनातनी बन्धुओं तक पहुंचती है। इसे हम इस पत्रिका की महत्ता मानते हैं। 

दयानन्द संस्थान की ओर से जो साहित्य प्रकाशित किया गया है वह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस साहित्य से आर्यसमाज की स्थिति सुदृण हुई है। साहित्य व उसमें निहित विचार ही वह महत्वपूर्ण वस्तु होती है जो किसी संगठन व आन्दोलन को जीवित रखने के साथ उसको सुदृण रखते हैं। आर्यसमाज का आधार चार वेद हैं। दयानन्द संस्थान ने शायद अब तक सबसे अधिक संख्या में वेदों के भाष्य का प्रकाशन व प्रचार किया है। इससे वेदों की लोकप्रियता एवं स्वीकार्यता में वृद्धि हुई है। यह आन्दोलन वा कार्य जारी रहना चाहिये। माता जी का यह कार्य भी भावी पीढ़ियों को प्रेरणा प्रदान करेगा, ऐसा हम समझते हैं। 

हमने एक-दो वर्ष पूर्व दयानन्द संस्थान द्वारा प्रकाशित ‘महाभारत’ पुस्तक को मंगाने के लिये फोन किया था। पहले भी इस पुस्तक को मंगाकर पढ़ चुके थे। पुस्तक में कुछ भाग में दीमक लग जाने के कारण हम इसकी नई प्रति लेना चाहते थे। हमारे फोन करने पर माता जी ने ही उसे उठाया था। हमने अपना नाम बताया और माता जी से तब काफी समय तक कुछ बातें हुई थीं। हमारा सौभाग्य है कि हमने महात्मा वेदभिक्षु जी के 37 वर्ष पूर्व सन् 1983 में देहरादून में दर्शन किये थे। वह परोपकारिणी सभा के मंत्री श्री श्रीकरण शारदा जी के साथ महर्षि दयानन्द निर्वाण शताब्दी का प्रचार एवं धनसंग्रह करते हुए यहां आये थे। हमने उस समय उन दोनों के मध्य वार्तालाप को सुना था और उसके बाद आर्यसमाज के एक अधिकारी जिन्होंने उनके प्रति अच्छा व्यवहार नहीं किया था, उन बातों को भी ध्यान व उत्सुकता से सुना था। वह सब हमारे स्मृति में हैं। एक बार जनज्ञान पत्रिका के महात्मा वेदभिक्षु अंक में हमारा एक लेख भी प्रकाशित हुआ था। अन्य अवसरों पर भी कुछ लेख प्रकाशित हुए हैं। अतः दयानन्द संस्थान के प्रति हमारा आरम्भ से ही आदर भाव है। 

आज माता राकेशरानी जी के वियोग के दुःखद अवसर पर हम ईश्वर से उनकी आत्मा की शान्ति व सद्गति के लिये प्रार्थना करते हैं और उनके परिवारजनों के प्रति अपनी सम्वेदना व्यक्त करते हैं। ईश्वर उन्हें इस दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। ओ३म् शम्। 


मनमोहन कुमार आर्य

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