विश्व आपदा के कारण आयोजित नहीं हुआ पांगणा का लाहौल बाल मेला


विश्व आपदा के कारण आयोजित नहीं हुआ पांगणा का लाहौल बाल मेला


डॉक्टर जगदीश शर्मा

हिमाचल प्रदेश मण्डी का सुकेत रियासत की राजधानी पांगणा में आदि काल से ग्राम कन्याएं अभीष्ट फल प्राप्ति के लिए महामाया के प्रांगण में शिव पार्वती के विवाह को सम्पन्न करने के लिए चैत्र मास से लेकर प्रतिदिन सृष्टि के आधार शिव पार्वती के विग्रह बनाकर पूजा अर्चना करती हैं. बैसाख दो प्रविष्टे को को महामाया पांगणा, माता छण्डयारा और थला देव की दिव्य उपस्थिति में शिव पार्वती के विग्रह का विसर्जन पांगऩा खड्ड में किया जाता है।

 इस बार विश्व आपदा के कारण सभी धार्मिक परम्पराओं को विराम लग गया है।सुकेत संस्कृति साहित्य और जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डॉक्टर हिमेंद्र बाली "हिम" का कहना है कि हिमाचल प्रदेश की देव भूमि का कण कण देव मय है। यहां सृष्टि नियन्ता त्रिदेव, त्रिदेवियां, देव, मुनि, यक्ष, नाग , दानव,किन्नर आदि अपने अपने क्षेत्र में अधिपति रूप में स्थापित है। शिव आदि विषहर देव हैं जिन्होंने  कालकूट विष को पीकर सृष्टि को तबाह होने से बचाया. आज देव परम्पराएं मिटती जा रहीं है। शास्त्रीय परम्परा के अनुसार हर देव अपनी अपनी सामर्थ्य के अनुसार भूत प्रेत आदि विषाणुओं का शमन करते हैं। ऐसी मान्यताएँ व्याप्त हैं कि जब 19वीं व 20वीं शताब्दी में प्लेग से तबाही मची तो देव आराधवा से प्रकोप रुक गया। यदि देव परम्परा में साधना की शुचिता हो तो करोना जैसे वायरस को जीतना सम्भव है। ईश्वर कण कण में व्याप्त है. सभी भौतिक सम्पदा पर ईश्वर का आधिपत्य है। अत:देव आराधना से सूक्ष्म जगत के साथ साथ ऐसे वायरस के अस्तित्व को मिटाया जा सकता. हमारी देव व्यवस्था में अदृश्य संकटों से निराकरण सम्भव है. अत:यह वायरस भी अदृश्य शत्रु है जिस को अपने संकल्प और साधना से परम शक्ति के प्राक्टय से मिटाया जा सकता है। रामायण, महाभारत व पौराणिक संदर्भों में विष वर्षा का उल्लेख और निवारण का उल्लेख है. अत:इस विकट घड़ी में सूक्ष्म जगत के ऐसे संघातिक वायरस को पराजित किया जा सकता है।

सुकेत रियासत व सुकेत सत्याग्रह की ऐतिहासिक स्थली पांगणा में बैसाखी के एक दिन बाद लाहौल का मेला भुट्ठा नामक गांव की टेकड़ी पर सदियों से सजता आ रहाहै।यह अनूठा मेला बाल-बालिकाओं के कारण ही सजता है।इस मेले में बाल -बालिकाओं  को न केवल पुरुषों और महिलाओं की मदद मिलती है अपितु तीन देवी-देवताओं के रथ भी अपनी-अपनी "हार",कारदार, ढाढी-बाजगियों के साथ इस मेले का नेतृत्व करते हैं।इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण इतिहास में पहली बार न लाहौल के पावन अवसर पर बनने वाली शिव-पार्वती की मिट्टी की प्रतिमाएं बनीं,न एक महीने तक हर सुबह सूर्योदय से पूर्व पुष्प एकत्रित करने वाली बाल-बालिकाओं की टोलियों के लाहौल गीतों के स्वर सुनाई दिए,न लाहौल का विवाह हुआ,न तिलचौली बंटी,न लाहौल और देवी-देवताओं के रथों की शोभायात्रा निकली ,न पार्वती कुंड में भाव विभोर होकर शिव-पार्वती की मूर्तियों का विसर्जन हुआ( विसर्जन हुआ भी तो सांकेतिक) और न ही तो लाहौल मेले का आयोजन हुआ।

 संस्कृति मर्मज्ञ डॉक्टर जगदीश शर्मा.और व्यापार मंडल के अध्यक्ष सुमीत गुप्ता और भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के जिला प्रभारी जितेंद्र महाजन का कहना है कि पांगणा मंदिरों, त्योहारों, उत्सवों, संस्कृति व समृद्ध इतिहास की भूमि है।पांगणा में ऐतिहासिक धरोहरों के साथ ज्यादा आकर्षण स्थानीय त्योहारों और मेलों का है,मसलन बाल-बालिकाओं का लाहौल मेला तो अपने आप में अनूठा और बहुत आकर्षक है।लाहौल (शिव-पार्वती)की मूर्तियों को विसर्जित करने के बाद दोपहर बाद भुट्ठा में सजने वाले इस मेले में देव थला फरास(चुराग)सुकेत अधिष्ठात्री राजेश्वरी महामाया पांगणा और छंडयारा भगवती के रथों के साथ देव संस्कृति की विविधता के दर्शन तो होते ही हैं लेकिन दोपहर बाद सजने वाले इस मेले में मिठाइयों,मनियारी,खिलौनों,फल,कुल्फी-आईसक्रीम आदि की दुकानें भी सजती हैं जो न केवल बच्चों अपितु बड़ों के आकर्षण का केन्द्र रहती हैं।लाहौला(शिव-पार्वती)व तीन देवी-देवताओं के  देवरथों की एक स्थान पर पूजा अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए तो यहां जुटते ही हैं लेकिन बाल-बालिकाओं के में संस्कृति त्रऔर संस्कार की इस अमूल्य विरासत को संजोए रखने के लिए भी प्रोत्साहित करते हैं।भुट्ठा के इस लाहौल मेला मैदान(सौह)से शिकारी देवी,रेश्टाधार पर्वत श्रृंखलाओं का नजारा जातरुओं का मन मोह लेता है।88 वर्षीय व्योवृद्धा शांतिदेवी का कहना है कि पहले-पहल गांव की सभी महिलाएं लाहौल मेले के दिन घर से "बटुरु",आलू की सूखी सब्जी, बेढ़ने बटुरु बनाकर ले जाती थी।लाहौल विसर्जन व देवी-देवताओं के आशीर्वाद के बाद इन रोटियों को आपस में मिलबांट कर खाती थीं।

     सुकेत रियासत की स्थायी और ग्रीष्मकालीन राजधानी रहे पांगणा में लाहौल मेले के संदर्भ में जानकारी साझा करते हुए संस्कृति मर्मज्ञ डॉक्टर जगदीश शर्मा का कहना है कि पांगणा में बाल-बालिकाओं व महामाया मंदिर समिति द्वारा आयोजित किए जाने वाला यह अनूठा मेला अतीत में पूरे सुकेत क्षेत्र में प्रसिद्ध रहा है।किंवदंती है कि राजा रामसेन की शिव-शक्ति भक्त बेटी राजकुमारी चन्द्रावती(हत्या. देवी)की पुण्य स्मृति में इस मेले का आयोजन किया गया था।इस दिन शास्त्रोक्त नीति नियम के साथ कुमारी कन्याओं की भी श्रद्धालुओं द्वारा पूजा की जाती है।इतिहास और संस्कृति का अध्ययन करने वालों, को चाहिए कि वे भविष्य में लाहौल मेले के अवसर पर पांगणा आएं और सुकेत संस्कृति के जीवंत पृष्ठ को पढ़ें।

              डॉक्टर जगदीश शर्मा आध्यात्मिक दृष्टि से कोरोना को देवबल प्रवृत्त शाप मानते हैं।विश्व भर में काम,क्रोध,लोभ,मोह,ईर्ष्या,मान-अभिमान के कारण मनुष्य संवेदनहीन हो चुका है।जीवन का उद्देश्य भौतिक उन्नति ही होने के कारण इस महामारी को देवी देवताओं आदि के क्रोध से होने वाला ऐसा शाप मानते है जिसके कारण एक अदृश्य युद्ध या अल्प प्रलय के खौफ में विश्व समुदाय कुंठित और अवसादग्रस्त जीवन जी रहा है।ईश्वर मौन है।देवकार्य-देवोत्सव बंद हैं।अत: इससे मुक्ति का मार्ग व ईश्वरीय कृपा से विश्व कल्याण के लिए लॉकडाउन के दौरान सरकार के निर्देशों का सख्ती से पालन के साथ ईश्वर से मारण और उच्चाटन से मुक्ति हेतु प्रार्थना ही एकमात्र सबसे बड़ा साधन है।ऐसे में अपना अहं मिटाकर देवी-देवताओं के चरणों में खुद को समर्पित कर सभी की नित्य-निरंतर सामुहिक प्रार्थना के बल पर ईश्वरीय कृपा से अवश्य करिश्मा होगा, तथा भारत सहित विश्व समुदाय को कोरोना से मुक्ति मिलेगी।डॉक्टर जगदीश शर्मा का कहना है कि चीन की तानाशाही व वहां के शासकों की सनक से विश्व की दुर्दशा बता रही है कि कोरोना महामारी के कारण कितना बड़ा अनर्थ हुआ है। मानव और अर्थव्यवस्था पर तो संकट पड़ा ही देव संस्कृति,देव परंपराएं भी कोरोना  की मुसीबतों को झेल रही हैं।

डॉक्टर जगदीश शर्मा
पांगणा मण्डी 
हिमाचल प्रदेश

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