तीसरा विकल्प (भाग-4) ( स्व० दत्तोपंत ठेगडी)



संकलन - तीसरा विकल्प (भाग-4)

( स्व० दत्तोपंत ठेगडी)

संकलनकर्ता - राजीव मिश्र

 "(कहां चलें -1)"

हमारे देश के अर्थशास्त्री चिंतन के इतिहास में डॉ० एमजी बोकारे की हिन्दू अर्थशास्त्र (The Hindu Economics) नामक पुस्तक मील का पत्थर कहलाएगी.  अर्थशास्त्र पर पहला ग्रंथ भारत में लिखा गया और विश्व के अर्थ शास्त्रीय साहित्य के इतिहास में अर्थशास्त्र की परिभाषा सर्वप्रथम करने वाला देश भारत ही था. 

विभाग -

पश्चिम के अर्थशास्त्री 'स्वयं - रोजगार' विभाग को पहचानते ही नहीं थे, जो ना तो निजी विभाग (Private Sector) था ना सार्वजनिक विभाग (Public Sector)था.  यह तो 'लोगों का' अपना विभाग था. पश्चिम के लोग स्वयंरोजगार की गिनती यद्यपि राष्ट्रीय आय का अंदाज लगाने में करते हैं तथापि उसका व्यवस्थित स्पष्टीकरण सिद्धांत के रूप में नहीं करते.  पाश्चात्य अर्थशास्त्र के पृथक्करण में केवल नौकरी (वेतन पर नियुक्ति) यह एक ही प्रकार समाविष्ट है. 

हिंदू व्यापारी संघ में मालिक - नौकर (Employee-employer)  का नाता नहीं. ऐसे नाते का अभाव ही हिंदू व्यापारी संघ का लक्षण है. कौटिल्य की योजना के अनुसार संघ की संपूर्ण आय पर सारे सदस्यों का अधिकार है.  उस आय का बंटवारा सभी सदस्यों में पूर्व निश्चित शर्तों पर होता था या वैसी कोई शर्त न होने पर सभी में समान रूप से वह आय वितरित होती थी. ये संघ स्वायत्त होते थे. उनके अपने घटनात्मक नियमानुसार अपने अंतर्गत विवादों को संघ के सदस्य आपस में ही सुलझाते थे. संघ के बाहर की किसी भी शक्ति या व्यक्ति को यह काम करने का अधिकार नहीं था. जब तक संघप्रमुख अपने संघसदस्यों में कोई कलह नहीं होता था, तब तक संघ के अंतर्गत व्यवस्थापन में शासन का भी कोई हस्तक्षेप नहीं होता था. (वृहस्पति 10 :8, 17,9, 18,19 20).

हिंदू अर्थशास्त्र में सुव्यवस्थित स्वयं-रोजगार तथा वेतन पद्धति की भी दखल ली गई है. वेतन नियुक्ति के क्षेत्र में स्वामी (Employer) तथा कर्मचारी के संबंधों की उचित व्यवस्था है. 

उदाहरण के तौर पर बोनस के विषय में शुक्राचार्य का प्रतिपादन है, कि  मालिक को प्रतिवर्ष उसकी आय का आठवां हिस्सा (1/8)  बोनस के रूप में दिया जाए. यदि वह दक्षतापूर्वक काम करता है तो वस्तुपरक आमदनी (Piece rate earning) का आठवां हिस्सा उस काम के पारिश्रमिक के रूप में, दक्षता-बोनस मानकर दिया जाए. 

शुक्राचार्य की नियमावली तो परिपूर्ण जीविका की स्थिति में पारिश्रमिक पाने वालों के लिए थी. पाश्चिमात्य  अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों में स्वयं-जीविका को स्थान ही नहीअत: परिपूर्ण जीविका उनकी कल्पनाशक्ति के परे है.  पाश्चात्य सिद्धांतों पर आंके गए औद्योगिक सम्बंध या नियम क्षमता की दृष्टि से शुक्राचार्य के या अन्य हिंदू विधिज्ञों  के नियमों की बराबरी कर ही नहीं सकते. 

कौटिल्य पर स्पेंगलर ने या मनु पर वेंडी ने जो भाष्य लिखे हैं उनका भी अध्ययन वे लोग गंभीरता से नहीं करते. स्मृतियों को वे केवल व्रतों, व्रतविधियों और आचारविधियों को बताने वाले धार्मिक ग्रंथ समझते हैं जो उन्हें आज गतार्थ लगते हैं. 

जहां पश्चिमी अर्थशास्त्र की घोषणा है "ग्राहकों! सावधान रहना"  वहां वैदिक अर्थशास्त्र का उद्घोष है, "विक्रेताओं ! सावधान रहना ! " 

केवल पश्चिमी सभ्यता से वामपंथी परिचित थे जिसमें कीमतें से बढ़ती रहती हैं, अत: वे  आंक ही नहीं पाए की कीमतों को घटाने वाला मूल्य निर्धारण भी किसी सभ्यता का हो सकता है. दरअसल प्राचीन पश्चिमी सभ्यता में वेतन तथा सूद के लिए कोई अर्थशास्त्रीय श्रेणी न होने से वहां कोई मूल्य प्रणाली (Theory of Prices)  थी ही नहीं.  जेके गालब्रेथ ने (Economics in perspectives) में अपना निष्कर्ष लिखा है कि प्राचीन विश्व में वेतन अथवा सूद के अतिरिक्त मूल्य निर्धारण के विषय में आधुनिक विचार की कोई पद्धति नहीं थी.  उत्पादन के  व्यय पर कीमतें तय होती थी और गुलाम प्रथा के चलते उत्पादन का व्यय दिखाई नहीं देता था"  ज्ञातव्य  है कि प्राचीन विश्व की उनकी धारणा केवल एथेंस से न्यूयॉर्क  तक ही सीमित थी जबकि हिंदू धारणा के अनुसार "पृथिवयै समुद्रपर्यान्तायाम"  एक राष्ट्र था. मतलब समुद्र से दूसरे समुद्र तक एक ही राष्ट्र माना गया था.  प्राचीन भारत में विभिन्न स्मृतियों तथा अर्थशास्त्र में इस बिंदु की विशेष परिभाषा की गई है, तथा वेतन और सूद की समस्याओं पर भी वहां विचार किया गया है. 

"हिंदू अर्थशास्त्र" उन, मन के द्वार बंद रखने वालों के लिए नहीं है.


संकलनकर्ता - राजीव मिश्र
नई दिल्ली

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