समय के साथ-साथ बैसाखी/बीशु की परंपराएं भी अब लुप्त होने लगी हैं।


समय के साथ-साथ बैसाखी/बीशु की परंपराएं भी अब लुप्त होने लगी हैं।


✍️ डॉक्टर जगदीश शर्मा 

हिमाचल प्रदेश मण्डी करसोग बैसाखी/बीशु के पावन पर्व पर करसोग पांगणा क्षेत्र के घरों में जहां धूम रही वहीं मंदिरों में कोरोना के कारण कपाट बंद रहे और संक्रांति के अवसर पर होने वाला झाड़ा(देव आवाह्न)का कार्यक्रम नहीं हुआ।अनेक देओठियों के कारदारों का कहना है कि ऐसा पहली बार हुआ है जबकि साजे के दिन झाड़ा का कहीं भी आयोजन नहीं हुआ।

अनेक मंदिरों में प्रातः कालीन पूजा के बाद कपाट बंद हो गए।जिससे.श्रद्धालु मंदिरों में पूजा अर्चना नहीं कर पाए।न कहीं देव वाद्य गूंजे न ही तो जयकारे सुनाई दिए।लोगों ने घरों में ही रहकर पारंपरिक ढंग से बैसाखी का आयोजन कर स्वयं को धन्य किया।शहरी क्षेत्रों में त्रिदेवों की प्रसन्नता के लिए जल से भरे छोटे-छोटे घट (पारु)"लुच्चियों"नामक तली रोटियां,हलवे और दानराशि सहित पूजा कक्ष में पूजा करने के बाद सौभाग्यवती स्त्रियों,ब्राह्मणों,देवालयों को भेंट किए गए। ग्रामीण क्षेत्रों में घर-आंगन की साफ सफाई के बाद महिलाएं स्नान आदि से निवृत्त होकर आंगन के मध्य "मांदले" पर लाल मिट्टी से लीपाई कर देवदार के परागकणों(पठावे) से बेल बूटे अंकित कर इसके मध्य भाग पर गोबर के शंक्वाकार गणेश की स्थापना कर इसकी पूजा कर देहरी पूजन के साथ घर के दरवाजों, छप्पर के शीर्ष भाग पर बुरांश के फूल सजाए गये।

आंगन में पलैई की स्थापना की गई तथा इसका पूजन किया गया।पलैई के शीर्ष पर बंधी लुच्चियों पर पत्थर से निशाने लगाकर इनके भूमि पर गिरते इन्हे एक दूसरे से पहले उठाने की होड़ हास्य व आनंद की अनेक प्राचीन परंपराएं आज देखने को मिली।सुकेत संस्कृति साहित्य एवं जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डॉक्टर हिमेंद्र बाली "हिम",संस्कृति मर्मज्ञ डॉक्टर जगदीश शर्मा,व्यापार मंडल पांगणा के अध्यक्ष सुमीत गुप्ता,भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के जितेंद्र महाजन और सुकेत रियासत की सबसे ऊंची टेकड़ी पर बने च्वासी सिद्ध मंदिर के पुजारी टी.सी.ठाकुर का कहना है कि हिन्दू पंचांग के आधार पर चैत्र में नव वर्ष के आरंभ होने के बाद बैसाखी/बीशु पहला त्योहार है जो गेहूँ की फसल आने की खुशी के साथ अन्न-धन व खुशहाली के प्रतीक के रुप में धूमधाम से हर घर में मनाया जाता है।

बैसाखी का त्योहार मनाने से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं।जिससे परिवार में दरिद्रता और कलह क्लेश दूर होकर सुख शांति आती है।इस दिन तीर्थ स्नान,अन्न-धन-वस्त्र आदि का दान करने से प्राणी आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाता है।इनका कहना है कि भागमभाग के इस दौर में बैसाखी के अवसर पर गाये जाने वाले बीशु गीत अब कहीं भी सुनाई नहीं देते।जिससे बैसाखी का पारंपरिक लोक त्योहार अब लुप्त होने के कगार पर है।इस का संरक्षण नितांत आवश्यक है।

✍️ डॉक्टर जगदीश शर्मा 
पांगणा करसोग मण्डी हिमाचल प्रदेश


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