ऋषि दयानन्द के सच्चे भक्त एवं वेद प्रचारक आचार्य भद्रसेन, अजमेर


जिसकी कीर्ति है वह मनुष्य मरकर भी जीवित है
ऋषि दयानन्द के सच्चे भक्त एवं वेद प्रचारक आचार्य भद्रसेन, अजमेर



मनमोहन कुमार आर्य

आर्यसमाज सभी ऋषि दयानन्द भक्तों की माता के समान है। इसने अतीत में अनेक नररत्नों को जन्म दिया है। ऐसे ही एक नररत्न आचार्य भद्रसेन जी, अजमेर थे। आचार्य जी पंजाब में जन्में थे। माता पिता का कम आयु में देहान्त हो गया था। आपमें संस्कृत पढ़ने की रुचि उत्पन्न हुई थी। कुछ स्थानों पर संस्कृत व्याकरण का अध्ययन करने के पश्चात आप आचार्य पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी की शरण में पहुंचे थे। आपको प्रवेश मिल गया था परन्तु आपको भिक्षा करके अपने जीवन का निर्वाह करना होता था। विद्या प्राप्ति के प्रति यह कैसी लगन थी? यह कुछ कुछ वैसी ही थी जैसी ऋषि दयानन्द में थी। आपने पूरी लगन से पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी से व्याकरण ग्रन्थों का गहन अध्ययन किया। आचार्य भद्रसेन ने योगाभ्यास, ध्यान, आसन और प्राणायाम में भी प्रवीणता प्राप्त की थी। आप लोनावाला के प्रसिद्ध योग संस्थान वा केन्द्र में लम्बी अवधि तक रहे। उस संस्थान के महन्त आपको अपना शिष्य बनाकर उसका समस्त दायित्व, अधिकार व भार आपको देना चाहते थे परन्तु आपको तो ऋषि दयानन्द से प्रेम था अतः आपने एक बहुत बड़ा प्रस्ताव ठुकरा दिया था। 

आप आर्यसमाज के उपदेशक व पुरोहित बने और इसके साथ आपने संस्कृत अध्यापन एवं योग प्रशिक्षण के द्वारा भी जनता की सेवा की। आपकी एक पुस्तक योग एवं स्वास्थ्य योग एवं आसन-प्राणायाम की महत्वपूर्ण पुस्तक है। सभी युवकों को इस पुस्तक का अध्ययन कर इससे लाभ उठाना चाहिये। इसमें सभी आसनों के चित्र भी दिये गये हैं। इस पुस्तक में प्रत्येक आसन के लाभों को बहुत तर्कपूर्ण रीति से समझाया गया है। ऋषि जीवन और आर्यसमाज विषयक आपने कुछ अन्य पुस्तकें भी लिखी हैं। आचार्य जी का विवाह राजस्थान के एक ऋषिभक्त आर्य परिवार में हुआ था। यह सत्य एवं प्रामाणिक है कि हिन्दू समाज में कथित अन्तर्जातीय विवाहों का आरम्भ आर्यसमाज ने ही कराया है। यह भी उस समय का एक अन्तर्जातीय विवाह था। आचार्य जी की धर्मपत्नी का नाम सौभाग्यती जी था। आपका देहावसन 5 दिसम्बर, 1957 को रात्रि लगभग 12 बजे हुआ था। उस समय कैप्टेन देवरत्न आर्य 16 वर्ष के थे। आपकी सबसे छोटी सन्तान मात्र 6 माह की थी। हम अनुमान लगा सकते हैं कि आचार्य जी व उनके परिवार ने जीवन जीने के कितना संघर्ष किया होगा। 

आचार्य जी का गृहस्थ जीवन एक आदर्श गृहस्थ था। आपके पांच पुत्र व दो पुत्रियां हुए। आर्यसमाज में कैप्टेन देवरत्न आर्य का यश सदैव विद्यमान रहेगा। आप सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली के प्रधान भी रहे। आप मुम्बई प्रतिनिधि सभा के भी यशस्वी एवं प्रसिद्ध अधिकारी थे। देश भर में आपका यश था। आपने आर्यसमाज में अनेक ऐसे कार्य किये जो अपूर्व थे। हमारा आपसे आत्मिक सम्बन्ध व मित्रता रही। आपकी प्रेरणा से हमने स्वामी विद्यानन्द सरस्वती जी का अभिनन्दन पत्र तैयार किया वा कराया था। इसमें हमने वैदिक विद्वान आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी का सहयोग लिया था। स्वामी विद्यानन्द सरस्वती जी का अभिनन्दन सत्यार्थप्रकाश न्यास, उदयपुर की ओर से वर्ष 1997 में उदयपुर में 27 फरवरी को हुआ था। इस अवसर पर उनको 31 लाख की थैली भेंट की गई थी। यह समस्त धनराशि कैप्टेन देवरत्न जी के प्रयासों से एकत्रित हुई थी। हम भी इस अवसर पर उदयपुर के आयोजन में उपस्थित थे। जब हम कैप्टेन देवरत्न आर्य जी को स्मरण करते हैं तो हमें उनसे अपने सम्बन्धों का गौरव होता है। वह सचमुच के देवता थे। यह बात हमारे एक दिवंगत मित्र प्रो. डा. मुक्तिनाथ जी, देहरादून ने मुम्बई से आकर व देवरत्न आर्य जी का आतिथ्य ग्रहण करने के बाद बताई थी। हमारा नाम लेने मात्र से ही आपने उनकी प्रशंसनीय सहायता की थी। ऐसा सहयोग व सहायता कोई देवता ही कर सकता है। 

आज हम कोई परिचयात्मक लम्बा लेख न लिखकर आचार्य जी का परिचय, उनकी दिनांक 27-1-1975 को अजमेर में मृत्यु होने पर, समाज के प्रमुख विद्वानों द्वारा दी गई सम्मतियों के द्वारा करा रहे हैं। मृत्यु के समय आचार्य जी अपने ज्येष्ठ पुत्र श्री वेदरत्न आर्य के पास अजमेर में थे। 27 जनवरी को वह नियमानुसार निद्रा त्याग कर उठे थे। उन्होंने स्नान करने के बाद सन्ध्या भी की थी। बड़े पुत्र वेदरत्न ने उन्हें प्रातः 8.00 बजे अल्पाहार कराया तो वह बोले कि मैं हाथ धोना चाहता हूं। पुत्र ने उन्हें उठने में सहारा दिया तो देखा कि उनके हाथों में ही आचार्य जी ने अपना शरीर त्याग कर दिया है। इस प्रकार एक इतिहास रचकर वह नये जन्म की प्राप्ति की यात्रा पर चले गये हैं। मृत्यु के समय उन्होंने सुखपूर्वक अन्तिम श्वास लिये थे। इस सुखद मृत्यु को हम उनके योग साधनामय जीवन सहित सच्चे आस्तिक जीवन का परिणाम मान सकते हैं। 

आर्यसमाज के विख्यात नेता एवं सांसद पं. प्रकाशवीर शास्त्री ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि में कहा था कि वह आर्यसमाज के गौरवपूर्ण विद्वान थे। उनके अनुसार आचार्य भद्रसेन के निधन से एक तपस्वी और साधु विद्वान का निधन ही नहीं वरन् आर्यसमाज के साथ-साथ पूरे देश की भी क्षति हुई थी। इसके तीन वर्ष बाद रिवाड़ी के निकट एक रेल दुर्घटना में पं. प्रकाशवीर जी का देहान्त हो गया था। अजमेर निवासी विख्यात विद्वान ऋषिभक्त पं. सूर्यदेव शर्मा जी ने कहा ‘ईश्वर पृथ्वी पर कुछ ऐसे रत्न भी भेजता है जिनमें सारे गुण होते हैं। वह समाज और राष्ट्र की शोभा बढ़ाने वाले होते हैं। आचार्य जी उनमें से एक थे।’ प्रसिद्ध गीतकार पं. प्रकाशचन्द्र कविरत्न जी के अनुसार आचार्य जी आर्यजगत् के मूर्धन्य विद्वान्, वक्ता व सुलेखक थे। आर्यसमाज की उनके अवसान से क्षति हुई है। कविरत्न प्रकाश चन्द्र जी की आचार्य भद्रसेन जी पर एक कविता भी प्रस्तुत करने का लोभ हम संवरण नहीं कर पा रहे हैं। वह लिखते हैं:-

धवल धाम नयानाभिराम भूकम्पों से ढह जाते हैं। 
गज तुरंग वाहन पानी की बाढ़ों में बह जाते हैं।। 
अन्त चिता में बड़े-बड़े बलवन्त देह दह जाते हैं। 
सत्पुरुषों के चरित्र करोड़ों कण्ठों में रह जाते हैं।। 

पं. रामचन्द्र जी, आर्यमुसाफिर, अजमेर के अनुसार वैदिक धर्म प्रचार व महर्षि निर्देशित अन्तर्जातीय विवाह में उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया था। आचार्य जी का जीवन यज्ञमय था। वे परोपकारी व्यक्ति थे। स्वतन्त्रता सेनानी चैधरी रामनारायण के अनुसार ‘आचार्य भद्रसेन जी ऊंचे दर्जे के समाज-सुधारक एवं अजमेर नगर के उदात्त पुरुष थे। उनके चले जाने से देश की हानि हुई है। उनके सत्संग से मुझे जो आनन्द मिलता था उससे मैं वचित रहूंगा।’ वैदिक विद्वान आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी के अनुसार ‘समाचार पत्रों से यह जानकर हार्दिक दुःख हुआ कि आचार्य जी का देहावसान हो गया। समस्त गुरुकुलवासी इस शोक के अवसर पर अपनी संवेदना प्रकाशित करते हैं।’ हैदराबाद के लौह पुरुष पं. नरेन्द्र जी ने अपनी श्रद्धांजलि में कहा था कि पंडित जी ने अपने जीवन-काल में आर्यसमाज की मौखिक तथा साहित्य-रचना द्वारा जो सेवा की है उसे आर्यजगत् कभी नहीं भुला सकता। 

आचार्य जी ने प्रभुक्त-दयानन्द, आदर्श गृहस्थ जीवन, हम आर्य है, आर्य सत्संग गुटका आदि अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का सम्पादन किया। आर्यजनों को आचार्य भद्रसेन जी की उपलब्ध पुस्तकों को प्राप्त कर उनका अध्ययन करना चाहिये। जो पुस्तकें अप्राप्य हैं उनका भी प्रकाशन होना चाहिये। आज हमने इस लेख में आचार्य जी का संक्षिप्त परिचय दिया है। अवसर मिलने पर हम उनके जीवन के कुछ अन्य पहलुओं को भी लेख के माध्यम से प्रस्तुत का प्रयास करेंगे। ओ३म् शम्।


मनमोहन कुमार आर्य

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