आखिर क्या है गांव में जो लोग इस आपातकाल में जान जोखिम में डालकर भी जाना चाहते






आखिर क्या है गांव में जो लोग इस आपातकाल में जान जोखिम में डालकर भी जाना चाहते?

डॉ कुंदन कुमार

मुम्बई का बांद्रा हो या दिल्ली का आनंदविहार हो या गुजरात का सूरत सब जगह मजदूर घर भागने की कोशिश कर रहे है और अपने जान के साथ साथ समाज को भी संकट में डालने को आमादा हो रहे है। मजदुर की छोड़िए जिनका भी छोटा या बड़ा आशियाना गांव है उनके दिल मे अभी वहाँ पहुचने की इच्छा तीव्र है बहुत लोग तो प्रण भी ले रहे है कि अब लौट कर नही शहर नही जाऊँगा। यह सिर्फ भारत में रहने वाले विभिन्न राज्य के पलायनवादी नागरिकों की बात नही यह अमेरिका इंग्लैंड जैसे विदेशो में रहने वाले भारतीयों के साथ भी है। 

आखिर क्या है उनके गांव में जो वो जान भी जोखिम में डाल कर घर जाना चाहते है?जिनका भी जन्म गांव में हुआ है वो गांव की जीवन शैली से भली भांति परिचित है वो इतना तो जानते है कि इस विपत्ति की घड़ी में भी उसकी जो मूलभूत आवश्यकताये खाने को रोटी,पहनने को फटा पुराना ही सही कपड़ा औऱ रहने के लिए झोपड़ी ही सही लेकिन सर ढकने को जरूर उपलब्ध होगा।बदहाल व्यवस्था के कारण कभी पढ़ाई- लिखाई कभी रोजी- रोजगार के लिय पलायन करना मजबूरी कब  मुक्कदर बन गया समझ मे नही आया।उम्र बढ़ता गया सारी भौतिक सुख सुविधाओं के साथ यम्मी पिज़्ज़ा,बर्गर का भी स्वाद लिया, बाबजूद खाने की खुशी का वो अनुभव और स्वाद से बंचित ही रहा जो गांव में इस गर्मी के समय मे पत्थर मार कर एक खट्टे आम का टिकोला, बिना धोए,साफ किये खाने में भी आता था।

भीषण गर्मी में साइकिल चलाते हुए, दौड़ते भागते हुए किसी घास पूस की झोपड़ी में बिना पंखे के बैठने में जो मन को ठंडक महसूस हुई वो कहा कभी एयर कंडीशन घर में भी नही मिली।जो समाज की जटिलताए आज स्प्राइट "सब क्लियर है"बार बार देखने, सुनने और पीने के बाद भी क्लियर नही होती है वो गर्मी के महीने में नीबू पानी,शिकंजी और चने की सत्तू जीवन मे क्लियर देती थी।अमूमन अप्रैल के बाद का महीना ग्रामीण जीवन मे अभी के लॉक डाउन जैसा ही रहता था। बच्चो के लिए तो मानो कर्फ्यू लाग दिया जाता था दिन में माँ घर के सारे दरवाजे बंद कर देती थी जिससे हम बच्चे घर के बाहर ना जाने पाए क्योकि बाहर धूप बहुत तेज़ होती लू लगने का सम्भावना रहती थी।

कृषि कार्य से किसान को भी थोड़ा आराम रहता था चूंकि रवि फसल खेत में तैयार हो चुके होते थे इसलिए घर मे अनाज और मवेशियों के खाद्यान की भी भरपूर व्यवथा रहती थी।दिन में ज्यादतर लोग इधर उधर जाने से अच्छा पेड़ के नीचे खाट लगाकर सोना पसंद करते थे। मतलब हम बच्चे तो बंद दरवाजे के अंदर कर्फ्यू में रहते थे और घर के बड़े बुजुर्ग लोग लॉक डाउन का पालन करते थे और हाँ खाट की ऐसी बनावट होती थी कि उसपर अगर एक आदमी सो सकता था मतलब सम्पूर्ण सामाजिक दूरी का पालन करते गप्प शप। कालांतर में सबकुछ बदलने लगा किसान भी मजदूर,औऱ सही दाम ना मिलने के अभाव में किसानी छोड़ने लगे या यूं कहे कि जो किसानी कर रहे थे वो किसी ना किसी मजबूरी में ही कर रहे थे।ग्राम से बच्चे बाहर जाने लगे,वो कब्बडी, गुल्ली डंडा, आदि जैसे खेल गांव से भी बिलुप्त होने लगे। मजदूरों को ऐसा लगने लगा कि खेत मे काम करना निम्म स्तर का काम होता है वो ग्राम में छः घंटे के काम मे 200/250 रुपये मजदूरी के बाबजूद शहर की ओर पलायन करने लगे।

गांव के वो खेत में काम करने वाले मजदुर शहर में यहाँ रिक्शा चलना,कूड़ा उठना, फैक्टरी में 12 घण्ठे से 15 घंटे काम करने वाले हो गए।अब पैसा कितना कमाते और बचाते थे यह इसी बात से अंदाज लगा लीजिए कि अब जब देश पर कोविड-19 जैसी बिपदा आयी है तो इन पलायनवादी मजदूरों के पास शहर में ना रहने के लिए ना छत है, ना खाने के लिए दो दिन का अनाज, मजबूरन जान को जोखिम में डाल कर गांव की ओर भागना चाहते है।अभी भी इनके दिल मे इतना विश्वास है कि वो किसान वो दुनिया को भोजन कराने वाला है देश का अन्नदाता है वो इनको कभी भूखा नही सोने देगा सो कोई साइकिल से कोई मोटर साइकिल से तो पैदल ही गांव की ओर कूच कर जाने को आमदा है। 

वैसे भारत के गांव के लोगो तो इस तरह के आपदा प्रबंधन में पहले से ही महारत हाशिल है।पहले तो प्रत्येक वर्ष ही कई गांव बाढ़ का हॉटस्पोर्ट हुआ करता था जिस कारण पूरा एरिया नेचुरल सील हो जाया करता था, ट्रैन,बस,यातायात के सभी साधन बंद यहां तक कि मुख्य रास्ते भी बाढ़ के कारण टूट जाते थे।हमलोगों ने अपने आंखों से देखा है जब मेरे गांव में बाढ़ आती थी औऱ पानी महीनों गांव को चारो ओर से घेर कर रखता था,शहर से आवाजाही बंद हो जाती थी,पूर्ण आइसोलेशन हो जाता था किन्तु किसी गांव में कोई भूखा नही मरता था ना ही कोई आत्महत्या करता था और ना ही कोई इस तरह से जान जोखिम में डालता था!आखिर क्या बाते थी हमारी संभ्यता संस्कति में जो हमे बिषम से बिषम परिस्थितियों में भी जीने की आस जगाए रखती थी? क्यों गांधी जी ग्राम स्वराज की बात करते थे?

क्यो आज की अवश्यताये भी ग्राम स्वराज, स्वदेशी,स्वाबलम्बन के इर्दगिर्द ही ज्यादा अच्छा जान पड़ती है? क्यों ऐसा कहा जाता था कि भारत,पुरानी सभ्यता संस्कृति व गॉंवो का देश?आप गहराई से अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि जीवन की जो भी मूलभूत आवश्यकताये थी वो गॉंव से आती थी और इसके  संबहाक किसान औऱ मजदूर थे।मानव जितना निर्रथक वस्तु का उपयोग करेगा,बिलासी जीवन जीयेगा,संसाधनो का दोहन करेगा उतना अधिक पर्यावरण पर बोझ बढ़ेगा और फिर एक ऐसी त्रासदी जन्म लेगी जो मानव को फिर से उसकी औकाद बात देगी।

आज विश्व का सबसे शक्तिशाली देश अपने जनता से टैक्स के पैसे बसूल कर बड़े बड़े हथियार बनाये,परमाणु बम बनाये,मिसालें बनाई,गाड़िया बनाई,सड़क बनाई,पूल बनाये और इस सबको उपयोग करने वाला मानव घर मे बैठा है,जो सिर्फ और सिर्फ मूलभूत खाने की वस्तु पर निर्भर है बाकी सब के सब धरे रह गए।मतलब आगे की चुनौती हमारे वर्तमान की तैयारी से अलग तरह की भी हो सकती है इसलिए हमें अपने आप को बिषम परिस्थितियों के लिए तैयार रखना पड़ेगा।इस विपदा के समय मे महानगरों के कई परिवारों में बोरा भर कर मैगी-बिस्कुट खरीदा जा रहा है ,दिन रात मजबूरी में खाया भी जा रहा है कारण खाने का सारा सामान तो दुकान,घरों में उपलब्ध है किन्तु बनाने वाली नौकरानी नही आती

कुछ घर मे पूरे परिवार बच्चो के जान को जोखिम में डाल कर भी नौकरानी बुलाने को मजबूर है। उन्हें ये भी पता है कि इससे परिवार पर कोविड-19 संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है, फ़िर भी पापी पेट का सवाल है। स्वाभाविक है ऐसे लोग,इस बिषम परिस्थितियों में ज्यादा बैचैनी,ज्यादा परेशानी अनुभव कर यह है,ये इस परिस्थिति के लिय बिल्कुल तैयार नही थे।किंतु हमारा गॉंव और मेरे जैसे लोग निर्बिबाद गति से अपना स्वाभाविक जीवन काट रहे है, कारण ये है कि जब बच्चे थे तो स्कूल में पाक बिज्ञान एक विषय हुआ करता था जिसमे कोई किताब नही होती थी, सिर्फ प्रक्टिकल मतलब स्कूल में ही सबको खाना बनाने का सिखाया जाता था या उस विषय मे पास करने के लिय स्कूल में ही खाना बनाकर सभी विद्यार्थियों को खिलना अनिवार्य होता था चीटिंग की कोई संभावना नही थी और वो पाकविज्ञान के परीक्षा का दिन भी किसी उत्सव से कम नही होता था।इनसे बच्चो में कम उम्र में ही यह पता होता था कि खाना बनाना है कैसे किसी को खिलाना है और बनाने खिलाने के कितने जरूरी सामग्री लगते है।

कई लोगो को लगता है कि शहरों की तरह गांव भी बैचैन,परेशान होगा,हैरान होगा इस लॉक डाउन में। तो ये भहम अपने दिमाग से निकाल दीजिए शुरुआत के कुछ परेशानियों के बाद गांव अब एकदम निर्बाध गति से चलना प्रारंभ कर दिया है ।अगर चिंता भी है उनको तो आपके स्वस्थ्य को लेकर है,आपके खाने को लेकर है क्योंकि उनको ये पता है कि अभी जो आपकी मुख्य जरूरतें आटा ,दाल,चावल, तेल, फल,दूध,सब्जियां है वो शहर की फैक्ट्री में नही बनती वो गॉंव से जाएगी।बस थोड़ा निश्चिन्त हो जाते है जब देखते है कि गांव में आम,लीची, कटहल,सब्जियों सब खूब फल,फुल रही है हरियाली चारो तरफ है,आपके प्रदूषण ना फैलाने के कारण उनके आसपास की नदियों की कलकल धारा की आवाज घर तक पहुँच रही है, नीले गगन को वो पहले आए ज्यादा नजदीक से अनुभव कर पा रहे है।

विश्व व्यायापी संकट होने के कारण पूरी दुनिया के कल कारखाने बंद है ,ओज़ोन की परत भी पुनः अपने होल को बंद करने का प्रयास कर रही है,वातावरण साफ औऱ स्वक्छ है। गॉंवो में गेंहू को कटवाना भी अब पहले से आसान हो गया है 5 मजदूर बुलाने पर 15 आते है। जिन किसान परिवारों ने ये काम जातीय,सामाजिक और आर्थिक संपन्नता के कारण छोड़ दिया था वो भी खेतो में हँसुआ लेकर गेहूँ काटने जा रहे है।हर मजदूर,किसान घर पूरे साल भर खाने का अनाज जमा करने में लगा है। एक हम है,शहर के लोग जो दो दिन भी अपने लिए काम करने वालो को भी ना रख पाए ना खिला पाए, और एक वो है भारतीय संस्कृति के पालक ,संरक्षक गांव में रहने वाले बड़े दिलवाले किसान जो लाख कमी के बाबजूद भी 5 के जगह 15 मजदूरो के खेत मे आने पर भी उनको नही भगा रहे बल्कि उसे भी काम दे रहे है जो मजदूरों कभी किसान के जरूरत के समय पर सीधा काम करने से मना कर देते थे। एक हम शहर के लोग है, जो एक समय का खाना देने मात्र से सेल्फी लेकर पूरी दुनिया को बताना चाहते है कि ये देखो हमने इनको एक समय खिलाया है किंतु वो किसान बिना किसी प्रचार प्रसार के मजदूरों के साल भर के खाने की व्यवस्था कर रहा है साथ साथ पूरे देश की भी।

अब तो मजदूरों को सोचना है कि कौन अच्छा पालक है और कौन बुरा। वो किसान जो साल भर का अनाज इस बिपत्ति में भी सुनिश्चित कर रहा है या वो फैक्ट्री का मालिक जो बिपत्ति में दो दिन भी ना खिला सका और घर जाने को मजबूर कर दिया।कहते है कि विपत्ति में ही तो सही दोस्त की पहचान होती है।ये भारतीय परंपरा की जीवट स्वरूप है जो अभी भी किसानों के उनके बच्चो के दिल मे रचा बसा है जिसका उदाहरण इस विषम लॉक डाउन जैसे परिस्थिति में भी देखने को मिलता है।यह तो एक उदाहरण है किन्तु ग्राम में लोगो ने इस आपात की परिस्थिति में सारे वो काम कर लिए है जिससे शहर  पर कम से कम निर्भर होना पड़े,जिसमे ग्रामीणों का आपस में दुध, सब्जी ,अनाज, आदि का आदान प्रदान एक मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है।पंचायत की राजनीति ने जो खाई ग्रामीणों के आपसी बोल चाल रहन सहन में पैदा की थी उसको भी इस लॉक डाउन की परिस्थिति पाटने का काम कर रही है।अब सबको ये पता है कि अभी एक दूसरे का सहारा ही हिम्मत जीने की आस है इसलिय मिल जुल कर रहना ही लाभदायक है।


डॉ कुंदन कुमार
शिक्षा - पीएचडी (बायोटेक्नोलॉजी) एमबीएएग्रीकल्चर पालिसी में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा। वर्तमान में सोशल एंटरप्रेन्योरशिप दिल्ली में कार्यरत। 12 साल का रिसर्च तथा अन्य फील्ड में व्यतिगत अनुभव।

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