तीसरा विकल्प (वैश्विक आर्थिक प्रणाली) - भाग-3


तीसरा विकल्प (वैश्विक आर्थिक प्रणाली) - भाग-3



संकलन - राजीव मिश्रा


वैश्विक नियम अपरिवर्तनीय होते हैं और धर्म उन्हीं के प्रकाश में समाज अर्थव्यवस्था की नित्य बदलने वाली संभावनाओं  को नियंत्रित करता है. जीवन का लक्ष्य है, सुख - वैसा सुख जो परिपूर्ण हो, ठोस हो, शाश्वत हो और अखंडित हो. पूर्णता पाने के लिए सुख का शासन शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक इन सभी स्तरों पर होना चाहिए. 

"सनातन धर्म" का शाश्वत संदेश रहा है कि विविधता में एकता देखो. (अविभक्तं विभत्तेषु). पहले की अपेक्षा आज यह अधिक प्रासंगिक है. उस विविधता को न ही बर्बाद करना है न सर पर चढ़ाना उचित है. 'धर्म' हर मानव समूह को अपने विशिष्ट ढांचे के अनुसार सामाजिक परिपूर्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है और उन सारे समूहों की मानसिकता को परस्पर पूरक, मधुर सामंजस्य की एकविश्वात्मकता की समान चौखट में गूंथ देता है.  "वसुधैव कुटुंबकम" जिसमें हर समूह स्वयं के चारित्रिक योगदान से मानवता की समष्टि चेतना के द्वारा समान सामूहिक चिंतन को परिपृष्ट  करता है. 

विश्व व्यवस्था के स्वरूप का विचार किए बिना वैश्विक अर्थव्यवस्था की सोच असंगत तथा अयथार्थ होगी. जब तक 'क्या होना चाहिए' का संबंध 'क्या है' से तर्कसंगत रीति से जोड़ा न जाए, तब तक वह संपूर्ण विचार प्रक्रिया केवल दिवास्वप्न बनकर रह जाएगी, सारा प्रयास व्यर्थ सिद्ध होगा. 

सन 1893 की दुनिया और 1993 की दुनिया में प्रचंड अंतर है. इस सदी के प्रारंभ ने राष्ट्र देखें, फिर राष्ट्र राज्य (Nation States) बने, जो मानव जाति की आधारभूत और महत्वपूर्ण इकाइयां थीं. राष्ट्र राज्य की स्वाभाविक विशेषता थी स्वतंत्रता और संप्रभुता. 

अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने पहले राष्ट्रसंघ बनाया, फिर संयुक्त राष्ट्रो द्वारा राष्ट्र राज्यों की प्रतिष्ठा पर कुछ प्रभाव तो छोड़ा, परंतु दुर्भाग्य की बात है की संभ्रमित संयुक्त राष्ट्र, "राष्ट्र" संकल्पना में और "राज्य" संकल्पना में विवेकपूर्ण अंतर न कर पाए. अंतरराष्ट्रीय शक्तियां "राष्ट्रीय संप्रभुता" की मूल संकल्पना को ही चुनौती दे रही हैं.   

विविध मानव समूहों द्वारा निर्मित मानवजाति का भविष्य जो भी हो, राष्ट्र राज्यों की शक्ति तथा प्रतिष्ठा का मापदंड तो आर्थिक क्षेत्र में अपेक्षाकृत संपन्नता तथा सैन्य बल ही है. 

किसी रोमांचकारी स्वप्नभूमि के नक्शे के रूप में इस नई व्यवस्था को प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं है. व्यवहारिक धरातल पर जन समस्याओं का सामना हमें करना है वे हैं जानबूझकर निर्मित अभाव, लाभ केंद्रित प्रेरणा, बढ़ते दाम वाली विपुलता की अर्थनीति, मानवतावादी प्रेरणा, गिरती हुई कीमतें आदि.  क्या पश्चिम के लोग समझ पाएंगे कि राष्ट्रीय संपत्ति का अर्थ "वस्तुओं और सेवाओं की प्रचुरता होती" है, न कि उसके बाजार-भाव

फिर क्या अधो निर्दिष्ट बातें व्यवहार में स्थान ले पाएंगे?

1. एकाधिकार वादी पूंजीवादी के स्थान पर, बिना बाजार में हेरफेर किए  कई उपायों से मुक्त प्रतियोगिता लाना. 

2. वेतन - रोजगार पर केंद्रित आर्थिक सिद्धांतों के स्थान पर स्वयंरोजगार पर आधारित सिद्धांत लाना 

3. निरंतर फैलती असमानता को समानता और सामान वितरण के लिए आंदोलन छेड़कर मिटाना. 

4. प्रकृति के शोषण के स्थान पर प्रकृति का दोहन करना. 

5. व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच निरंतर चलते संघर्ष के स्थान पर, उनमें पूर्ण सामंजस्य स्थापित करना.

आधुनिक मानव भागदौड़ में लगा हैउसके पास समय ही नहीं है कि "एकात्म मानववाद" के मूलभूत तत्वों का गहराई से चिंतन करें, जो तत्व वस्तुतः "सनातन धर्म" का ही आधुनिक आविष्कार है. 

सामान्य व्यक्ति चाहे कहीं का भी हो यथास्थिति में आत्मतृप्ति/ निश्चिंत होकर रहना चाहता है. जॉन मिल्टन के प्रभु (God) ने शायद इसी अवस्था में कहा होगा - "यदि सुख नहीं तो कमसे कम दुख ही उसे (मानव को) मेरी शरण में आने को प्रेरित करें. हिंदू सहस्त्रक याने मानवतायुग, क्योंकि 'हिंदू' और 'मानवता' समानार्थी शब्द हैं.  

महान मानवतावादी विवेकानंद ने कहा है कि -

"हम वह करें जिससे न्यायपूर्ण और शाश्वत शांति की प्राप्ति हो, हमारे भीतर भी और सभी देशों में भी".  

"किसी के प्रति घृणा न हो, सभी के प्रति करुणा हो, सत्य में दृढ निष्ठा हो, क्योंकि प्रभु ने हमें सत्य देखने की शक्ति दी है"


राजीव मिश्रा
नई दिल्ली

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