जिहादी तैयार करता तब्लीगी जमात


जिहादी तैयार करता तब्लीगी जमात

 आशीष रावत

विश्वभर में जिहादी तैयार करने वाले सबसे बड़े संगठन तब्लीगी जमात का मुख्यालय नई दिल्ली की बस्ती निजामुद्दीन के बंगलावाली मस्जिद में स्थित है। द न्यूयाॅर्क टाइम्स में प्रकाशित अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी एफ.बी.आई. के अनुसार तब्लीगी जमात विश्व का सबसे बड़ा इस्लामी जिहादी संगठन है जिसकी शाखाएं लगभग 159 देशों में हैं। इसके अनुयायियों की संख्या लगभग 20 से 30 करोड़ तक बताई जाती है। इस संगठन के संचालकों के दावे के अनुसार इस संगठन के प्रयासों से गत पांच दशकों में 25 करोड़ से अधिक गैर-मुस्लिमों ने यूरोप और अमेरिका में इस्लाम को स्वीकार किया है।

 इसके तैयार किए हुए जिहादी बाद में अलकायदा, बोकोहराम, अल अंसार, तालिबान, इस्लामिक स्टेट आदि चार दर्जन से अधिक आतंकवादी संगठनों में भर्ती किए जाते हैं। एफ.बी.आई. ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि इस जिहादी संगठन का प्रभाव यूरोपीय देशों अमेरिका और अफ्रीका के देशों में बड़ी तेजी से फैल रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस खतरनाक संगठन के कार्यकर्ता प्रचार और मीडिया से दूर बड़ी खामोशी से काम करते हैं। इसलिए विश्व की गुप्तचर एजेंसियां इसकी खतरनाक गतिविधियों से लगभग अनजान बनी हुई है।

इस संदर्भ में यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि भारत में इस संगठन द्वारा भारी संख्या में तब्लीगी इजेतमा (तब्लीगी महासम्मेलन) का आयोजन किया जाता है। 2014 में देश के नगरों में 55 विशाल इजेतमाओं का आयोजन किया गया था जिनमें भोपाल में आयोजित इजेतमा में 15 लाख और हैदराबाद में आयोजित इजेतमा में 20 लाख मुस्लिम शामिल हुए थे। इन इजेतमाओं में भाग लेने के लिए वाहन, खाना-पीना और आवास की व्यवस्था कहां से होती है यह अभी रहस्य ही बना हुआ है। 2016 में जमात ने अपनी नीति में परिवर्तन किया और इजेतमाओं को बड़े नगरों में आयोजित करने की बजाए छोटे-छोटे कस्बों और गांवों में आयोजित करने का सिलसिला शुरू किया। 

2017 में जमात के सूत्रों के अनुसार 150 महासम्मेलनों का आयोजन हुआ जिसमें 5 करोड़ लोगों ने हिस्सा लिया। 2016 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने अलकायदा से जुड़े हुए जिस गिरोह के 15 लोगों को बंेगलुरु, संभल, देवबंद, सहारनपुर, रांची, कटक से गिरफ्तार किया था उनसे पूछताछ के बाद यह रहस्योद्घाटन हुआ था कि ये लोग तब्लीगी जमात द्वारा आयोजित सम्मेलनों में भाग लेने के लिए गए थे और वहीं से अलकायदा के लिए भर्ती करने वाले लोगों ने उनका चयन किया था। इसके बाद उन्हें अस्त्र-शस्त्र, बम चलाने तथा बमों का निर्माण करने का प्रशिक्षण देने के लिए अफगानिस्तान एवं इराक स्थित जिहादियों के प्रशिक्षण शिविरों में भेजा गया था। 

क्योंकि आमतौर पर लोग और मीडिया तब्लीगी जमात की पृष्ठभूमि के बारे में वाकिफ नहीं हैं इसलिए उस पर कुछ प्रकाश डालना जरूरी है। 1920 में आर्य समाज ने जबरन मुसलमान बनाए गए हिन्दुओं को वापस अपने धर्म में लाने के लिए ‘शुद्धि अभियान’ शुरू किया था। इस अभियान के नायक आर्य समाज के बहुचर्चित नेता स्वामी श्रद्धानन्द थे। उन्होंने शुद्धि अभियान की शुरुआत राजस्थान और राजधानी के समीप मेवात क्षेत्र से शुरू की थी। इस अभियान के कारण जब कई लोग इस्लाम छोड़कर हिन्दू धर्म में वापस लौटने लगे तो एक धर्मान्ध मुसलमान अब्दुल रशीद ने 1926 में स्वामी जी के दिल्ली स्थित घर में घूसकर उनकी निर्मम हत्या कर दी। 

विख्यात् लेखक सीताराम गोयल ने अपनी पुस्तक मुस्लिम सेप्रेटिज्म में इस हत्या के लिए तब्लीगी जमात को दोषी ठहराया है। उन्होंने यह भी कहा है कि 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वस्त किए जाने के बाद मेवात क्षेत्र में जो हिन्दू विरोधी दंगे भड़के थे जिसमें दर्जनों हिन्दू मंदिरों को आग के हवाले कर दिया गया था उनके पीछे तब्लीगी जमात का ही हाथ था। शुद्धि आंदोलन के जवाब में देवबंद में शिक्षा प्राप्त मौलाना इल्यिास कांधलवी ने तब्लीगी जमात की शुरुआत की। कहा जाता है कि तब्लीगी जमात के प्रवर्तक का संबंध वहाबी सम्प्रदाय और शरियत उल्लाह के फराजी आंदोलन से था। इस आंदोलन को निजाम हैदराबाद और अन्य मुस्लिम शासकों ने करोड़ों रुपए की सहायता दी। भारत में तब्लीगी जमात की गतिविधियों पर जो हर साल अरबों रुपए फूंके जाते हैं वह कहां से प्राप्त होते हैं इस रहस्य का अभी तक पर्दाफाश नहीं किया जा सका। 

कांधलवी ने मुसलमानों को नारा दिया, ‘मुसलमानों मुसलमान बनो’ और उन्होंने मुसलमानों में वहाबी और जिहादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार किया। कांधलवी का परिवार शुरू से ही उग्रवादी जिहादी विचारधारा से जुड़ा हुआ था। जिसके प्रवर्तक सोलहवीं शताब्दी के कुख्यात जिहादी मौलाना मुजाहिदुल इस्लाम सरहिन्दी थे। देश के विभाजन के बाद तब्लीगी जमात के तीन प्रमुख भाग हुए। पाकिस्तान में तब्लीगी जमात का मुख्यालय लाहौर के समीप रायविंड कस्बे में स्थापित किया गया। 1949 में ढाका में भी इसका एक अन्य केन्द्र भी स्थापित हुआ। मौलाना इल्यिास के निधन के बाद इस संगठन की बागडोर उनके पुत्र मौलाना यूसुफ ने सम्भाली। यूसुफ के मरने के बाद उनके पुत्र मौलाना इनामुल हुसैन अमीर बने।

भारत में तब्लीगी जमात के काम करने का तरीका बड़ा अजीब है और उस पर आज तक रहस्य का पर्दा पड़ा हुआ है। कोई नहीं जानता कि इस विश्वव्यापी संगठन का असली संचालक कौन है और उसके पास खरबों रुपए की विपुल धनराशि कहां से आती है। इस्लाम के प्रसार और उग्रवादी गतिविधियों के संचालन का तरीका भी बड़ा अजीब है। जमात के कारकूनों से यह आशा की जाती है कि वह अपने आम जीवन में से 15 से 40 दिन इस्लाम के प्रचार और उसके संरक्षण के लिए प्रदान करेंगे। कार्यकर्ता ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रमण करते हैं और उनका डेरा ग्रामों की मस्जिदें होती हैं। उनके खाने-पीने की व्यवस्था ग्रामीण मुस्लिम जनता करती है। यह सारा काम इतना चुपचाप और सुनियोजित ढंग से होता है कि किसी को उनकी खतरनाक गतिविधियों की भनक तक नहीं लग पाती। इसी दौरे के दौरान आतंकवादी संगठनों में भर्ती के लिए उपयुक्त युवकों को तलाशा जाता है।


 आशीष रावत

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