भगवान श्रीराम की सभी लीलाएं मानव का कल्याण करने वाली हैं । (रामनवमी पर विशेष)




भगवान श्रीराम की सभी लीलाएं मानव का कल्याण करने वाली हैं ।

 (रामनवमी पर विशेष)



मानव शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है-पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु । यह भी सत्य है कि अंत में मृत्यु के पश्चात इन्हीं में विलीन हो जाना है । इस सत्य को जानते हुए भी परस्पर संघर्ष दिखाई देता है । संघर्ष के प्रकार अनेक हो सकते हैं परन्तु इसके मूल में जो कारण है, वह है मनुष्य की वृति। 

पांच महाभूत के अलावा सभी के अंदर एक और तत्व समान है, वह है आत्मा जो परमात्मा का अंश है, जो अविनाशी है, अजर-अमर है । इस आत्मा के प्रभाव में मनुष्य की बुद्धि होती है और बुद्धि के वश में मन होता है जिसके कारण वृति का निर्माण होता है । बुद्धि का काम विचार करने का है अर्थात अच्छा क्या, बुरा क्या है, करणीय क्या है, अकरणीय क्या है । मन पर बुद्धि का नियंत्रण न हो तो मन व्यक्ति से जो चाहे, वह करवा लेता है । षड विकारों (काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद,मत्सर) की उत्पत्ति का कारण भी मन ही है और सद्गुणवृतियों का कारण भी मन ही है।

मानव से देवता बनना या दैत्य बनना मन पर ही निभर करता है । मन पर बुद्धि का नियंत्रण रहे, यह कोई आवश्यक नहीं है, इसलिये सभी मनमानी न करने लग जाएं, इसके लिये नियम बनाये जाते हैं जिसे धर्म कहा जाता है जिनका पालन करना व करवाना अपेक्षित होता है । जो इनको भी न माने तो वह अधर्मी पुरुष कहलाता है । वह सब प्रकार से सबको दुखी करके रखता है और जब तक उसका अंत नहीं होता, तब तक उसके आतंक से सभी त्रस्त रहते हैं और ऐसे अधर्मी पुरुषों को सबक सीखने का कार्य भी शक्ति के उपासक देवी-देवताओं के द्वारा होता रहा है जैसे आदिशक्ति मां दुर्गा ने महिसासुर जैसे राक्षस को मार गिराया था, आचार्य विष्णुगुप्त (चाणक्य) ने धनानंद जैसे व्यभिचारी शासक को मरवाया था, छत्रपति शिवाजी ने आततायी औरंगजेब को नाकों चने चबाए थे । ये सब धर्मरक्षक वीर पुरुष थे।

लेकिन जब कोई अकेला ही इतना शक्तिशाली हो कि उससे सब डरने लगने लगते हों और उसके आतंक के डंक से कोई भी न बच पाए तो फिर भगवान को  अवतार लेना होता है जो पृथ्वी को उस अधर्मी के अत्याचारों से मुक्त करने का संकल्प लेता है।

ऐसे ही एक अधर्मी पुरुष रावण के अत्याचारों से त्रस्त पृथ्वी की रक्षा के लिए सभी  देवी-देवता, ब्रह्मा जी के नेतृत्व में विष्णु जी के पास जाकर गुहार लगाते हैं कि रावण के अत्याचारों से पृथ्वी पर घोर अंधकार छाया हुआ है, कहीं कोई आशा की किरण नजर नहीं आ रही है जो उसके अत्याचारों से मानव जाति की रक्षा हो सके । यह सुनकर  भगवान विष्णु सब देवी-देवताओं को आश्वस्त करके बिदा कर देते हैं कि मैं स्वयं अयोध्या के राजा दशरथ के घर राम के रूप में अवतार लूंगा और पृथ्वी से राक्षस जाति का नामोनिशान मिटा दूंगा और तब वे चैत्र मास के शुक्ल पक्ष नवमी के दिन माता कौशल्या के गर्भ से राजा दशरथ के घर अयोध्याजी में जन्म लेते हैं और तभी से श्रीराम नवमी के दिन राम-जन्म की खुशी में सब घरों को सजाया जाता है , दीप जलाए जाते हैं।

ऐसे अवतारी पुरुष की सभी लीलाएं जनहित का सन्देश देने वाली होती हैं , मानव का कल्याण करने वाली होती हैं। भगवान श्रीराम ने अपने जीवन में सभी आदर्श स्थापित किये अर्थात पुत्र कैसा हो, शिष्य कैसा हो, भाई कैसा हो, पति कैसा हो, मित्र कैसा हो, राजा कैसा हो इत्यादि। इसलिये उनको मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम कहा जाता है।

श्रीरामचरितमानस में बाबा तुलसी ने अवधि भाषा में भगवान श्रीराम के चरित्र का बड़ा सुंदर चित्रण किया है । इस ग्रन्थ का वाचन देशभर में किया जाता है, रामलीला के रूप में मंचन भी किया जाता है, दूरदर्शन पर भी रामायण सीरियल बड़ा ही मनमोहक व भावनप्रद लगता है ।  अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण होने जा रहा है जो उनकी दिव्यता का चित्रण करने वाला एक स्मारक बनेगा।

श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम  के बारे में एक चौपाई "प्रातःकाल उठके रघुनाथा, मातपिता गुरु नावहीँ माथा" के द्वारा उनके एक आदर्श स्वरूप को दर्शाते हैं । अगर इसी एक आदर्श को व्यक्ति अपना जीवन-व्यवहार बना ले तो विनम्रता व सेवा भावना की सद्गुण वृति  उसमें सदैव बनी रहेगी और अहंकार कभी नहीं आएगा । ऐसे ही सद्गुणी वृति के सब बने रहें, इसके लिये आवश्यक है, भगवान राम के बताए मार्ग पर चलने वाले आदर्श जीवन सामने दिखाई देने चाहिये । क्योंकि आने वाली पीढ़ी सुनकर नहीं, देखकर अच्छे से सीखती है।




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