आर के रस्तोगी दो काव्य रचनाएँ



आर के रस्तोगी
(1)

जज्बात मेरे कही खोये हुए है

जज्बात मेरे कही खोये हुये है 
कैसे कह दू ये सरमाये हुये है 

रोक न सकूगी जज्बातों को मै अपने 
भले ही तुम्हारे प्यार में घबराये हुए है 

बोये है बीज नफरत के,प्यार कैसे मिलेगा 
काटूँगी वही फसल जिसके बीज बोये हुए है 

पास बैठो तुम मेरे,दिल को सकून मिलेगा 
ये  मैफिल तेरे लिये ही हम सजाये हुए है 

कर नहीं सकता कोई अलग मुझसे तुमको 
अब तो तुम मेरे दिल में पूरे समाये हुए है 

बतला दो सच प्यार किसे तुम थे करते 
जो दिल में अपने वर्षो से छिपाये हुए है 


(2)

कोरोना पर एक बाल कविता

आज रविवार है
कोरोना को बुखार है
सौ के ऊपर डिग्री चार है
सोमवार को हनुमान जी नहीं आयेंगे
वे तो मंगलवार को ही आयेंगे
हनुमान जी आते है
डॉ के पास ले जाते है
डॉ साहब बोले ,
" इसको तो तेज बुखार है
कोरोना का ये शिकार है
इसके तो मरने के आसार है
इसका कोई इलाज नहीं
इसकी कोई दवाई नहीं
इसको तो मरना होगा
अपने कर्मो का फल भोगना होगा "
कोरोना बुधवार को मर जाता है
उसके घर कोई नहीं जाता है
क्योकि सब घर में बंद है
घर मै रहने के पाबन्द है
वीरबार को शुक्र शनि उसके घर आयेगे
वे ही उसका अंतिम संस्कार कर पायेंगे
जब हो जाएगा कोरोना का अंतिम संस्कार
तभी लोग खुश होकर निकलेगे घर से बाहर


आर के रस्तोगी
गुरुग्राम


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