नवीन हलदूणवी की चार पहाड़ी रचनाएँ



 नवीन हलदूणवी

 (1)

कुरतू सुथणू अल्ले नैं


रौल़े   रप्पे   हल्ले   नैं,
हुंदे  कम्म  धड़ल्ले  नैं।

देस तरक्की रोक्कीत्ती,
भड़ुए  टल्लपटल्ले  नैं।

माड़ा  हाल  बज़ारे  दा,
कीत्ता  इत्थू  दल्ले  नैं।

सुच्चा  सौद्दा  गाल़ीत्ता,
दो  नंबर  दे  गल्ले  नैं।

सनकां लाई टोआ दे,
गूंगे  बोल़े  झल्ले  नैं।

ब्हाने खूब "नवीने" दे,
कुरतू सुथणू अल्ले नैं।

 (2)

नोक्खी कलम 'नवीने' दी

रोग-बमारी सच्चा दी,
तरथल्ली ऐ मच्चा दी।

लम्मी  खौद्दल़  पेई  ,
झूठे खंब्बल़खच्चा दी।

माड़े  रीत-रुआजां  दी,
ढोलक नीं ऐं जच्चा दी।

बेह्लड़  सौई - बैट्ठी  जी,
रोट्टी  नीं  ऐं  पच्चा  दी।

अल़ख  धुड़ैन्ने  पुट्टा  दा,
वेसबरी      नच्चा   दी।

नोक्खी कलम 'नवीने' दी,
नौंईं   कवता   रच्चा   दी।

 (3)

सुथरा पाणी

सुथरा  पाणी  खात्ती  दा,
डर-डुक्कर नीं रात्ती दा।

खिंद - खदोलू जुड़दे हे,
गभरू  चौड़ी  छात्ती दा।

मिस्सी  रोट्टी  थ्होंदी  ही,
शुकर बड़ा हा दात्ती दा।

गल्ल बड़ी ही प्यारे दी,
रौल़ा  भौंऐं  जात्ती  दा।

खड़ - खपरे दे  टप्परु हे,
मरज  कुथू हा बात्ती दा?

खूब  "नवीन"  खलारीत्ता,
नाल़ू   बी   बरसात्ती   दा।

 (4)

करना लाज मरीज़े दा

करना लाज मरीज़े दा,
बोझ घटी जा गीज़े दा।

तत्ती   रोट्टी   खाई   लै,
ठंडा  छड्ड  फरीजे़  दा।

अप्पू  फसला  कट्टी  लै,
जो किछ बी ऐ बीजे दा।

भुक्खमरी नीं फैल्लै जी,
ख्याल रखी लै तीजे दा।

चैन-अमन नैं सौआ जी,
शोर  कुथू    डीजे  दा?

सुधरै  देस 'नवीनेदा,
मन्नो आक्खा जीज़े दा।

नवीन हलदूणवी
8219484701
काव्य - कुंज जसूर-176201,
जिला कांगड़ा ,हिमाचल प्रदेश।

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