सच्चे ऋषि भक्त, बहुमुखी प्रतिभा के धनी समर्पित विद्वान महात्मा प्रेमभिक्षु



महात्मा प्रेमभिक्षु जी की 26वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि
सच्चे ऋषि भक्त, बहुमुखी प्रतिभा के धनी समर्पित विद्वान महात्मा प्रेमभिक्षु

मनमोहन कुमार आर्य

 उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध महर्षि दयानन्द सरस्वती ने वेदों के सत्य अर्थों का प्रकाश किया था। इसके परिणामस्वरुप महाभारत काल के पश्चात उत्पन्न सभी मत-मतान्तर अप्रासंगिक हो गये थे। दिनांक 10 अप्रैल सन् 1875 को उन्होंने मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना कर ‘‘राष्ट्रोदय एवं विश्वोदयकी नींव डाली थी। उनसे प्रेरणा ग्रहण कर अनेक देशवासियों ने उनका अनुसरण किया और राष्ट्रोदय के कार्य को बढ़ाया। स्वामी श्रद्धानन्द, पं0 लेखराम, पं0 गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, पं0 श्यामजी कृष्ण वर्मा से आरम्भ श्रंृखला में महात्मा प्रेमभिक्षु जी का नाम भी प्रमुख है। इन्होंने सभी अन्ध विश्वासों एवं कुरीतियों से मुक्त एवं मत-मतान्तर विहीन, ज्ञान विज्ञान व समता पर आधारित राष्ट्र निर्माण के लिये अनथक कार्य किया। वह एक श्रेष्ठ मानव एवं प्राणीमात्र के सच्चे मित्र थे। 

वानप्रस्थ आश्रम की दीक्षा लेनपे से पूर्व महात्मा प्रेमभिक्षु जी श्री ईश्वरी प्रसाद ‘‘प्रेमके नाम से जाने जाते थे। जनपद मथुरा ग्राम करवै (देवनगर) में श्रावण कृष्णा 9, सम्वत् 1951 विक्रमी को एक वैश्य परिवार में श्री पुरुषोत्तम दास जी के यहां आपका जन्म हुआ था। पिता एक निष्ठावान आर्यसमाजी एवं यज्ञ आदि कर्मकाण्ड के प्रेमी व्यक्ति थे। एम00 साहित्यरत्न, सिद्धान्त शास्त्री तक आपने शिक्षा अर्जित की एवं अपने संस्कारों तथा दृण इच्छा शक्ति से वेदादि सहित आर्ष ग्रन्थों का अध्ययन कर उनमें विहित ज्ञान को आत्मसात किया।  

सन् 1942 में आप आर्यसमाज, तिलक नगर, मथुरा के सदस्य बने। अपनी सक्रियता से आप जनपद में छा गये। मथुरा के आर्यसमाज के जनपदीय संगठन के आप मंत्री रहे। महर्षि दयानन्द जी की भावपूर्ण जीवनी के लेखक स्वामी सत्यानन्द जी आपके मुख्य प्रेरणास्रोत एवं गुरु रहे हैं। आर्यसमाज, चैक, मथुरा सहित अनेक आर्यसमाजों एवं आर्य संस्थाओं की आपने स्थापना की। सन् 1952 में आपने तपोभूमि मासिक हिन्दी पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया जो अब 67 वर्ष बाद भी निर्विघ्न जारी रहकर धार्मिक व सामाजिक जगत की प्रशंसनीय सेवा कर रही है। अनेक अवसरों पर हमारे लेख भी इस पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं। वैदिक विचारधारा के अनुरूप वैदिक परिवार एवं प्रचारक तैयार करने हेतु आपने सन् 1960 में ‘‘विरजानन्द वैदिक साधनाश्रमकी स्थापना की थी। सन् 1978 में आपने वानप्रस्थ आश्रम की दीक्षा ली और परिवर्तित नाम महात्मा प्रेमभिक्षु धारण किया। सोनीपत के श्री हरिचन्द स्नेही ने महात्मा जी को एक उच्च कोटि का सन्त, दयालु, धर्मात्मा, दानवीर, प्रभु भक्त, प्राणीमात्र का कल्याण कर्ता एवं उच्च प्रतिभा का देवतुल्य मनुष्य लिखा है। 

गायत्री परिवार संस्था इस समय सफलता के शिखर पर है। लाखों परिवार इसके अनुयायी हैं जो समय समय पर अपने भव्य एवं विशाल आयोजनों व समारोहों द्वारा संस्था की जीवन्तता का परिचय देते रहते हैं। इस संस्था के संस्थापक आचार्य श्री राम शर्मा जी ने सन् 1945 से सन् 1971 तक मथुरा में निवास किया और आर्यसमाज के एक अनुयायी के रुप में महात्मा प्रेमभिक्षु जी के साथ आर्यसमाज के प्रचार कार्य में योगदान किया। आचार्य श्रीराम शर्मा जी के साथ अपने संबंधों के बारे में महात्मा प्रेमभिक्षु ने लिखा है मथुरा में सन् 1945 से 1971 तक साढ़े 26 वर्ष के लगभग आपका उनसे निकट सान्निध्य रहा। इसमें आरम्भ के 16 वर्षों सन् 1945 से 1960 तक विशेष निकटता और सन् 1945 से 1950 तक तो अत्याधिक अभिन्नता और पारिवारिकता का काल रहा। कालान्तर में गायत्री परिवार संस्था की स्थापना का आचार्य श्री राम शर्मा ने गायत्री मन्त्र की एक काल्पनिक मूर्ति बनाकर उसकी पूजा अर्चना कराकर बड़ी संख्या में पौराणिक मूर्तिपूजक जनता को आकर्षित किया। उनके इस अवैदिक मान्यताओं से दुःखी महात्मा प्रेम भिक्षु जी ने उन्हें जुलाई 1986 में एक विस्तृत पत्र पंजीकृत डाक से भेजा था। इस पत्र में उन्हें पाखण्डों को छोड़कर सत्य को अपनाने का सुझाव दिया था। स्मरण पत्र भेजने के बावजूद भी श्रीराम शर्मा जी ने महात्मा जी को कोई उत्तर न देकर स्वाभाविक शिष्टाचार का भी पालन नहीं किया। अज्ञान एवं अंधविश्वास दूर करने के लिए महात्मा जी का यह प्रयास सत्य प्रेमियों द्वारा सदैव स्मरण किया जायेगा एवं सराहा जायेगा। 

महात्मा प्रेमभिक्षु जी सेकूलर स्टेट का प्रचलित अर्थ धर्म निरपेक्षता के स्थान पर पंथ, मत या सम्प्रदाय निरेक्षता स्वीकार करते थे। जीवन के प्रायः प्रत्येक क्षेत्र में अधर्म के प्रचलन के लिए वह धर्म निरपेक्षता को ही दोषी मानते थे। उनका कहना था कि संसार के सभी मानवों का धर्म एक है और वह सबका साझा है। धर्म के लिए ईश्वरीय गुण व प्रेरणा आधार होती है। धर्म तर्क, विज्ञान और बुद्धिवाद का स्वागत करता है जबकि सम्प्रदायों की परम्परा में धर्म व मत की मान्यताओं में अक्ल का दखल नहीं हो सकता। विज्ञान व बुद्धिवाद से सभी मत कांपते हैं। धर्म आचरण पर बल देता है। जबकि सम्प्रदाय मात्र ईमान लाने पर। प्रेमभिक्षु जी के यह विचार आज भी विचारणीय एवं अनुकरणीय है। 

मासिक पत्रिका तपोभूमि में महात्मा प्रेम भिक्षु जी विविध विषयों पर गवेषणापूर्ण लेख एवं सम्पादकीय लिखते थे। मार्च 1991 अंक में आपने लिखा था कि चैत्र शुक्ल 1, यह सृष्टि संवत्सर मानव संवत्सर और वेद संवत्सर भी है। यही तिथि है जब श्री राम ने रावण पर विजय के पश्चात पुनः अयोध्या में प्रवेश किया और उनका राज्याभिषेक हुआ। इसी तिथि को युधिष्ठिर (धर्मराज) सिंहासनासीन हुए थे और इसी दिन महर्षि दयानंद ने नव क्रान्ति के अग्रदूत आर्यसमाज संगठन वा आन्दोलन की स्थापना की थी। अतः आर्यजनों और सभी भारत भक्तों को अनिवार्यतः इसी तिथि को नव वर्ष की मंगलमय तिथि के रूप में मनाना चाहिए। ऐसे ही प्रेरणाप्रद लेख महात्मा जी के जीवन काल में तपोभूमि में प्रकाशित होते रहे। 

उन दिनों दूरदर्शन चलचित्र व प्रसार माध्यम अश्लीलता, फैशन, अभक्ष्य पदार्थ मांस अंडे व मदिरा का सेवन, धूम्रपान आदि का प्रचार कर रहे थे। इससे हमारे विद्यार्थी वर्ग का चारित्रिक एवं शारीरिक पतन हो रहा था। मानिसक दृष्टि से भी हमारे विद्यार्थी एवं युवा प्रायः निर्बल एवं कुंठाग्रस्त होते थे व अब भी यही स्थिति है। महात्मा प्रेमभिक्षु जी इन बातों का तर्क व युक्ति के साथ विरोध करते थे। राजनीति में धर्म के प्रवेश का विरोध करने वालों से महात्मा प्रेमभिक्षु जी पूछते थे कि फिर क्या अधर्म को राजनीति मे लावें? उनका मानना था कि गांधी जी का रामराज्य धर्म राज्य का ही पर्याय था। 

महर्षि दयानन्द एवं आर्यसमाज ने इस देश की सुप्त चेतना को जगाकर राष्ट्रोत्थान की नींव डाली थी। इतिहास ने इनके साथ न्याय नहीं किया। आर्यसमाज के कार्यों की समीक्षा करते हुए प्रेमभिक्षु जी की मान्यता थी कि आर्यसमाज राष्ट्र का जागरुक पुरोहित है। धार्मिक क्षेत्र में मिथ्या आडम्बरों एवं अंधविश्वासों से आर्यसमाज ने ही सचेत किया था व अब भी करता है। सामाजिक क्षेत्र में दलित और नारियों पर हो रहे अत्याचारों तथा अनेक सामाजिक रूढ़ियों व कुरीतियों के विरोध में भी महात्मा जी ने अपने स्वर ऊंचे किए थे और राष्ट्रीय चेतना का भी प्रचारक यही है। देश की स्वाधीनता के साथ ही हिंदी रक्षा, गोरक्षा, हैदराबाद सत्याग्रह के रूप में हिंदू रक्षा के आर्यसमाज के अनेक सफल आंदोलन किए। 

दिनांक 3 जनवरी 1991 को महात्मा प्रेमभिक्षु जी के सान्निध्य में एक आर्य सत्याग्रही जत्था अयोध्या गया था। 5 जनवरी को संत देवरहा आश्रम में चल रहे रुद्र यज्ञ में वह शामिल हुए। वहां उन्होंने महन्त गोपाल दास से भेंट की और उन्हेंआर्यसमाज आंदोलन के साथ क्यों?’ शीर्षक से प्रकाशित पत्रक दिया। आर्य प्रतिनिधि सभा, उत्तर प्रदेश के नेता श्री इंद्रराज भी विभिन्न जिलों के आर्य सत्याग्रहियों के जत्थे के साथ अयोध्या पहुंचे थे। अपने व्याख्यान में इन्द्रराज जी ने स्व. गोस्वामी गणेशदत्त जी का संस्मरण प्रस्तुत कर कहा था कि आर्य एवं सनातन धर्म कैंची के दो फलक हैं। इनके बीच में जो आयेगा वह कट जायेगा। देवरहा आश्रम के अपने संस्मरण में प्रेमभिक्षु जी ने महन्त श्री गोपाल दास जी के महर्षि दयानन्द एवं आर्यसमाज के पक्ष में कहे इन शब्दों को भी उद्धृत किया जिसमें उन्होंने कहा कि यदि स्वामी दयानन्द और आर्यसमाज नहीं होते तो सारा देश पाकिस्तान बन जाता। 

संध्योपासना एवं यज्ञ के प्रति श्रद्धा प्रत्येक आर्य को दायभाग में मिलती है। जो आर्यसमाज का अनुयायी इन्हें नहीं जानता एवं नियमानुसार आचरण में नहीं लाता वह आर्य कहलाने का अधिकारी नहीं है। 8 से 14 जुलाई, 1993 तक मथुरा में गुरु विरजानन्द जयंती के अवसर पर आयोजित वृहत अथर्ववेद (आंशिक) यज्ञ महात्मा प्रेमभिक्षु जी के आचार्यत्व में हुआ था। गुरु विरजानन्द श्रद्धांजलि सभा में आर्ष गुरुकुल के आचार्य स्वदेश जी ने गुरुकुल को अपनी सम्पूर्ण क्षमताओं सहित त्याग और तप से पूर्ण उत्कर्ष तक पहुंचाने का संकल्प दोहराया। उन्होंने ओजस्वी वाणी में कहा था कि कैसी भी बाधायें हों वह बढ़ते ही रहेंगे। इस घोषणा से गदगद महात्मा प्रेमभिक्षु जी ने प्रसन्नता से सने हुए शब्दों मे ंकहा कि आचार्य स्वदेश के रूप में उन्हें नया यौवन मिल गया। महात्मा जी ने विश्वास व्यक्त कर कहा था कि गुरुधाम, मथुरा से ही ऋषि दयानन्द के स्वप्न साकार होंगे। वस्तुतः आचार्य स्वदेश जी एक देवपुरुष हैं। उनके गुणों से प्रभावित महात्मा प्रेमभिक्षु जी ने इनसे ऋषि दयानन्द के स्वप्नों को साकार करने की जो आशा व्यक्त की थी वह उचित ही थी। हमारा सौभाग्य है कि हमें लगभग 20 वर्ष पूर्व मथुरा के वेद मन्दिर में जाने का अवसर मिला है। वहां आचार्य स्वदेश जी ने हमारा बहुत उत्तम आतिथ्य किया था। 

महात्मा प्रेमभिक्षु जी ने अपने प्रेरणास्रोत महर्षि दयानन्द जी की ही तरह स्थान-स्थान पर जाकर वेदों का संदेश सुनाकर एक प्रचारक के कर्तव्यों का पालन किया। वेद की महत्ता एवं आतंकवाद विषयों पर उन्होंने 13 से 15 सितम्बर 1992 तक आजमगढ़ की एक धर्मशाला में प्रवचन किए थे। आतंकवाद के संदर्भ में आपने वेदों का उदाहरण देकर कहा था कि आततायी दूसरे दिन के सूर्य का दर्शन न करें। दण्ड व्यवस्था का उल्लेख कर पंजाब समस्या के समाधान के लिए दण्ड व्यवस्था को कठोरतम करने का संदेश भी महात्मा प्रेमभिक्षु जी ने दिया था। 

इससे पूर्व मथुरा में 16 अगस्त को नगर आर्यसमाज, जिला आर्य उपप्रतिनिधि सभा एवं आर्य वीर दल की संयुक्त बैठक का संचालन कर राष्ट्रोत्थान का दिव्य संदेश भी महात्माजी ने दिया था। अगले दिन महिलाआंे को नारी जागरण एवं कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर योगेश्वर कृष्ण के वैदिक स्वरूप को प्रस्तुत कर उनके जीवन से प्रेरणा ग्रहण करने का संदेश दिया था। 18 से 21 अगस्त तक आपने मऊ की आर्यसमाज एवं डी..वी कालेज में प्रवचन किये। देहरादून के वैदिक साधन आश्रम तपोवन में भी वह एक बार आये थे और अपने गवेषणापूर्व उपदेश से स्वाध्यायशील श्रोताओं के सम्मुख कई नए तथ्य उद्घाटित किए थे। 

आर्यसमाज उच्च धार्मिक तथा नैतिक मूल्यों की पक्षधर संस्था है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था होने तथा सदस्यों व अधिकारियों में धार्मिक मूल्यों के ह्रास के कारण समाज का संगठन निस्तेज हो रगया है। इस प्रतिकूल परिस्थिति से संगठन को उबारने के लिए महात्मा जी ने सार्वदेशिक सभा के प्रधान स्वामी आनन्द बोध सरस्वती जी को 7 फरवरी 1992 को मथुरा में आयोजित आर्य समाजोदय चिन्तन गोष्ठी में आमंत्रित किया था। अपनी ओर से महात्मा प्रेम भिक्षु जी ने प्रस्तुत सुझाव एवं आर्यसमाज के उपनियमों में संशोधन का प्रस्ताव जनवरी 1992 में तपोभूमि में प्रकाशित किया। प्रस्ताव में सदस्यों का आर्यकरण, वैदिक धर्मी परिवार के लोगों को ही अधिकारी बनाने, सपरिवार सत्संग में आना अधिकारियों के लिए अनिवार्य करना आदि कर्तव्य शामिल किये थे। 

अन्य मत-मतान्तरों के अनुयायियों में वेद प्रचार कर उन्हें वेदानुयायी बनाने के प्रति भी वह जागरुक रहे। वह आर्यकरण को भारतीयकरण का पर्याय मानते थे। मार्च 1993 में उन्होंने इस कार्य को तेजी से आगे बढ़ाने का आह्वान किया था। वह संसार के सभी मनुष्यों की एक ही जाति का स्वीकार करते थे। महात्मा जी गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित चार वर्णों वाली वर्णव्यवस्था के पोषक थे। वर्ण को जन्म के आधार पर मानना उन्हें स्वीकार नहीं था। तपोभूमि जुलाई, 1993 में जातिवाद बनाम वर्ण व्यवस्थाशीर्षक से लिखा गया उनका लेख पठनीय है। 26 जनवरी 1992 को गणतन्त्र दिवस के अवसर पर कश्मीर में राष्ट्रीय ध्वज के आरोहण हेतु भाजपा ने श्री मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में एकता यात्रा निकाली थी। यात्रा के आरम्भ में निरीह पशुओं भैंस, बकरे व मुर्गे आदि की बलि दी गई थी। इसके विरोध में चुनौती देकर महात्मा जी ने कहाथा कि मान्य जोशी जी! क्या आप पाखण्ड प्रपंचों और मध्य कालीन तथाकथित धर्म के ढकोसलों के आधार पर राष्ट्र के निर्माण का स्वप्न देखते हैं तो याद रहे कि निराशा ही हाथ लगेगी। 

महात्मा प्रेमभिक्षु जी द्वारा बड़ी संख्या में ग्रन्थों का लेखन एवं सम्पादन हुआ। प्रमुख ग्रन्थ शुद्ध रामायण, शुद्ध महाभारत, संस्कार चन्द्रिका, संगीत रत्नावली, मानस पीयूष, सुमंगली, दादी पोती की बातें आदि हैं। वेद मन्दिर मथुरा के अन्तर्गत संचालित आर्य गुरुकुल, सत्य प्रकाशन संस्था, मासिक पत्र तपोभूमि, वैदिक साधनाश्रम, गोशाला एवं उच्च माध्यमिक विद्यालय की स्थापना व संचालन आदि में आपकी प्रमुख भूमिका थी। मार्च 1995 में महात्मा जी को मूर्छा रोग हुआ था। यही रोग 25 अप्रैल, 2015 को आपकी मृत्यु का कारण बना। आप अपने पीछे अपना परिवार, पुत्र आदि एवं सुयोग्य अनुयायी एवं शिष्य छोड़ गयें। आपके अनुयायी, शिष्य आचार्य स्वदेश जी व आपके पुत्र श्री अशोक आर्य आदि आपके कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं। आज आपके इस संसार से प्रस्थान को 25 वर्ष पूरे हुए हैं। इस अवसर पर मथुरा में एक भव्य आजयोजन की योजना भी बनाई गई थी जो करोना महामारी व लाकडाउन के कारण कार्यरूप न ले सकी। महात्मा प्रेमभिक्षु जी की पुण्यतिथी पर हम आपको स्मरण करते हैं, नमन करते हैं और आपको अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। ओ३म् शम्।   

मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

Post a Comment

0 Comments

 विश्व के लिए खतरा है चीन