पिंजरे में बंद मानव



पिंजरे में बंद मानव

राजीव डोगरा 'विमल'

क्यों अच्छा लग रहा है न?
अब पंछियों की तरह
कैद होकर
तुम ही तो कहते थे न,
सब कुछ तो दे रहे हैं हम
दाना-पानी
इतना अच्छा पिंजरा
तो अब क्यों ?
खुद ही तड़प रहे हो
उसी पिंजरे में बैठकर।
क्यों बंधे हुए हाथ-पांव
अच्छे नहीं लग रहें तुम्हें?
मगर तुमने भी तो कभी
उड़ते हुए पक्षियों के
पंख बांधकर
सोने के पिंजरे में
उनको रखा था।


राजीव डोगरा 'विमल'
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक)
(भाषा अध्यापक)
गवर्नमेंट हाई स्कूल,ठाकुरद्वारा।
पिन कोड 176029
Rajivdogra1@gmail.com
9876777233
7009313259


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