भारत के सांस्कृतिक वैभव का प्रतीक : विश्व का सबसे बड़ा विष्णु - मंदिर अंकोरवाट



भारत के सांस्कृतिक वैभव का प्रतीक : विश्व का सबसे बड़ा विष्णु - मंदिर अंकोरवाट

डॉ राकेश कुमार आर्य 

भारत एक गौरवपूर्ण विश्व धरोहर का नाम है । विश्व के अतीत से भारत को निकाल दो तो यह सत्य है कि समस्त संसार के पास फिर ऐसा कुछ भी नहीं रहेगा जिस पर उसे गर्व और गौरव हो सकता हो । वैदिक सृष्टि संवत के अनुसार अभी तक हमारा यह सूर्य और हमारी यह पृथ्वी लगभग एक अरब 97 करोड वर्ष की यात्रा तय कर चुके हैं । इतने लंबे यात्रा-काल में संसार में जो कुछ भी आज ऐसा दिखता है जिससे मानवता गौरवान्वित हो सकती हो तो वह केवल भारत की ही देन है । बात चाहे संसार को राजनीतिक व्यवस्था देने की हो , चाहे न्याय व्यवस्था देने की हो , चाहे सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के विकास की हो , चाहे स्थापत्य कला , वास्तु कला के विकास की हो सभी में भारत ने ही कीर्तिमान गाढ़े हैं । जी हाँ , ऐसे कीर्तिमान जिनका विश्व में कोई सानी नहीं है , जो अनुपम और अद्वितीय हैं।

हम को अपने इस गौरवमयी इतिहास से जानबूझकर काटा गया । जिससे कि हमारे भीतर का वह गौरवपूर्ण 'भारत' न जाग सके जो कभी सारे संसार का गुरु हुआ करता था । यह इसलिए भी किया गया है कि यदि हमको यह बता दिया गया कि संपूर्ण संसार पर आपका ही शासन था , आपके ही राजनीतिक , सामाजिक और न्यायिक मूल्यों और सिद्धांतों से सारा संसार शासित - अनुशासित होता था , तो ईसाइयत और इस्लाम की खड़ी हुई झूठी दीवारें भरभराकर गिर जाएंगी ।
चाहे प्रत्यक्षत: ईसाइयत व इस्लाम विश्व पटल पर दोनों पिछली कई शताब्दियों से कितना ही संघर्ष क्यों न कर रहे हों , पर ध्यान रखना कि हिंदुत्व के विरुद्ध दोनों एक हैं । दोनों के षड्यंत्र एक हैं , दोनों की सोच एक है कि जैसे भी हो इस 'हिंदू' नाम के प्राणी को दबाए रखना है । इसको इसके आर्यत्व अर्थात श्रेष्ठत्व का बोध नहीं होने देना है । इसके गौरव की अनुभूति इसको नहीं होने देनी है । इस सांझा कार्यक्रम पर दोनों मिलकर कार्य करते हैं । इसके लिए कभी दोनों में तकरार नहीं हुई , दोनों ने कभी एक दूसरे के राज नहीं खोले कि तूने हिंदुत्व को या आर्य संस्कृति को क्षति पहुंचाने के लिए अमुक -अमुक कार्य किए ? अस्तु ।

आज हम भारत के गौरवपूर्ण अतीत की झांकी प्रस्तुत करने वाले एक ऐतिहासिक विष्णु मंदिर अंकोरवाट का उल्लेख कर रहे हैं । यह मंदिर कंबोडिया नामक देश में स्थित है । अंकोर  ख्मेर साम्राज्य की राजधानी थी। यह उस समय की बात है जब भारत के हिंदू राजाओं के अधीन ही इस देश का शासन चलता था । हिंदू राजा मनुस्मृति और अन्य आर्ष ग्रंथों के आधार पर अपने प्रजाजनों को राजनीतिक , सामाजिक और आर्थिक न्याय प्रदान करते हुए अपने शासन को चलाते थे। ख्मेर साम्राज्य लगभग 9 वीं शताब्दी से 15वीं शताब्दी तक अपने उत्कर्ष पर था। अंकोर एक 'महानगर' था। अंकोर शब्द संस्कृत के नगर शब्द से बना है । यह नगर उस समय के विश्व के महानगरों में गिना जाता था । यही कारण है कि इसमें वर्ष 1010 से 1220 0 तक के काल में विश्व की जनसंख्या का कम से कम 0.1% निवास करता था। ऐसे स्थान पर हमारे पूर्वजों ने अंकोरवाट का यह सूर्य मंदिर निर्मित करवाया था । जिसने उस समय के विश्व जनसमुदाय को अपनी ओर बहुत तीव्रता से आकर्षित किया था । बड़ी संख्या में लोग इस मंदिर को देखने के लिए जाया करते थे । इतना ही नहीं , आज भी 20 लाख से अधिक पर्यटक इस मंदिर को देखने के लिए प्रतिवर्ष कंबोडिया पहुंचते हैं। इसका नाम यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में अंकित है।

अंकोर नगर आजकल अपने मूल स्वरूप में नहीं दिखाई देता । आजकल श्याम रीप नामक आधुनिक शहर में उस पुराने नगर के ध्वंसावशेष ही दिखाई देते हैं। ये ध्वंसावशेष श्याम रीप के दक्षिण में वनों एवं खेतों के बीच स्थित हैं। कभी इस नगर में हजारों मंदिर हुआ करते थे । उनमें से अधिकतर आजकल ध्वंसावशेष के रूप में ही बिखरे पड़े हैं । यदि उन मन्दिरों को आज खोजा जाए तो हिंदू संस्कृति के केंद्र रहे अतीत के एक गौरव की अनुभूति सहज ही हो सकती है । आज भी अंकोर क्षेत्र में लगभग 1000 छोटे-बड़े मंदिर हैं। यह सारे मंदिर हमारे पूर्वजों के यश और कीर्ति की गाथा गा रहे हैं जो हमें यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि कभी यहाँ पर आर्य हिंदू संस्कृति का डंका बजा करता था । वेदों की ऋचाएं यहाँ पर गूंजा करती थीं । संस्कृत यहाँ के लोगों की मुख्य भाषा हुआ करती थी और श्रीराम व कृष्ण जैसे महापुरुषों को वैसा ही सम्मान यहाँ भी दिया जाता था जैसा भारत में दिया जाता था । इसके अतिरिक्त हमारे अग्नि , वायु ,आदित्य , अंगिरा और उनकी आगे की ऋषि परम्परा के अनेकों ऋषियों को भी यहाँ के लोग अपना मानकर उनका सम्मान करते थे। भारत के ऐसे गौरवपूर्ण अतीत का स्मरण कराने वाले कम्बोडिया के इन 1000 मंदिरों में से अनेकों मन्दिरों का पुनर्निर्माण किया गया है।

वर्ष 2007 में, अन्तरराष्ट्रीय अनुसंधानकर्ताओं के एक दल ने उपग्रह से प्राप्त फोटोग्राफ एवं अनेकों अन्य आधुनिक तकनीकों का उपयोग करते हुए यह निष्कर्ष निकाला था कि अंकोर, औद्योगीकरण के पूर्व के विश्व का सबसे बड़ा नगर था जिसका क्षेत्रफल कम से कम 1,000 वर्ग किलोमीटर (1.1×1010 वर्ग फुट) था। अंकोर को एक 'जल नगर' के रूप में माना जाता है क्योंकि इसमें एक जटिल जल-प्रबन्धन व्यवस्था विद्यमान थी।

अंकोरवाट का यह मंदिर विश्व का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर है। विष्णु परमपिता परमेश्वर की उस शक्ति का नाम है जो इस चराचर जगत का भरण - पोषण , वृद्धि और विकास करती है । इस प्रकार उस परमपिता परमेश्वर का ही नाम एक नाम विष्णु है । जब भारत में वेद ज्ञान लुप्त होने लगा या बौद्ध व जैनियों की देखा - देखी आर्य संस्कृति में विश्वास रखने वाले लोग भी मूर्ति पूजा करने लगे तो उस समय मंदिरों के बनाने का प्रचलन हमारे देश में आरम्भ हुआ । भारत का यही प्रचलन उन देशों तक पहुंचा जहाँ - जहाँ भारत का विश्व साम्राज्य स्थापित था या जो देश भारत का ही एक अंग होकर भारत की ही परम्पराओं को मानने में गर्व और गौरव की अनुभूति करते थे , या जहाँ पर हमारे हिंदू शासक सदियों नहीं युगों से अपना शासन करते चले आ रहे थे । कंबोडिया ऐसे ही देशों में से एक देश था । कम्बोडिया के इस मंदिर में साक्षात् भगवान् विष्णु शोभायमान हैं। इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सम्मिलित है । 

इस मंदिर का पूरा नाम यशोधरपुर था। कभी कंबोडिया फ्रांस का उपनिवेश हुआ करता था । जब इस देश को फ्रांस से स्वतंत्रता प्राप्त हुई तो यही मन्दिर कंबोडिया की अस्मिता और गौरव की पहचान बन गया ।।यही कारण है कि कंबोडिया के लोगों ने अपने इस मंदिर को अपने राष्ट्रीय ध्वज में भी स्थान दिया है।

12 वीं शताब्दी में कम्बोडिया पर हिंदू संस्कृति के प्रति पूर्णतया आस्थावान सूर्यवर्मन द्वितीय का शासन था । इसी राजा ने इस ऐतिहासिक धर्मस्थल अर्थात अंकोरवाट के मंदिर का निर्माण कराया। इस मंदिर में राम - रावण युद्ध को बड़े ही मनोरम ढंग से चित्रित किया गया है । युद्धरत रावण के 10 सिर और 20 हाथ दिखाए गए हैं । रावण के रथ में जूते हुए घोड़े का मुंह मनुष्य का है और वही घोड़ा उसके रथ को खींच रहा है । राम - रावण का बड़ा ही रोमांचकारी चित्रण यहां किया गया है । वहीं हनुमान रावण के घोड़े से जूझ रहे हैं । राम निरन्तर अपने बाणों की वर्षा रावण पर कर रहे हैं । एक चित्र में हनुमान रावण को सिर पर रखकर नीचे फेंक देते हैं । इसी प्रकार के अन्य चित्रण से राम - रावण युद्ध को यहाँ बड़ी सजीवता से चित्रित किया गया है।

इस प्रकार कंबोडिया में रामायण और भारतीय संस्कृति का बहुत ही अधिक प्रभाव दिखाई देता है । अंकोरवाट का मंदिर हमारे स्वर्णिम अतीत का एक स्मारक है । जिसे हम भारतीयों को अपने लिए एक तीर्थ की मान्यता प्रदान करनी चाहिए । लेखक ने अपनी पुस्तक "भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास , भाग - 1" में इस मंदिर के बारे में लिखा है कि - "भारत सरकार को इस देश से अपने सांस्कृतिक संबंधों को अंकोरवाट के निर्माण की भावना को सम्मानित करते हुए निर्धारित करना चाहिए तथा अपने सांस्कृतिक संबंधों की समीक्षा करनी चाहिए।"
वृहत्तर भारत में भारतीयों की निर्माण कला को देखकर प्रभावित हुए फैब्रिक लुई ने लिखा है :- "जब यूरोप सभ्यता से बहुत दूर था , उस समय के जो अवशेष एशियाई देशों से प्राप्त होते हैं , वे इस बात का प्रमाण हैं कि भारत के निवासियों ने सभ्यता के निर्माण का ठोस आधार प्राप्त कर लिया था ।''

यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि मिकांक नदी के किनारे बसे इस मंदिर को 'टाइम' मैगजीन ने विश्व की 5 आश्चर्यजनक चीजों में सम्मिलित किया था। इस मंदिर को 1992 में यूनेस्को ने विश्व विरासत में भी सम्मिलित किया है । इस मंदिर का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड में अंकित किया गया है। इस मंदिर के विषय में यह भी ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि इसे बनाने के लिए पचास से एक करोड़ रेत के पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। प्रत्येक पत्थर का वजन डेढ़ टन है।

इस मंदिर का निर्माण लगभग उस समय कराया गया जिस समय गौरी या उसके पूर्ववर्ती विदेशी आक्रमणकारी भारत पर आक्रमण कर रहे थे। हमारा उस समय का इतिहास हमें कुछ इस प्रकार पढ़ाया जाता है कि जब भारत को लूटने - खसोटने वाले लोग आने लगे थे तो उनका उचित प्रतिकार करने की क्षमता भारत के पास नहीं थी । यहां तक कि भारत के पास ऐसा कुछ भी नहीं था जिस पर वह गर्व कर सके । जबकि भारत उस समय विश्व के मार्गदर्शन के लिए अंकोरवाट में विष्णु मंदिर का निर्माण कर रहा था । जी हाँ , एक ऐसा मंदिर जो तथाकथित मुगलों की तथाकथित किसी भी कृति से बहुत उत्तम और बहुत ही दर्शनीय बनाया गया है। इस मंदिर को देखकर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जिस भारत के कुशल हिंदू शिल्पकार इस मंदिर को बना सकते थे उन्होंने ही ताजमहल जैसे अनेकों भव्य मंदिर और ऐतिहासिक भवन निश्चित रूप से ही बनाए होंगे । 

जिस समय कंबोडिया में भारत के हिंदू शिल्पकार मंदिर का निर्माण कर रहे थे उस समय के बारे में यह माना जा सकता है कि गजनी , गौरी आदि की परम्परा के विदेशी आक्रमणकारियों के आक्रमण उस समय का एक इतिहास हैं । हमारा मानना है कि इतिहास का यह भी एक उज्जवल पक्ष है कि कि जिस समय विदेशी आक्रमण भारत पर हो रहे थे भारत उस समय कुछ 'महत्वपूर्ण' कर रहा था , भारत के इस 'महत्वपूर्ण' को इतिहास के पृष्ठों से क्यों छुपाया गया ? यदि आक्रमणकारियों के आक्रमणों का उल्लेख किया जा सकता है तो इस घटना का उल्लेख भी होना चाहिए। 

यह तब और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब इस मंदिर के निर्माण के समय की तीन शताब्दियों में ईसाइयत और इस्लाम धर्म युद्ध में उलझे रहे थे और संसार को 300 वर्ष तक खून की नदियों में स्नान कराते रहे थे । दोनों अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे थे । दोनों के युद्धों का एक ही उद्देश्य था कि संपूर्ण मानवता को तलवार के बल पर कौन सा अपने झंडे तले लाने में सफल होता है ? कहने का अभिप्राय है कि वह खून से इतिहास लिख रहे थे और हम स्वर्णिम शब्दों में इतिहास लिख रहे थे। इतिहास किसका महत्वपूर्ण है ? यह आप स्वयं निर्णय करें।



डॉ राकेश कुमार आर्य 
संपादक : उगता भारत

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