क्या हिंदू अर्थशास्त्र भी व्यावहारिक शास्त्र बनने की क्षमता रखता है?





क्या हिंदू अर्थशास्त्र भी व्यावहारिक शास्त्र बनने की क्षमता रखता है?

संकलन -राजीव मिश्र 

पश्चिम ने यही पूर्व धारणा बना ली है कि सारा इतिहास उसी भविष्यवक्ता, उन्हीं लक्ष्यों और उन्हीं जीवन मूल्यों पर चल रहा है जैसे पश्चिमी मानव सोचता है. पश्चिमी समाज के उत्कर्ष काल के प्रमाण उपस्थित करके, उस कालखंड के पूर्व, पारंपरिक समाज में चलते आए तांत्रिक विकास के विशाल कालखंड को वे सुविधापूर्वक भूल बैठे जिस कालखंड में उन्होंने ही पश्चिम को उस तंत्र ज्ञान से परिचित कराया था. पश्चिम ने इस तथ्य से भी आंखें फेर ली कि उस कालखंड से पहले का तांत्रिक या भौतिक विकास सदा ही किसी सार्वभौमिकता, विशिष्ट कार्यकौशल, लाभैकदृष्टि और तटस्थता के मिश्रण की उपज नहीं था. 

डच परातत्व वेत्ता पी. हेझलिंग कहते हैं "कोई भी संस्कृति जब किसी पेचीदा काम (उत्पादन, सेवा, या विद्या) पर लक्ष्य केंद्रित कर सफलतापूर्वक संगठन करती है, तब वह आपसी सांस्कृतिक संबंधों का ही परिचायक होता है.  जो संस्कृति समाज संगठन में सफल होती है, वह प्रगत तंत्रज्ञान का प्रयोग करने वाली किसी संस्था में अच्छा काम करने में असमर्थ होगी, ऐसा कोई प्रमाण आज तक नहीं मिला है." 

रूडाल्फ की 'द माडर्निटी ऑफ ट्रेडिशन' में इस बिंदु से संबंद्ध बहुत सी जानकारी उपलब्ध हो सकती है, जिसमें दर्शाया गया है कि भारत में पारंपरिक ढांचों तथा सिद्धांतों को, नए प्रकार के कार्यों के लिए, समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कैसे स्वीकारा है. 

एक डच इंडालाजिस्ट हीस्टरमान लिखते हैं "आधुनिक परिवेश के साथ परंपरा का जो संघर्ष होता है, उससे निपटने हेतु संस्थाननुमा चौखट (ढांचा) बनाने में भारत आश्चर्यजनक रूप से सफल रहा है."

इस सामाजिक आर्थिक क्रांति की हमारी परंपरागत शैली आखिर है कैसी? इस श्री अरविंदो व्याख्या करते हैं -  "समाज में परिवर्तन किसी बनावटी ढंग से ऊपर से नहीं थोपा गया, अपितु परिवारों अथवा समाजविशेषों को स्वयं के विकास या सुधार हेतु अपने अचार में परिवर्तन लाने की पूरी स्वतंत्रता उन्हीं के अगुआओं द्वारा दी जाने के कारण वह परिवर्तन भीतर से ही अपने आप उभरता आया" 

धर्मशास्त्र (समाज) तथा अर्थशास्त्र (अर्थ नीति तथा राजनीति) का विचार करने वाले भारतीय मनीषियों ने समाज और शासन के लिए जो आदर्श तथा नियम बनाए, वे केवल तात्विक रूप से नहीं अपितु उसे समझने के लिए समाज मन को पहले से ही सुविकसित समाज मानसिकता को व्यवहारिक तर्कों के साथ अनुशासित बनाने के लिए, मूल तत्वों को क्षति न पहुंचाते हुए, सामंजस्य के साथ, जो भी नया तत्व या कल्पना समाज के लिए आवश्यक थी, उसे अनुकूल ढांचे में ढालकर उन्होंने प्रस्तुत किया, न कि क्रांतिकारी या विनाशकारी तरीके से. 

सनातन धर्म के शाश्वत, अपरिवर्तनीय सिद्धांतों के प्रकाश में ही सामाजिक - आर्थिक परिवर्तन होता रहे, यही हमारी कार्यप्रणाली है. हर "युगधर्म" सनातन धर्म का ही आविष्कार है जो किसी विशेष कालखंड और स्थान विशेष की आवश्यकता के अनुरूप ढाला जाता है.  'धर्म' का कोई पर्यायवाचक शब्द गैर हिंदी भाषाओं में नहीं मिलता.  अपरिवर्तनीय, सार्वभौम नियमों के प्रकाश में ही नित्य परिवर्तनशील सामाजिक - आर्थिक व्यवस्था की नित नई चुनौतियों का समाधान ढूंढना हिंदू शैली रही है. विविध स्मृतियों का प्रणयन इसी कारण हुआ.  हमारे लिए धर्म ही शाश्वत और वैश्विक-सार्वभौम प्रथप्रदर्शक है. 

ईश्वर तो सबको संदेश देने हेतु तत्पर हैं परंतु ईश्वर की बात सुनने की मानसिकता ही लोगों में नहीं होती!  सुधार/ रूपांतरण जो भारत में हुए हुए वे मजबूत नींव पर, कभी-कभी प्रायोगिक जांच कर के हुए, परंतु सदा सर्वदा उन अपरिवर्तनीय सार्वभौम नियमों के ही अधीन रहकर! 

संकटों के और चुनौतियों के समय में हम 'धर्म' में आश्रय पाते थे , जबकि यूरोपीय मन को उस धर्म के अभाव के कारण कुछ बैसाखियों, कुछ विशेष नामांकनो  या नारों की आवश्यकता पड़ी. सिद्धांत, वाद (Ism), विशिष्ट विचारधारा आदि का महत्व वहां इसी कारण से है. पश्चिम प्रभावित विद्वानों ने वही शैली यहां आयातित की, क्योंकि वे पश्चिम के विषय में तो थोड़ा कुछ जानते भी थे, पर अपना स्वयं का गरिमामय  भूतकाल उन्हें पूरी तरह अज्ञात था. 

चिंतन धारा विचारों का शास्त्र है.  किसी राजनीतिक या आर्थिक प्रणाली पर आधारित, किसी समूह विशेष या व्यक्ति विशेष का दूरदर्शितापूर्ण तर्क और चिंतन ही चिंतन धारा है. अपनी परंपरागत विचार प्रणाली से होने के कारण, हमारे पाश्चात्य रंग में रंगे बुद्धि वादी 'वादों' (Ism)  पर मुग्ध हो गए! और ब्रिटिश पूर्व कालखंड के समस्त हिंदू साहित्य में जब उन्हे कोई 'वाद' नहीं दिखातो उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि उनके पुरखे बौद्धिक रूप से पिछड़े थे, असंस्कृत थे. 

दृष्टिकोण दो अलग प्रकार के होते हैं - एक यह कि पहले कृति, बाद में उसका वर्णन और दूसरा यह कि पहले वर्णन, बाद में उसके अनुसार कृति करने का प्रयास.  ऐसा कहते हैं कि "चिंतन प्रणालियां (ideologies) रास्तों के भ्रामक नक्शे हैंं." उनमें रास्तों के अस्तित्व की पूर्वकल्पना की जाती है. यदि रास्ता ही अस्तित्व में न हो तो, तो उसके नक्शे तो असंगत ही बन जाए! 

आखिर क्या है हिंदुओं की मानसिकता का रहस्य जो हर नई परिस्थिति के अनुसार ढल जाते हैं? परम पूज्य गुरु जी ने बड़े स्पष्ट शब्दों में विस्तारपूर्वक यह बात कही है :- 

"एक बार जब एकता का जीवन प्रवाह हमारी धमनियों में बहने लगेगा, तब हमारे राष्ट्र के विभिन्न अंग अपने आप उत्साह के साथ मिलजुल कर समूचे देश के कल्याण हेतु काम करने लगेंगे ऐसा जीवन, ऐसा प्रगत समाज अपनी प्राचीन पद्धतियों में से जो विकासानुकूल है, उसकी प्राणों से बाजी लगाकर रक्षा करेगा, जिनकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी है उनका त्याग करेगा और उनके स्थान पर नई प्रणालियां विकसित कर लेगा.  प्राचीन क्रम के नष्ट होने पर न आंसू बहाने की आवश्यकता है, न नूतन क्रम को स्वीकार करने में हिचकिचाने की.  यही जीवित और विकासोन्मुख समाज का लक्षण है. वृक्ष जब बढ़ता है, तब नई कपोंलों को स्थान देने के लिए पुराने पत्तों, सूखी टहनियों को त्याग देता है. यहां प्रमुख बात यह है कि एकात्मता की मानसिकता हमारे पूरे समाज-परिप्रेक्ष्य पर छा जानी चाहिए."

तीसरा विकल्प - स्व०दत्तोपंत ठेगडी


संकलन - राजीव मिश्र
28 अप्रैल 2020, नई दिल्ली


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