आखिर हिन्दू अर्थशास्त्र नाम क्यों?



आखिर हिन्दू अर्थशास्त्र नाम क्यों

(संकलन - तीसरा विकल्प)

संकलन राजीव मिश्र

हर पारिभाषिक शब्द मंत्र के समान होता है. गलत शब्द प्रयोग, गलत मतों को, गलत मानसिक अवधारणाओं को और गलतफहमियो को जन्म देता है. 

आर्थिक विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत राष्ट्राभिमानियों  ने अपने-अपने क्षेत्र में हिंदू चिंतन धारा को रोपने का प्रयास किया, परंतु उनके प्रयास उनके अपने विशिष्ट क्षेत्र तक ही सीमित होने के कारण बटे हुए बिखरे से थे.  हिंदू अर्थ शास्त्रीय विश्व की समूची गतिविधियों और विचारों को संकलित रूप में समा लेने के तथा उसके आधारभूत तत्वों को ढूंढने के सर्वसमावेशी प्रयास अब तक नहीं हुए हैं. इस दिशा में यह पहला ही कदम है. 

आज तक, करों की अनावश्यकता कि हिंदू पद्धति किसी ने विशद नहीं की थी. डा० बोकारे ने खिश्चिन युग के पहले के कालखंड को प्राचीन भारत माना. रॉबिंसन - वर्गीकरण के अनुसार हिंदू अर्थपद्धति, सिद्धांत की सकारात्मकता का परिणाम है. यह एक रोमांचक निष्कर्ष है.  प्रामाणिक वैज्ञानिक वृत्ति के विद्वान होने के कारण वे यह दावा नहीं करते कि इस विषय में उन्हीं की धारणा को अंतिम शब्द माना जाए.  भारतीय संस्कृति के अनुगामी यह भी घोषित नहीं करते कि वे  किसी नई पद्धति या चिंतनधारा के जनक हैं. यद्यपि ज्ञान की इस शाखा के वे प्रथम पुरस्कर्ता हैं, उन्हें यही कहने में संतोष है कि "एवं परंपराप्राप्तम् इमं राजार्षयो विदु:" 

हिंदू संतों ने "अर्थ" को चतुर्विध पुरुषार्थ का याने "पुरुषार्थचतुष्टय"  का एक अभिन्न अंग माना है. स्वतंत्र पुरुषार्थ नहीं. पश्चिम ने, अपने प्रथक्करणात्मक सोच के कारण उसको अपनी अलग पहचान वाली एक स्वतंत्र शिक्षा शाखा (discipline) मान लिया. ऐहिकतावादी  पश्चिम की नजर में मानवप्राणी मूलतया एक अर्थपरायण जीव है. यह सोच हिंदुओं की अखंडतावादी धारणा से ठीक विपरीत है. पाश्चात्य विचार में अब एक प्रवाह विश्वास करने लगा है कि परिपूर्ण कल्याण प्रायः दो भागों में विभाजित है -

1. आर्थिक समृद्धि

2. अर्थ निरपेक्ष कल्याण 

डा० पिगो आर्थिक कल्याण की परिभाषा का वर्णन करते हैं - वित्त के मानदंड पर जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रीति से सामाजिक सुविधा से जोड़ा जा सकता है वह आर्थिक कल्याण का अंश है. समूचे कल्याण का वह अंश जो आर्थिक मापदंड से नहीं आंका जा सकता, वह है अर्थ निरपेक्ष कल्याण. 

1957 में "ओपन सीक्रेट आफ इकोनॉमिक" नामक पुस्तक में डेबिड मैकार्ड राइट लिखते हैं  "आर्थिक विकास के मूलभूत तत्व स्वाभाविक रूप से अर्थ निरपेक्ष और अ-भौतिक होते हैं. अशरीरी आत्मा ही शरीर को पुष्ट बनाती है. 'रोड टू फ्रीडम' में बर्नाड शा ने लिखा है "यदि समाजवाद आ भी गया, तो वह तभी उपकारक होगा जब अर्थनिरपेक्ष वस्तुओं की कद्र की जाएगी, और उन्ही का आग्रह रखा जाएगा. 

"प्रिंसिपल आफ इकोनामिक प्लैनिंग" में लुईस लिखते हैं- यदि लोग अपनी तई राष्ट्रवादी होते हैं, अपने पिछड़ेपन के विषय में सतर्क रहकर उन्नति के इच्छुक होते हैं, तो खुशी-खुशी परिश्रम करते हैं.  कई गलतियों को झेलते हैं और अपने देश के पुनर्निर्माण कार्य में बड़े उत्साह के साथ स्वयं को झोंक देते हैं. इस उत्साह में द्विविध  शक्ति है - वह योजना के लिए लुब्रिकेटिंग ऑयल है और आर्थिक विकास के लिए पेट्रोल!  यह ऐसी शक्ति है जो प्रायः सब कुछ संभव बना देती है."

हिंदुओं की सदा यही धारणा रही है कि अन्य बातों के परिपेक्ष्य में शिक्षा, पर्यावरण, अर्थशास्त्र और नैतिकता को सत्य निष्ठा से ही समझना चाहिए.  

श्री अरविंदो ने अर्थशास्त्र की व्याख्या निम्न प्रकार से की है. "अर्थशास्त्र का उद्दिष्ट केवल उत्पादन का एक महा विशाल यंत्र बनाना नहीं है, चाहे वह उत्पादन स्पर्धात्मक हो या सहकारात्मक.  अपितु मनुष्य को किसी एक मनुष्य को नहीं बल्कि हर मानव को, यथासंभव उच्चतम मात्रा में, उनके स्वयं के रुझान और समयावकाश के अनुसार, काम का आनंद प्रदान करना, तथा एक सीधा-सादा समृद्ध और सुंदर जीवन सभी को उपलब्ध कराना उसका उद्देश्य है."

सोल्झेनित्सिन ने अपने “Man have Forgotten God  नामक निबंध में दो टूक शब्दों में विधान किया है कि ऐहिक विकास के पीछे दौड़ने के स्थान पर, अर्थशास्त्र की ध्येयनीति "आध्यात्मिक विकास" की ललक की ओर होनी चाहिए.


राजीव मिश्र
18 अप्रैल 2020
नई दिल्ली

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