आओ जलाएं एक दीया देश के नाम



आओ जलाएं एक दीया देश के नाम

देवानंद राय

आज पूरा विश्व कोरोना महामारी के कारण दुख विषाद चिंता और अवसाद के अंधेरे में घिर चुका है। उस वक्त हमारे प्रधानमंत्री के द्वारा सामूहिक शक्ति और उत्साह का प्रतीक के रूप में दीया ,दीपक, टोर्च या मोबाइल की फ्लैश लाइट जलाने की बात स्वागत योग्य है। आज यह वायरस मानव के अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है, तो वही देश में पिछले कई दिनों से लॉकडाउन के कारण घर में ही लॉक हो चुकी जनता भी धीरे-धीरे इस लड़ाई के मुख्य हथियार सोशल डिस्टेंसिंग और लाकडाउन का पालन करते करते उभने लगी है। उसका इस लड़ाई में उत्साह फीका पड़ने लगा है जो कि सही नहीं है।

अभी हमने पूरी जंग जीती नहीं है। हम जंग जीतने की ओर बढ़ चले थे पर तबलिगियों ने पूरा खेल बिगाड़ कर रख दिया। इस कारण देश में गुस्सा भी है और मानव स्वभाव के अनुसार इतने लंबे समय तक लॉक डाउन के कारण उसका उत्साह कम होना स्वभाविक है। इसके कारण 5 अप्रैल को रात 9:00 बजे 9 मिनट के लिए सभी लाइट बंद कर हमने अपने सामूहिक शक्ति का प्रदर्शन कर और एक दिया जलाकर इस कोरोना महामारी  के कारण पूरे देश में फैले दुख और निराशा के अंधकार को मिटायेंगे। आज सब विशेष रूप से निपटने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है।

भारत ने भी कोशिश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है । उस वक्त दिया नहीं जलाएंगे जैसे अनर्गल प्रलाप सिर्फ मोदी विरोध के कारण कर रहे हैं। इनमे  मशहूर शायर मुनव्वर राणा भी शामिल है।  पढ़े-लिखे मुसलमानों से ऐसी उम्मीद न थी। जो अपनी कौम के जमात पर एक शब्द ना बोल सके और इस सामूहिक प्रयास पर बोलने के लिए चल पड़े मजाक करने। मजाक में कहे तो अगर कभी मोदी जी कह दे हमसे  कि सांस लेना, तो कभी यह लोग तो सांस लेना बंद कर दे। मतलब हद है विरोध करने की और उस वक्त जब देश संकटों से घिरा है। जब सकारात्मक सोच और सकारात्मक वातावरण होना आवश्यक है । खैर मेरे बोलने से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला, पूरा देश गिरी हरकतों को देख रहा है।  वैसे हमारी संस्कृति बिना दिया जलाए कोई भी पर्व अनुष्ठान पूर्ण नहीं होता है। दिया जलाने के पीछे वैज्ञानिक आधार भी है।

 बृहदारण्यक उपनिषद श्लोक जो पूरे भारत में प्रसिद्ध है, "ओम असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय ओम शांति शांति शांति" इस प्रसिद्ध श्लोक का अर्थ है कि मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चल, मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चल, मुझे मृत से अमरता की ओर ले चलो  वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो दीपक जलाने से सरसों में उपस्थित विशिष्ट रसायनों की ऑक्सीकरण होने से घर में सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है । वातावरण से सूक्ष्म कीटाणुओं का नाश होता है । यही कारण है कि प्राचीन समय में जब कोई अतिथि आते थे तो गृह प्रवेश के वक्त उनकी आरती उतारने का विधान था  ताकि दूरदराज से आप व्यक्ति के साथ आने वाले सूक्ष्म कीटाणु और नकारात्मकता सकारात्मक तरंगों में बदल जाए । 

आज जब कोरोना ग्रसित होने वाले लोगों की संख्या पूरे विश्व में दस लाख से ज्यादा हो चुकी है ।बड़े देश और बड़े शहरों में मौत का तांडव चल रहा है। दुनियाभर और निराशा के माहौल में जीने को विवश हो चुकी है, तो ऐसे समय में हमें इस नकारात्मकता पर प्रबल विजय के लिए हम सब को सकारात्मक रूप से सफल होकर इसे मात देनी होगी। प्रधानमंत्री जी ने अपने वीडियो संदेश में स्पष्ट किया कि हमें खुद को अकेला नहीं समझना है । हर भारतीय का योगदान महत्वपूर्ण है ।जो लॉकडाउन का पालन कर रहा है। प्रधानमंत्री जी से पता चलता है कि इस महामारी को रोकने के लिए इससे पूर्व 19 मार्च को  इस महामारी से लड़ने के लिए संयम और संकल्प लेने का आह्वान किया था। तो वहीं 22 मार्च को जनता कर्फ्यू की घोषणा हुई, फिर कोरोना वायरस को हराने के लिए 24 मार्च को ही देशव्यापी लाकडाउन की घोषणा की गई।

हम इन सभी ठोस उपायों तथा कड़े उपायों के कारण ही सुरक्षित हैं और फेस टू में ही है। वरना कई बड़े देश जिन्होंने इस वायरस को छोटा और कमजोर समझा, आज भी इसके सामने घुटने टेकने की स्थिति में आ चुके हैं। तो आइए हम सभी पूरे जोश उत्साह के साथ संकल्प संयम सकारात्मकता, सम्मान तथा सहयोग को मूल मंत्र बनाकर इस कोरोना रूपी अंधकार को दूर करने के लिए एक सकारात्मक दीप जलाएं तथा वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलाए। इस उत्साह के आवेग में आकर हम लॉकडाउन की लक्ष्मण रेखा में रहकर ही पूरे जोश और उत्साह के साथ एक दिया जलाएं और रौनक से नकारात्मकता को दूर भगाएं।


देवानंद राय
गोरखपुर  

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