दीप प्रज्ज्वलन - प्रवीण जोरिया 'जन्नत'


दीप प्रज्ज्वलन

प्रवीण जोरिया 'जन्नत'

राष्ट्र-हित में, प्राणी-हित में,
मैंने भी दीप जलाए हैं।
मैंने भी दीप जलाकर के,
प्रचलित महामारी पर विजय-परचम लहराए हैं।।

दीप प्रज्ज्वलन में तो वैसे भी,
हिन्द-संस्कृति का वास है।
अब दीप प्रज्ज्वलन करके मैंने,
किया नकारात्मक ऊर्जा पर अट्ठहास है।।

पहले थाली पर थाप लगाकर,
किया अब दीपोज्ज्वलन से संघर्षियों का गुणगान ।
कुटीर में बैठे-बैठे भी मैंने,
किया अपने प्राणप्रिय वतन का सम्मान।।

दीप प्रज्ज्वलन से निस्संदेह,
सहमी दुनिया में कुछ आशा तो जागी होगी।
प्रस्फुटित प्रकाश-कण से निस्संदेह,
सकारात्मक ऊर्जा अनुरागी होगी।।

दीपमाला की जगमग से 'जन्नत',
मानो पुनः अवतरित हुई दीवाली।
सब में नवजीवन का संचार दिखा,
जो हर गली-कुटिया लगती थी खाली-खाली।।

तमस् से प्रकाश की दिशा में बढ़कर,
मैंने सकल विश्व-हृदय हरषाए हैं।
एक नहीं अगणित महाव्याधियों की चढ़ छाती पर,
  मैंने कर दो-दो हाथ दिखलाए हैं।।

राष्ट्र-हित में, प्राणी-हित में,
मैंने भी दीप जलाए हैं।
मैंने भी दीप जलाकर के,
प्रचलित महामारी पर विजय-परचम लहराए हैं।।



राष्ट्रवादी साहित्यकार–
     प्रवीण जोरिया 'जन्नत'
     कतलाहेड़ी, करनाल (हरियाणा)
चलभाष सं०-9034956534,8569928797

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