कोरोना काल में दान का महत्व



कोरोना काल में दान का महत्व 


✍ दुलीचंद कालीरमन

भारतीय संस्कृति में दान का बड़ा महत्व है। गरुड़ पुराण में दान-धर्म के विषय में बताया गया है कि अपनी मेहनत और सच्चाई से अर्जित अर्थ का दान ही सफल होता है अर्थात सदवृत्ति से प्राप्त धन जब सुयोग्य पात्रों को दिया जाए, वही दान कहलाता है।
दान के चार प्रकार होते हैं- नित्य, नैमित्तिक, काम्य और विमल। प्रथम तीन तरह के दान में कामना रहती है। केवल ईश्वर की प्रसन्नता की भावना से किया गया दान विमल कहलाता है। यह समस्त दानों में सर्वश्रेष्ठ कहलाता है।
दान देने के लिए हमें प्रकृति से सीख लेनी चाहिए। जिस प्रकार वृक्ष परोपकार के लिए फल देते हैं, नदी जल देती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी परोपकार के लिए दान करना चाहिए। हिंदू धर्म में ही नहीं अपितु विश्व के सभी धर्मों में दान का विशेष महत्व है। भारतीय वांग्मय व लोक संस्कृति में राजा हरिश्चंद्र तथा राजा कर्ण के उदाहरण भी मिलते हैं। जिन्होंने दान के अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। आज भी उन्हें  किद्वंतियों और लोकोक्तियों में याद किया जाता है।
 पुराणों में अनेक प्रकार के दान का उल्लेख मिलता है लेकिन अन्नदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। रोगियों की रोग शांति के लिए औषधि तथा भोजन देने वाला मनुष्य रोग रहित होकर सुखी व दीर्घायु होता है।
दान के कई मनोवैज्ञानिक पक्ष  भी है।  दान करने से विचारों में खुलापन आता है। दान से मोह की शक्ति कमजोर होती है। इससे अहम और मोह का त्याग होता है। भारत में मंदिरों, गुरुद्वारों व अन्य धार्मिक स्थलों पर दान देने की परंपरा है। कई धार्मिक स्थलों के पास अपार संपत्ति है।
 वर्तमान कोरोना संकट के काल में लॉकडाउन से दिहाड़ी मजदूरों,निम्न आय वर्ग के लोगों का जीवन कठिनाइयों से गुजर रहा है। ऐसे में समाज के कई दानी सज्जन अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए बड़ी मात्रा में जन सेवा का कार्य कर रहे हैं। कई मंदिरों और गुरुद्वारों भी इस संकटकाल में अभावग्रस्त व्यक्तियों को भोजन उपलब्ध करवा रहे हैं। भारत के कई औधोगिक घरानों तथा अन्य प्रसिद्ध हस्तियों ने भी अपने खजाने जनसेवा के लिए खोल दिए हैं। कहा भी गया है कि नर सेवा – नारायण सेवा।
 वैसे तो दान के बारे में यह कहा गया है कि अगर एक हाथ से दान करें तो दूसरे हाथ को पता नहीं लगना चाहिए लेकिन किसी संकटकाल में हम एक दूसरे को देख कर भी प्रेरित हो सकते हैं। इससे समाज में सकारात्मकता बढ़ती है तथा जीवन मूल्यों का रक्षण होता है। दान के बारे में कबीर ने भी कहा है कि-
“चिड़ी चोंच भर ले गई, नदी न घटियों नीर।
दान दिये धन ना घटे, कह गए दास कबीर॥


✍ दुलीचंद कालीरमन
(शिक्षाविद् व स्तंभकार)

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