कोरोना संकट, विश्व और चीन का दोहरापन



कोरोना संकट, विश्व और चीन का दोहरापन

डा. अभिषेक प्रताप सिंह

ऐसे समय में जब, डब्ल्यूएचओ-चीन के सम्बन्ध और कोरोना संकट के समय उनकी निष्पक्षता को चर्चा की जा रही है, और जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन सरकार लापरवाही को इसके लिए लगातार जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, यह जानना बहुत जरूरी है कि यह स्वास्थ्य समस्या क्या चीन की व्यवस्था में व्याप्त सीमाओं को प्रदर्शित करता है?

आकड़ों की बात करें तो अब तक, पुरे विश्व में लगभग १० लाख से अधिक लोग इससे पीड़ित है, और जर्मन प्रेजिडेंट मैर्केल ने इसे 'दूसरे विश्व युद्ध के बाद का सबसे बड़ा संकट' माना हैI इटली, स्पेन, अमेरिका सहित जहां कई यूरोपीय देश का इसका केंद्र बने हुए हैं, वही अफ्रीकी महाद्वीप में इसके और भयावह रूप देने की संभावना  विशेषज्ञों ने जताई है । इस संदर्भ में भारत सरकार द्वारा स्वास्थ और यात्रा निर्देशों के प्रसार में दिखाई गई तेजी की डब्ल्यूएचओ ने भी प्रशंसा की है, जिसमे हाल ही में दिया गया प्रधान मंत्री मोदी जी का जनता कर्फ्यू भी महत्वपूर्ण है।

कोरोना वायरस, जो चीनी शहर वुहान में दिसंबर 2019 में उभरा था, एक रोगज़नक़ के रूप में है जो गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम का कारण बनता है। अगर हम पिछले 3 माह में  कोरोना संक्रमण के विस्तार को देखें  तो कुलमिलाकर, चीन में कोरोना प्रकोप से निपटने के लिए शीघ्रता और प्रभावशीलता का अभाव था।  

30 दिसंबर 2019 को डॉ0 ली वनलियांग ने  वुहान  मैं अपने साथी डॉक्टरों के साथ एक निजी संदेश में  एक नए किस्म के कोरोना संक्रमण के फैलने का खतरा जाहिर किया। इसका संज्ञान लेने के बजाय, वहां के पब्लिक सिक्योरिटी ब्यूरो ने उनसे अफवाह ना फैलाएं को लेकर एक निजी माफीनामा पर हस्ताक्षर लिया । 10 जनवरी को कोरना से संक्रमित होने के बाद, 7 फरवरी को उनका निधन हो गया।  डॉक्टर ली की मौत और चीनी प्रशासन द्वारा उनके द्वारा दी गई नए प्रकार के संक्रमण से संबंधित जानकारियों को दबाने के प्रयास ने चीनी सोशल मीडिया पर वहां के लोगों द्वारा गहरे असंतोष को प्रकट किया।  संकट के दौरान ही चीनी सोशल मीडिया साइट विवो  पर #अभिव्यक्तकीस्वतंत्रता ट्रेंड हुआ जिसे बाद में सेंसर कर दिया गया। यह पूरा घटनाक्रम वूहान प्रशासन की बड़ी लापरवाही की ओर दर्शाता है।  

यह समस्या और विकट तब हो गई जब चीन सरकार का ध्यान अपनी स्वास्थ्य आपातकाल सेवा में तेजी लाने के बजाय इस पूरे घटनाक्रम की लीपापोती में लग गया. अंत में, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने आदेश दिया कि वायरस को "पूरी तरह रोकथाम" होना चाहिए। लेकिन यह सब 23 जनवरी, 2020 के बाद हुआ जब वुहान को पूरी तरह से बंद कर दिया गया। चीन में इस निर्णायक देरी के कारण संक्रमित लोगों को व्यापक रूप आवागमन की छूट रही, जिससे यह वायरस आज वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है।

इस क्रम में यह ध्यान रखना जरूरी है कि चीन ने अपने पिछले के आपातकालीन संकटों  जैसे कि 2003 का  SARS संकट., 2005 में जीलिन प्रांत में रासायनिक तरल का विस्फोट,  2008 का मिल्क (MILK) स्कैंडल इसमें लगभग 300000 लोग प्रभावित हुए थे से कुछ भी नहीं सीखा। संक्रमण को रोकने से फैलने के लिए लोगों के आवागमन और स्वास्थ्य स्क्रीनिंग जैसे जरूरी इंतजाम बहुत देरी से किए गए सीएनएन(CNN) के मुताबिक, पहला मामला सामने आने के एक महीने बाद तक उन्होंने स्क्रीनिंग के उपाय नहीं किए. अग्रणी पत्रिका नेचर (Nature) द्वारा प्रकाशित अध्ययन (17 March 2020) में उद्धृत महामारी विज्ञानियों का कहना है कि चीन की प्रतिक्रिया में एक स्पष्ट दोष था, कि “यह बहुत देर से शुरू हुआ"।

चीन ने हाल के सप्ताहों में कोरोना से निपटने में अन्य देशों के सीमित संघर्षों पर प्रकाश डाला है, ताकि महामारी के शुरुआती दिनों के लिए आलोचना  से बचा जा सके। चीनी मीडिया ने अमेरिका के "अति आत्मविश्वास" और वायरस के सम्बन्ध में "ज्ञान की कमी" पर भी प्रकाश डाला है। इस सबका उदेस्य कोरोना संकट से हो रही चीन की आलोचना को भटकाना था।

किसी भी स्वास्थ्य संकट के समय व्यवस्था में पारदर्शिता का होना अत्यंत आवश्यक लेकिन यह चीन की ‘राजनीतिक व्यवस्था में गायब थाI साथ ही साथ राजनीतिक नियंत्रण के टॉप-डाउन मॉडल ने प्रांतीय सरकारों को भी तेजी लाने से रोका सीसीटीवी (CCTV) पर एक साक्षात्कार में वुहान के मेयर झोउ जियानवांग ने बताया कि "स्थानीय सरकार के एक अधिकारी के रूप में, मुझे [सूचना] जारी करने से पहले ऊपर के निर्देशों के लिए इंतजार करना होगा।" चीन में समस्या यह है कि स्थानीय नेता अपने केंद्रीय नेतृत्व को नाराज़ नहीं करना चाहते. उनके क्षेत्र में समस्या की कोई भी खबर उनके प्रभाव और छवि को खतरे में डालती है।

अस्थिरता, सत्तावादी सरकारों को अस्थिर करती है; नागरिक अशांति और प्रेस की आलोचना उनका सबसे बड़ा दुश्मन है। चीनी की राजनितिक व्यवस्था में व्यापत विरोधाभास, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं और सख्त राजनीतिक नियंत्रण के बीच कोरोना संकट से निपटने में चीनी प्रशाशन की असर्मथा दिखीI

पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बाद चीन ने अत्यधिक राजनीतिक नियंत्रण पर जोर दिया है जो कि समय-समय पर चीनी लोगों द्वारा भी  आलोचना का शिकार हुआ. इसी की कारन है की चीन में बढ़ते कानून सुधारों & आर्थिक उदरयकरण के लोगों के अधिकारों का मुद्दा राज्य और समाज के बीच एक नई बहस बन गई है यही कारन है, की चीन की शीर्ष अदालत (SPC) ने माना कि वुहान वायरस के बारे में प्राम्भिक जानकारी को “अफवाहों” से जोड़ना एक बड़ी गलती थी

संकट के समय में तानाशाही राजनीतिक व्यवस्था और उसके नेतृत्व को किसी भी प्रकार की आलोचना से दूर रखना, गैर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का चरित्र हैI इस संकट के समय में सरकार और लोगो के बीच घटते 'सार्वजनिक विश्वास' के कारन ही चीन ने बुज़ुर्क मेडिकल एक्सपर्ट और अपने सार्स संकट के हीरो डॉ चुंग ननशान को प्रभावी किया। WHO प्रमुख द्वारा ‘चीन की प्रशंसा कर देना’और इसको चीन में प्रमुखता से छापना ‘सत्तावादी सरकारों’ में व्याप्त विश्वास ले संकट को प्रदर्शित करता है.

साथ ही ईरान और इटली में इसका तेज़ी से फैलने को कई रिपोर्ट्स चीन के 'वन बेल्ट वन रोड' द्वारा इन देशों में चीनी आवागमन से भो जोड़ रहें हैं। ज्ञात हो की इटली स्थित, लोम्बार्डी और टस्कनी सबसे अधिक चीनी निवेश वाले दो क्षेत्र हैं। ऐसी समय जब चीन अपने विकास मॉडल को दुनिया के सामने एक विकल्प के रूप में पेश कर रहा है, तब कोरोना संकट ने उनके शासन मॉडल की प्रभावशीलता और आपदा से निबटमें में उनकी कमियों के साथ साथ, एक विकसित देश और सक्षम स्वाथ्य व्यवस्था के उनके दावों को भी नुकसान पहुंचाया है.

 डा अभिषेक प्रताप सिंह
(जेएनयू से चीनी अध्ययन में पीएचडी और देशबंधु कॉलेज, डीयू में अध्यापक हैं)

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 विश्व के लिए खतरा है चीन