व्यर्थ दान (लघुकथा)




व्यर्थ दान (लघुकथा)

✍ राज शर्मा (संस्कृति संरक्षक)


दुर्गेश अपने क्षेत्रीय रियासत का सबसे बड़ा धनपति था । मज़दूरों को धनधान्य दान करता था । परन्तु ये उसका दिखावा अर्थात झूठा आडम्बर था । सिर्फ अपने अभिमान को बढ़ावा देना और अपने यश की प्रशंसा करवाने के लिए इतना सबकुछ किया करता था । 

एक दिन वह यात्रा पर गया । सन्ध्या के समय में जब वह वापिस अपनी हवेली की ओर आ रहा था तो उसके वाहन का पहिया खराब हो गया । रात्रि होने को कुछ ही पल शेष बचे हुए थे । अब इस स्याह में जाए तो कहां जाए । दूर पहाड़ी के आंगन में जलते हुए चूल्हे के मन्द प्रकाश से यह आभास किया कि शायद कोई रहता होगा । दुर्गेश सेठ उसी ओर चल दिया । रात्रि को जब हीरा मज़दूर भोजन परोसा रहा था तो सेठ को भोजन कुछ खास पसन्द नहीं आया ,,,,,,,,आखिर पूछ ही बैठा ,,,,,हीरा,,तुम ऐसा भोजन प्रतिदिन खाते हो क्या ? हीरा ने कहा  ! जी मालिक ....................यह सब आपका ही दिया हुआ है हम सब यही भक्षण करते हैं । तब सेठ दुर्गेश को आभास हुआ कि मैंने जो कुछ भी दान द्रव्य आज तक वितरण किया वह सब व्यर्थ हो गया ।

शिक्षा: आडम्बर और अभिमान से अगर आप करोड़ो सवर्ण मुद्राओं को भी दान में दे दे तो उसका कोई भी फल नहीं मिलता । यह लोक में जो भी आप दान करते हो वह संचित कर्मानुसार परलोक में व्याज सहित भोगना पड़ेगा चाहे वो पुण्य कर्म हो जय पाप कर्म ।इसलिए सावधान होकर कर्म करते रहो ।


राज शर्मा (संस्कृति संरक्षक)
आनी कुल्लू हिमाचल प्रदेश
Mob- 9817819789

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