अंधविश्वास (लघुकथा)




अंधविश्वास (लघुकथा)

आलोक कौशिक 

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत हो रही थी। पिछले दस दिनों में पंद्रह लोगों की जानें जा चुकी थीं। पूरे गांव में दहशत का माहौल था। 

"कोई नहीं बचेगा इस गांव में। अगले महीने तक सब मर जाएंगे। इस गांव को उस फ़क़ीर की बद्दुआ लग गई है, जिसके साथ दीपक ने गाली-गलौज और हाथापाई किया था। अगर उस दिन दीपक उस फ़क़ीर के मांगने पर बिना हुज्जत किए उसे पांच सौ रुपये दे देता तो आज दीपक हमारे बीच ज़िंदा होता। खुद तो मरा ही, पूरे गांव के सर्वनाश का आगाज़ भी कर गया। मैं तो कहता हूं उस फ़क़ीर को ढूंढो और सारे गांव वाले मिलकर उससे माफ़ी मांग लो। वह फ़क़ीर ही हमें इस क़हर से बचा सकता है।" बबलू ने अपना डर प्रकट करते हुए गांव वालों से कहा।

"पागल मत बनो बबलू! गांव वालों की मौत किसी फ़क़ीर की बद्दुआ के कारण नहीं बल्कि विषाणु जनित वैश्विक महामारी कोरोना के कारण हो रही है। मैंने पहले भी समझाया था, एक बार फिर समझा रहा हूं अगर ज़िंदा रहना है तो अपने-अपने घरों में रहो। जब तक बहुत ज़रूरी ना हो तब तक घर से मत निकलो। हमेशा मास्क लगा कर रखो। सैनिटाइजर का प्रयोग करो। साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दो। सरकार एवं स्वास्थ्य विभाग के निर्देशों का पालन करो। फिर देखना किसी को कुछ नहीं होगा।" मास्टर दीनानाथ ने बबलू को समझाते हुए गांव वालों से कहा। 

बबलू और उसके कुछ दोस्तों को छोड़कर बाक़ी गांव वाले मास्टर दीनानाथ की बातों से सहमत थे। बबलू और उसके दोस्त पहले की भांति इधर-उधर घूमते रहे, जबकि बाकी गांव वालों ने मास्टर दीनानाथ की बातों पर अमल करते हुए बबलू और उसके दोस्तों से दूरी बना ली। 

तीन महीने पश्चात, बबलू और उसके दोस्तों को छोड़कर बाकी सभी गांव वाले जीवित और स्वस्थ थे।  

संक्षिप्त परिचय:-

 आलोक कौशिक
शिक्षा- स्नातकोत्तर (अंग्रेजी साहित्य)
पेशा- पत्रकारिता एवं स्वतंत्र लेखन
साहित्यिक कृतियां- प्रमुख राष्ट्रीय समाचारपत्रों एवं साहित्यिक पत्रिकाओं में सैकड़ों रचनाएं प्रकाशित
पता:- मनीषा मैन्शन, जिला- बेगूसराय, राज्य- बिहार, 851101,
अणुडाक- devraajkaushik1989@gmail.com
चलभाष संख्या- 8292043472

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