कृषि मे आत्मनिर्भरता की असीम शक्ति मौजूद है।



कृषि मे आत्मनिर्भरता की असीम शक्ति मौजूद है।

धर्मवीर पाढ़ा

कोरोना वायरस संकट और विश्व व्यापी लाकडाऊन ने दुनियां को विशेषकर भारत को चेताने और आईना दिखाने का काम किया है बशर्ते कोई सत्ताधीश वर्ग चकाचौंधपूर्ण अहंकार का पर्दा उतार कर विचार करे ।

पिछले चार दशकों से अपनाई जा रही भारत की अर्थनीति के दुष्परिणाम सामने आ चुके हैं।किसानकारीगर और जमीनी स्तर के कारोबारी की कीमत पर बड़े कारपोरेट घरानों को बढ़ावा देने के कारण देश के सामने विकराल स्थिति खड़ी हो गयी है। 

आज बढती बेरोजगारीआर्थिक असमानताजनसंख्या का गांव की ओर से कृषि छोड़ कर शहरों मे नौकरी के लिये पलायन और अब घर वापसी के लिये तड़पपारम्परिक कुटीर और लघु उद्योगों  का खातमा और उनके स्थान पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का एकाधिकार होना और उस एकाधिकार के कारण हुई बेरोजगारी और भुखमरी सबके सामने है। 
  
अगर स्थानीय ग्राम इकाई स्तर पर कृषि, और सहायक कुटीर एवं लघु उद्योगों को नही उजाड़ा गया होता तो यह जनसंख्या के असंतुलित पलायनबेरोजगारी, भुखमरी और जर्जर होती अर्थव्यवस्था का मुंह नही देखना पड़ता। 
  
अब समय आ गया है कि भारत सरकार को बड़े कारपोरेट घरानों के दबाव से मुक्ति पाकर गांवब्लाकजिला को इकाई आधार बनाकर उसको कृषि और उसकी सहायक आर्थिक तंत्र और संघटकों को मजबूत करके आत्मनिर्भर बनाना होगा जिससे आम व्यक्ति की क्रय शक्ति बढेगी और अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। 
          
केवल तकनीकी आदान प्रदान छोड़ कर विदेशों के मुंह की ओर देखना बंद होगा। पुनः "उत्तम खेती" के फार्मुले पर आर्थिक नीति लागू करनी होगी। कृषि मे आत्मनिर्भरता की असीम शक्ति मौजूद है। भारत और मानवता को केवल मात्र कृषि बचा सकती है।

धर्मवीर पाढ़ा

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