तेरे होने से ही यह घर, घर लगता है।


तेरे होने से ही यह घर, घर लगता है।

तेरे होने से ही यह घर, घर लगता है।




तेरी भुजाओं से 
बनती है चारदीवारी
तेरी वाणी से बजती हैं घंटियां
पूजित हो जाते हैं देवी-देवता
इन भृकुटियों के इशारे समझते हैं
खिड़की, दरवाजे, कुर्सियां



तेरी चूडि़यों की खनखनाहट पर
हँसती है गौरेया
तेरे बीमार होने से
मुरझा जाते हैं गमलों के फूल
हरे धनिये की तरह
कुम्हला जाते हैं चेहरे



तेरी अनुपस्थिति से
चाकू काट देता है उंगलियां
आग निर्विघ्न होकर
जलाने लगती है सब्जियां
कूड़ा, कपड़ा, कड़छुल
कर देते हैं हड़ताल
थम जाता है कीचन का आर्केस्ट्रा


यह जीवन, यह आयत
नश्वर लगता है
लड़की...!
तेरे होने से ही
यह घर
घर लगता है।




कवि - शाक्त ध्यानी
देहरादून 
(महिला-दिवस पर विशेष)



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