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स्वयंसेवक और समाजिक समरसता

स्वयंसेवक और समाजिक समरसता



स्वयंसेवक और समाजिक समरसता

 ✍️ हितेन्द्र शर्मा
मायूस होने की जरूरत नहीं, वक्त कभी एक सा नहीं रहता, यह सुनते ही अपने घनिष्ठ मित्रों की गंभीर चर्चा में शामिल होने के उद्देश्य से मैंने उत्सुकतावश पूछ ही लिया कि आखिर क्या मामला है? आज भारद्वाज बेहद दुविधा की स्थिति में और काफी मायूस नजर आ रहा था। चाय की चुस्कियों के साथ मित्रों ने बताया कि खेतों में सिंचाई के लिए हमारे मित्र भारद्वाज आजकल कुल्ह (नहर) निर्माण का कार्य कर रहे हैं। पानी की कुल्ह को पक्का करने का काम अभी चल ही रहा था कि इसमें प्रयोग होने वाले कुछ लकड़ी के फट्टो को किसी ने जला दिया, इसलिए यह चिंतित हैं। आखिर गांव की भलाई में प्रयोग हो रहें लकड़ी के फट्टे कोई, क्यों जलाने लगा? यह प्रश्न मन-मस्तिष्क में उठ ही रहे थे कि अचानक से भारद्वाज बोल पड़ा, चलो छोड़ो जो हुआ सो हुआ शायद यह उनसे अनजाने में हो गया होगा।
अब हम समझ चुके थे कि हमेशा कि तरह आज भी भारद्वाज किसी की गलती पर पर्दा डालने का प्रयास कर रहा हैं। इस कुल्ह से कुछ दूरी पर स्थानीय लोगों के घर एंव जमीन है। गांवों में अक्सर जमीनों की सीमाओं को परिस्थितियों, व्यक्तियों और अवसरों के हिसाब से आगे-पीछे करना साधारण बात है। नवनिर्मित कुल्ह तक जमीनों की सीमाओं को बढाने के उद्देश्य से साथ लगती जमीन की झाड़ियां को काटते एंव जलाते हुए कुछ लोग काफी दिनों से धीरे-धीरे से आगे बढ़ रहे थे। शायद इस दौरान ही आग भड़क उठी और लकड़ी के फट्टे भी जल गए होंगे। आश्चर्यजनक कि आग लगाने वालों के विषय में पूरी जानकारी होने के बावजूद भी भारद्वाज उनपर किसी भी प्रकार की कोई भी कार्रवाई नहीं करना चाहता था।
वह बार-बार दोहराते हुए कह रहा था कि शायद यह सब अनजाने में हो गया, जो बीत गई सो बात गई। जातिगत भेदभाव को दूर करने एंव सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए भारद्वाज एक स्वयंसेवक के रूप में काफी समय से जमीनी स्तर पर कार्य कर रहा है। अनुसूचित जाति बाहुल्य गांव होने के कारण ही भारद्वाज एकदम खामोश रहा, क्योंकि वह अपने लक्ष्य से भटकना नहीं चाहता था। हमारी नजरों में उसके लिए सम्मान बहुत बढ़ गया, यह मेरे जीवन का एक रोचक अनुभव रहा। लेकिन बेरोजगार भारद्वाज की चिंता का कारण, लकड़ी के वह फट्टे थे जो उसने ने गांव के कुछ घरों से मांगकर एकत्रित किए थे।
अब उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह लोगों के फट्टे कैसे लौटाएगा, क्योंकि फट्टे तो जल चुके हैं।मित्रों ने सुझाव देते हुए कहा कि क्यों न आग लगाने वाले दूसरे पक्ष के साथ बैठकर प्रेमपूर्वक एकबार बातचीत करें, सभी नौकरीपेशा लोग है शायद आपकी समस्या का कोई हल निकले। दूसरे पक्ष को सूचित कर अगले दिन हम निर्धारित समय पर कुल्ह के पास पहुंचे, प्रत्यक्ष रूप से नुकसान देखने के बाद मन काफी आहत हुआ। लेकिन हम निशब्द थे क्योंकि बातचीत के लिए सामने से सिर्फ एक महिला और दो युवा स्कूली बच्चे ही प्रस्तुत हुए। फोन आने के कारण बातचीत करते हुए मैं थोड़ा दूर निकला और खेत में एक ओर जाकर बैठ गया। नजर घुमाकर देखा तो उन युवा लडकों की अजीबोगरीब हरकतों की तरफ ध्यान आकर्षित हुआ। सुनियोजित ढंग एंव चतुराई के साथ वह छिपते-छिपाते अपने-अपने मोबाइल फोन से भारद्वाज की विडियों बनाने में व्यस्त थे।
सरल स्वभाव के भारद्वाज बहनजी और बेटा बोलकर उन्हें सम्बोधित करते हुए चर्चा कर रहे थे। उनके मर्यादित व्यवहार के कारण लगभग दस-बीस मिनट से विडियों बनाने वाले यह युवा कैमरामैन बुरी तरह हताश हो चूके थे क्योंकि गुप्त रूप से हो रही इस शूटिंग के दौरान तल्ख बातों एंव अभद्रता के साथ भारद्वाज को उकसाने के अनेकों प्रयास भी जारी रहे लेकिन वह शांतिपूर्ण ढंग से हाथ जोड़कर ही बातचीत कर रहा था। प्रत्यक्षदर्शी होने के कारण अब मुझे स्पष्ट रूप से समझ आ रहा था। दूसरा पक्ष अपनी गलती स्वीकारने एंव सुधारने की जगह षड्यंत्र पूर्वक विडियों बनाकर कानून का दुरुपयोग करने के लिए सबूत एकत्रित करना चाह रहा था जोकि वर्तमान समय का एक कटु सत्य भी है।
कहते हैं कि जिंदगी एक रंगमंच है और हम लोग इस रंगमंच के कलाकार, सभी लोग जीवन को अपने-अपने नजरिये से देखते है। मेरे चेहरे पर हजारों प्रश्नों के साथ अब हल्की सी राहत भरी मुस्कान थी। क्योंकि गुप्त रूप से बन रही इस फिल्म में खलनायक नहीं था। मर्यादित, सरल एंव सकारात्मक स्वभाव के भारद्वाज के समक्ष सभी साजिशें विफल होती जा रही थी। सलाम ऐसे स्वयंसेवकों को जो मर्यादा में रहकर सैकड़ों कठिनाईयों को सहन करने के बावजूद भी हमारे देश एंव समाजिक समरसता के लिए निष्ठापूर्वक कार्य कर रहे हैं।

✍️ हितेन्द्र शर्मा
गांव व डाकघर किंगल
तहसील कुमारसैन, जिला शिमला, हि.प्र.
सम्पर्क सूत्र – 94180-97815
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