आरएसएस का दलित चिंतन


आरएसएस का दलित चिंतन

-सुभाष चंद्र-

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जो गहराई से जानते समझते हैं, वे इस नाम के पीछे छिपी सामाजिक एकता और देशहित की अवधारणा से भली भांति परिचित हैं। लेकिन समस्या ऐसे लोगों से है, जो संघ को न जानते हैं न समझते है और जो जानते हैं, वे राजनैतिक कारणों से उस पर विभिन्न प्रकार के आक्षेप लगाते हैं। संघ के अखण्ड और मजबूत भारत की मुहीम को दलित-विरोधी कहना इतिहास के प्रति बौद्धकों की कम समझ को दर्शाता है। पिछले कुछ सालों के दौरान दलितों पर छिटपुट हमलों और सुप्रीम कोर्ट के एससीएसटी एक्ट के तहत केस में तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा देने से, विपक्षी दलों और सियासी समीक्षक मिल-जुलकर एक बेयकीनी नतीजे पर पहुंचने का एलान कर रहे है।

हालाँकि इन सभी घटनाओं का संघ से न तो र्कोइ  संबंध रहा है, न ही उसका ऐसी घटनाओं के प्रति कोई प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष समर्थन रहा है। ऐसे में संघ को दलित-विरोधी कहना तथाकथित बुद्धिजीवियों की कम समझ का परिचायक है। इन सब के पास अपने दावों को सही साबित करने के लिए जो तर्क हैं,उनका कोई  आधार नहीं है। सिवाये दलितों के खिलाफ हिंसा और सुप्रीम कोर्ट के ब्यान के जिन्हे ये तोड़ मरोड़ कर मीडिया और जनता के सामने पेश कर रहे हैं।

एक बार राहुल गांधी ने निजी तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दलित विरोधी करार दिया था। इसके लिए राहुल ने अजीबो-गरीब तर्क दिया। राहुल ने कहा कि बीजेपी के सांसद ही मोदी को दलित विरोधी कहकर चिट्ठी लिख रहे हैं। सियासी फायदे के लिए विपक्ष का मोदी, बीजेपी और संघ पर कोई भी आरोप लगाना ठीक है। लेकिन जिस तरह से राजनीतिक विश्लेषक इस आरोप के समर्थन में कूद पड़े हैं। उससे लगता है कि अपनी राजनितिक रोटियां सेकने के लिए आरएसएस की छवि खराब करने की कोशिश है। जब मोदी अपनी पार्टी के नेताओं को दलितों के घर में रात गुजारने को कहते हैं तो ये सियासी पंडित इसे चुनावी चाल कहकर खारिज कर देते हैं। बयान और निचोड़ से साफ होता है कि इन लोगों को संघ के हिंदू एकता के मिशन की समझ ही नहीं है, ऐसे लोगों के लिए जरूरी है कि वो संघ के अतीत के सफर में झांके, संघ के बारे में छपी पहली किताब, 1951 की ‘मिलिटेंट हिंदुइज्म इन इंडियन पॉलिटिक्सः ए स्टडी ऑफ आरएसएस‘ में लेखक जे.ए. कुरन ने संघ के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार और दलित नेता डॉक्टर बी.आर अंबेडकर के बीच 1936 में हुई दिलचस्प बातचीत का जिक्र किया है।

कुरन ने लिखा है कि, ‘जब 1936 में मशहूर दलित नेता और कानून मंत्री डॉक्टर अंबेडकर ने मकर संक्रांति पर आयोजित संघ के कार्यक्रम की अध्यक्षता की, तो अंबेडकर ने कार्यक्र म में मौजूद संघ के प्रमुख डॉक्टर हेडगेवार से पूछा कि क्या संघ के सभी सदस्य ब्राह्मण हैं? डॉक्टर हेडगेवार ने इसके जवाब में डॉक्टर अंबेडकर से कहा कि “जब संघ के स्वयंसेवक नए सदस्यों की भर्ती के लिए संघ की विचारधारा का प्रचार करते हैं, तो वो सभी ब्राह्मण हैं. जब वो रोजाना की व्यायाम करते हैं, तो वो क्षत्रिय यानी योद्धा हैं. जब वो संघ के लिए पैसे के लेन-देन का काम करते हैं, तो वो वैश्य हैं. और जब वो संघ की शाखाओं मे साफ-सफाई का काम करते हैं तो वो शूद्र हैं”-केशव बलिराम हेडगेवार।

दूसरे शब्दों में डॉक्टर हेडगेवार ने ये बताया कि हिंदू समाज में जिन चार वर्णों का जिक्र है, संघ उनके बीच की दीवार ढहाने का काम कर रहा है, संघ का मकसद ये बताना है कि जाति का कोई मतलब नहीं। असल में डॉक्टर हेडगेवार ये बताना चाह रहे थे कि जाति का मतलब व्यवसाय से है. हर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र एक हिंदू है. हर हिंदू ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हो सकता है. वो जो काम करता है, उससे उसका वर्ण तय होता है। कुरन का ये दस्तावेज काफी रिसर्च के बाद उस वक्त तैयार किया गया था, जब संघ अपने शुरुआती दौर से गुजर रहा था। इसकी विचारधारा की बुनियाद रखी जा रही थी। कुरन ने साफ लिखा है कि संघ के सभी कार्यक्रमों में समाज के हर तबके को जोड़ने की कोशिश हो रही थी, ताकि हिंदुओं को एकजुट किया जा सके, आरएसस के हिंदू एकता के इस प्रोजेक्ट में शुरुआत से ही दलितों का अहम रोल था, शुरुआती दौर में संघ ने मध्य प्रदेश, पंजाब, और उत्तर प्रदेश के दलित युवाओं को अपनी ओर आकर्षित किया था 

इसकी बड़ी वजह यही थी कि संघ में जाति के नाम पर भेदभाव नहीं होता था। यही नहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हमेशा महृर्षि वाल्मीकि सहित अन्य महापुरुषों को सिर आँखों पर बैठाया और उनके अवतरण दिवस पर बौद्धिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। इस दौरान संघ की शाखाओं पर खीर प्रसाद वितरण होता है और वर्षों से ये आयोजन बिना प्रेस विज्ञप्ति के बिना प्रचार प्रसार के होते रहे हैं। महृर्षि वाल्मीकि जी रामायण के रचियता हैं जो हिन्दू जीवन शैली और मान्यताओं का मुख्य आधार है। लेकिन बामसेफ व अन्य वामपंथी संगठन रामायण को काल्पनिक बताते है जो उनकी दोहरी मानसिकता का परिचायक है। अगर इसके बाद भी वे भारतीय अनुसूचित समाज से समर्थन की उम्मीद रखते हैं तो ये उनकी बड़ी भूल है।

जब अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाए जाने के एक साल बाद विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या की हनुमान गढ़ी में सभा की थी, तो उसके मंच पर हिंदू देवी-देवताओं के साथ डॉक्टर अंबेडकर की भी तस्वीर लगाई गई थी, ये बिना कारण नहीं था। संघ ने हमेशा से ही अंबेडकर को प्रमुख दलित नेता और दलित उत्थान के प्रतीक के तौर पर अहमियत दी, संघ की शाखाओं में हर सुबह होने वाली प्रार्थना में अंबेडकर के योगदान का जिक्र किया जाता है। यही वजह थी कि विश्व हिंदू परिषद के उस वक्त के अध्यक्ष अशोक सिंघल की अगुवाई में तमाम नेता वाराणसी में अंतिम संस्कार कराने वाले डोम राजा के घर गए थे। हिंदुओं को एकजुट करने के अपने मिशन के दौरान आरएसएस ने भारतीय समाज की जाति व्यवस्था की चुनौती से अपने तरीके से निपटने की कोशिश की है, ब्राह्मणवादी संगठन होने का ठप्पा झेलने के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि संघ ने पिछड़े और दलित वर्गों के बीच पैठ बनाने की लगातार कोशिश की है और इसमें कामयाब भी हुए हैं।

हम बीजेपी के पहले के सियासी अवतार जनसंघ से लेकर आज की बीजेपी के दौर की मिसाल ले सकते हैं। जनसंघ को सामाजिक रूप से ऊंचे तबके के लोगों की पार्टी कहा जा सकता था. जनसंघ में खास तौर से ब्राह्मणों और बनियों का वर्चस्व था, लेकिन आज की तारीख में बीजेपी में ओबीसी नेताओं की तादाद बहुत ज्यादा है. इनमें खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हैं, जो संघ की विचारधारा के कट्टर अनुयायी हैं। इसके अलावा राष्टंपति रामनाथ कोविंद, कल्याण सिंह, बंगारू लक्ष्मण जैसे अनेक नाम है जो संघ के खिलाफ दलितों को भड़काने वाले कथित दलित नेताओं के मुंह पर करारा वार करते हैं।


लेखक 

सुभाष चंद्र
दलित चिंतक एवं कार्यकारी वाईस चेयरमैन,
स्वच्छ भारत मिशन, हरियाणा सरकार।

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1 Comments

  1. सत्योक्ति है यह। समय आएगा जब सम्पूर्ण दलित समाज भी इन लोगों षड्यंत्र को समझ लेगा।

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