आईने की भाषा के जादूगर - डॉ. उत्तमदास

आईने की भाषा के जादूगर - डॉ. उत्तमदास
आईने की भाषा के जादूगर - डॉ. उत्तमदास


✍ ललित गर्ग

दुनिया एक किताब है और हर राह एक सबक। हर सबक बांचता है संकेत जीवन के, आनन्द के, सौहार्द के एवं उत्सव के। जमीन-आसमान, जंगल-मैदान, नदियां - झीलें और सागर, धर्म और साहित्य, भाषा और विचार दुनिया की बेहतरीन प्रेरणाएं हैं, सबक हंै जिनसे जीवन आगे बढ़ता है। आईने की भाषा यानी दर्पण की लिपि भी एक हूनर है, एक प्रेरणा है, इस हूनर के जादूगर डाॅ. उत्तमदास ने इसका प्रयोग विभिन्न धर्मग्रंथों को दर्पण लिपि में लिखकर विश्व रिकार्ड कायम किया है और वे युवापीढ़ी के मन में धर्मग्रंथों के प्रति आकर्षण पैदा कर साम्प्रदायिक सौहार्द एवं सद्भावना का वातावरण बना रहे हैं। दर्पण भाषा शब्द और भाषा को उल्टा लिखने की कला है जिसे हम दर्पण या किसी अन्य परावर्तक सतह की सहायता से पढ़ सकते हैं। सचमुच यह पढ़ने व लिखने की मौलिक एवं नवीनतम विद्या कला और साहित्य के क्षेत्र में एक नया आयाम है। इससे पढ़ने वाले व्यक्ति का आई.क्यू. विकसित होता है, वह अधिक चैकस और तेज अनुभव करता है। यह भाषा का प्रारूप सुरक्षा और गोपनीयता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

डाॅ. दास ने इस अनोखी विद्या में प्रारंभ में प्रमुख धर्मों के पवित्र ग्रंथों को लिखने का बीड़ा उठाया है। निश्चित ही उससे सांप्रदायिक सद्भाव और धार्मिक अखंडता का परिवेश निर्मित होगा। बेहतर करने की भावना को लेकर डाॅ. दास अपनी संस्कृति, अपनी मौलिक सृजन क्षमता और माटी की गंध को एक नई पहचान देने के लिए तत्पर हंै। वे चाहते हैं कि उनके इस दर्पण की भाषा के कारण ही सही पर आज के युवाओं के मन में अपने धर्मग्रंथों को लेकर एक सकारात्मक विचार जन्म लें, जिससे देश व दुनिया में शांति और सद्भावना का संचार हो। लोग धर्मग्रंथों के मूल्य को समझे और इन्हें अपनाकर मनुष्य के रूप में ईश्वर की इस खूबसूरत धरा को और भी सुंदर बनाने को संकल्पबद्ध हो और अपने इसी ध्येय को मन में बसाये श्री दास बाइबल को दर्पण की भाषा में लिपिबद्ध कर दिया, जिसका राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ के प्रांगण में मेरे एवं विद्वान लेखक डॉ. विनोद बब्बर के द्वारा ’लोकतंत्र की बुनियाद’ पत्रिका के बैनर तले लोकार्पण गतदिनों हुआ। सदा मुस्कुराते रहने वाले डॉ. दास को पूरी उम्मीद है कि उनका यह प्रयास एक दिन जरूर रंग लायेगा और वे अपनी इजाद की हुई इस नई भाषा लिपि से दुनिया में शांति का संदेश संप्रेषित करने में कामयाब होंगे। अब वे अरबी भाषा में कुरान को एवं हिन्दी भाषा में भागवत गीता को लिपिबद्ध करने में व्यस्त हैं। 2015 में ब्रिटेन के ‘वल्र्ड रेकार्ड यूनिवर्सिटी’ से अपनी कृतियों के लिए डाॅक्टरेट की मानद उपाधि लेकर स्वदेश लौटे श्री उत्तम दास पहले से कहीं अधिक ऊर्जा के साथ विभिन्न धर्मग्रंथों को दर्पण लिपि में लिखने में व्यस्त हैं।

जन्म से हिन्दू डाॅ. उत्तम दास भी अन्य सनातन धर्मियों की तरह ही धर्मनिरपेक्षता और सर्वधर्म पर विश्वास रखते हैं। वे एक सच्चे हिन्दू की तरह देश में विभिन्न धर्मों के बीच सद्भावना चाहते हैं। उनकी एकांत इच्छा है कि देश से सारे विभेद मिट जाए और चहुंओर बस शांति और प्रेम हो। धुन के पक्के श्री दास ने अपने इस सोच को मनरूपी बोतल से आजाद करने की सोची और उन्होंने दर्पण की भाषा में लिखे अपने बाइबिल ग्रंथ को अर्कबिशप के माध्यम से सोलहवें पाॅप बेनेटिक को उपहार स्वरूप भेजा था। उन्होंने ये उपहार पाॅप को सिर्फ अपनी ओर से नहीं अपितु अपने देश की ओर से भेंट की और उन्हें भारत की ओर से विश्वशांति और सद्भावना का संदेश दिया।

श्री दास द्वारा आईने की भाषा में लिखे इस बाइबिल ने प्रकाशित होते ही पूरे विश्व में खलबली मचा दी। असम के एक आम व्यक्ति द्वारा किये गये एक छोटे से प्रयास ने उन्हें रातोंरात अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की नजर में हीरो बना दिया। विश्व के कई बड़े अखबारों ने उन्हें हेडलाइंस बना दिया। फिर क्या था, उसके बाद कई रेकार्ड सहेजने वाले रेकार्ड बुक्स ने श्री दास से संपर्क साधा और आज उनका नाम लिमका बुक आॅफ रेकाडर््स, इंडिया बुक आॅफ रेकाडर््स, एशिया बुक आॅफ रेकार्डस, वल्र्ड रेकार्डस इंडिया, रेकार्ड हाॅल्डर्स रिपब्लिक, यूनिक वल्र्ड रेकार्डस, एवरेस्ट वल्र्ड रेकार्डस, मिरेकल्स वल्र्ड रेकार्डस, गोल्डन बुक ऑफ रेकार्डस जैसे कई महत्वपूर्ण विश्व रेकार्ड बुक्सों में दर्ज हैं।

अपनी हुनर से सद्भावना का संदेश बिखेरने वाले इस कलाकार को तो कुछ और ही करना था सो उन्होंने असम के प्रख्यात संत श्रीमंत माधवदेव द्वारा लिखे पवित्र नामघोषा को भी अपने हुनर से आइने की भाषा में लिपिबद्ध करने में जुट गए। फिर उन्होंने रूख किया अजर अमर व सदा नमस्य भागवत गीता की ओर उन्होंने अपने अनोखे अंदाज में भागवत गीता को भी दर्पण में की भाषा में लिख डाला। अनेक टीवी कार्यक्रमों सहित जीटीवी के खास कार्यक्रम शाबाश इंडिया के मेहमान रहे डाॅ. दास का समाज में क्रांति पैदा करने का दृढ़ संकल्प समय-समय पर मुखरित होता रहता है। यह क्रांत हूनर उनके क्रांत व्यक्तित्व का द्योतक ही नहीं, वरन् धार्मिक, सामाजिक विकृतियों एवं अंधरूढ़ियों पर तीव्र कटाक्ष एवं परिवर्तन की प्रेरणा भी है।

जीवन में सत्यं, शिवं और सुंदरं की स्थापना के लिए सत्साहित्य की आवश्यकता होती है। यद्यपि यह सत्य है कि साहित्य का उद्देश्य या संप्रेषण भिन्न-भिन्न लेखकों का भिन्न-भिन्न तरीकों से होता है किन्तु जब-जब साहित्य अपने मूल उद्देश्य से हटकर केवल व्यावसायिक या मनोरंजन का साधन बन जाता है, तब-तब उसका सौंदर्यपूरित शरीर क्षत-विक्षत हो जाता है। साहित्य मानसिक खाद्य होता है अतः वह सोद्देश्य होना चाहिए।

डाॅ. उत्तमदास ने भौतिक वातावरण में अध्यात्म की लौ जलाकर उसे तेजस्वी बनाने का भगीरथ प्रयत्न किया है। उनकी दृष्टि में अपने लिए अपने द्वारा अपना नियंत्रण अध्यात्म है। वे अध्यात्म साधना को परलोक से न जोड़कर वर्तमान जीवन से जोड़ने की बात कहते हैं। अध्यात्म का फलित उनके शब्दों में यों उद्गीर्ण है-अध्यात्म केवल मुक्ति का पथ ही नहीं, वह शांति का मार्ग है, जीवन जीने की कला है, जागरण की दिशा है और रूपांतरण की सजीव प्रक्रिया है। कहा जा सकता है कि डाॅ. उत्तमदास ऐसे सृजनधर्मा, प्रयोगधर्मा दर्पणलिपि के साहित्यकार हैं जिन्होंने प्राचीन मूल्यों को नए परिधान में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है।

साहित्यकार किसी भी देश या समाज का निर्माता होता है। वह समाज और देश को वैचारिक पृष्ठभूमि देता है, जिसके आधार पर नया दर्शन विकसित होता है। वह शब्द शिल्पी ही साहित्यकार कहलाने का गौरव प्राप्त करता है, जिसके शब्द मानवजाति के हृदय को स्पंदित करते रहते हैं और डाॅ. दास कुछ अनूठे एवं विलक्षण अंदाज में मानव को स्पंदित ही नहीं प्रेरित भी कर रहे हैं। पाश्चात्य विद्वान साहित्यकार को सामान्य मनुष्य के कुछ भिन्न कोटि का प्राणी मानते हैं। वे सच्चे साहित्यकार में अलौकिक गुण स्वीकार करते हैं जिससे वह स्वयं को विस्मृत कर मस्तिष्क में बुने गये ताने-बाने को कागज पर अंकित कर देता है। युगीन चेतना की जितनी गहरी एवं व्यापक अनुभूति साहित्यकार को होती है, उतनी अन्य किसी को नहीं होती। अतः अनुभूति एवं संवेदना साहित्यकार की तीसरी आंख होती है। इसके अभाव में कोई भी व्यक्ति दर्पण भाषा में साहित्य-सृजन में प्रवृत्त नहीं हो सकता क्योंकि यह केवल कल्पना नहीं बल्कि एकाग्रता के बल पर ही संभव है।


लेखक
✍ ललित गर्ग
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फोनः 22727486, 9811051133

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