कोरोना वायरस के चलते भारत के लिए चुनौतियों के साथ अवसर भी।

कोरोना वायरस के चलते भारत के लिए चुनौतियों के साथ अवसर भी।


कोरोना वायरस के चलते भारत के लिए चुनौतियों के साथ अवसर भी।

(लिमटी खरे)

कोरोना वायरस का कहर तेजी से बढ़ता ही जा रहा है। दुनिया के अनेक देशों को इस वायरस ने अपनी चपेट में ले लिया है। इस वायरस की उत्पत्ति चीन के वुहान प्रांत को माना जा रहा है। इस वायरस अर्थात कोविट 19 ने चीन सहित वैश्विक अर्थव्यवस्था को चरमरा कर रख दिया है। चायना से माल निर्यात लगभग बंद है तो चीन में आयात होने वाली कुछ चीजों पर वहां की सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है। ऐसा उसके द्वारा फोर्स मेजर का प्रयोग करते हुए किया है। चीन के चायना नेशनल ऑफ शोर आईल कार्पोरेशन के द्वारा एलएनजी अर्थात तरल प्राकृतिक गैस के आयास से इंकार कर दिया गया है। उसके द्वारा इसके लिए कोरोना वायरस के कारण उपजी परिस्थितियों को जिम्मेदार बताया है। चीन के द्वारा फोर्स मेजर का प्रयोग करते हुए लगभग तीन हजार से ज्यादा निर्यातकों को पत्र भेजकर उनके साथ हुए अनुबंधों को निरस्त करने की बात कही है।
कोरोना वायरस ने दिसंबर से फरवरी तक जमकर कहर बरपाया है। माना जा रहा है कि जब तक गर्मी तेज नहीं होती तब तक इस वायरस का प्रकोप इसी तरह रह सकता है। यह राहत की बात मानी जा सकती है कि भारत में गर्मी का मौसम आने को है और गर्मी के मौसम में इस वायरस की मार शिथिल पड़ सकती है। इस वायरस ने वैश्विक अर्थ व्यवस्था को हिला कर रख दिया है। चीन को सस्ते माल के उत्पादन का बड़ा हब माना जाता है। चीन से सामान अन्य देशों में नहीं जाने के कारण अब कीमतों में उछाल भी दर्ज किया जा रहा है।
उधर, चीन के द्वारा एलएनजी की खेप लेने से इंकार किए जाने के बाद परिस्थितियां काफी हद तक बिगड़ने की संभावना है। आने वाले समय में चीन और भी सामान को फोर्स मेजर के तहत लेने से इंकार कर सकता है। चीन का यह कदम अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारने में महती भूमिका निभा सकता है।
देखा जाए तो फोर्स मेजर का शाब्दिक अर्थ होता है उच्च शक्ति पर यहां इसका तातपर्य इस बात से लगाया जा रहा है कि किसी अप्रत्याशित घटना से उतपन्न हुई परिस्थितियों के संदर्भ में लगाया जा रह है जिसको काबू करना किसी भी पक्ष के हाथ में न रह गया हो। कोरोना वायरस की मार झेल रहे चीन के द्वारा फोर्स मेजर के प्रमाण पत्र लगातार ही जारी किए जा रहे हैं। चीन के द्वारा आटो पार्टस और इलेक्ट्रानिक सामान के आयात के आर्डर भी निरस्त किए गए हैं।
चीन के द्वारा जिस तेज गति से अनुबंध निरस्त किए जा रहे हैं, यह उदहारण विश्व व्यापार में संभवतः पहली ही घटना के रूप में सामने आ रहा है। इससे व्यापारियों या देशों के बीच विवाद की स्थितियां भी पैदा हो सकती हैं। जब भी दो देशों के बीच व्यापारिक समझौते होते हैं तो उसमें मध्यस्थ बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चीन की अदालतों के द्वारा वहां के व्यापारियों के प्रति सहानभूति का रवैया अपनाया जा रहा है जिससे वैश्विक स्तर पर व्यापार जगत की पेशानी पर पसीने की बूंदें भी छलकती दिख रही हैं। कोरोना वायरस अर्थात कोविड 19 की वजह से अब तक लगभग 50 अरब डालर के व्यापारिक नुकसान का आंकलन किया गया है, अब फोर्स मेजर के तहत अनुबंध समाप्त किए जाने से यह आंकड़ा कई गुना बढ़ भी सकता है।
कोविट 19 का असर चीन के अलावा ईरान, इटली, दक्षिण कोरिया में भी ज्यादा देखा जा रहा है। देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन अब अपने शीर्ष पर है। आने वाले समय में गंभीर बीमारियों, तरह तरह के वायरस आदि की उत्पत्ति आम बात हो चुकी है। इन परिस्थितियों में कब किस देश को कौन सा वायरस अपनी चपेट में ले ले कहा नहीं जा सकता है। कोविट 19 इसका एक बेहतरीन उदहारण माना जा सकता है। इस लिहाज से अब इस तरह के जोखिम से निपटने के साथ ही साथ बीमा के क्षेत्र को और वृहद बनाए जाने की महती जरूरत महसूस की जा रही है। अब समय आ गया है कि वैश्विक व्यापार में संरचनात्मक बदलाव की बात सोची जाए। इतना ही नहीं अब फोर्स मेजर के अंतर्गत संस्थागत, देश को देखते हुए इसके दायित्वों में बदलाव की भी जरूरत महसूस की जा रही है।
कोविट 19 के कारण अनेक तरह का कच्चा माल भारत में आयात नहीं हो पा रहा है। इसका असर भारत की अर्थ व्यवस्था पर निश्चित तौर पर पड़ेगा। अब समय आ चुका है कि भारत सरकार फोर्स मेजर के कारण उपजी रिक्तता को भरने के लिए भारत में कच्चा माल तैयार करने के मार्ग प्रशस्त करे। कोरोना वायरस ने चुनौतियां तो अपरंपार पैदा की हैं, पर इसके चलते भारत को अब अवसर भी मिलते दिख रहे हैं।
एक समय था जब भारत में कुटीर उद्योगों की भरमार थी। घरों घर कच्चा माल तैयार किया जाता था। समय बदला और कुटीर उद्योग इतिहास में शामिल होते चले गए। बुंदेलखण्ड में घरों घर बिड़ी बनाई जाती थी तो वनोपज को आदिवासी एकत्र कर उनको बेचा करते थे। आज मशीनी युग में इस तरह के सारे काम धीरे धीरे समाप्त ही हो गए हैं।
स्वदेशी उत्पादन के मामले में विश्व में 190 देशों की सूची में भारत का स्थान 63वां है। निजि क्षेत्रों को जिस तरह की रियायत सरकारों के द्वारा जिन शर्तों पर दी जाती है, उन शर्तों का पालन निजि क्षेत्र की कंपनियां नहीं करती हैं। यही कारण है कि देश में बेरोजगारी का ग्राफ तेजी से बढ़ता जा रहा है।
यह सही समय है इस समय का सदुपयोग भारत सरकार को करना चाहिए। मेक इन इंडिया के लिए निश्चित तौर पर यह एक बहुत बड़ा अवसर है। इसके लिए भारत सरकार को होमवर्क करते हुए कार्ययोजना बनाना चाहिए। वैसे भी स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और प्रदेश सरकारों के द्वारा समय समय पर वायदे भी किए जाते रहे हैं। इसके लिए भारत सरकार और सूबाई सरकारों को बाकायदा प्रशिक्षण शिविर आयोजित कर कच्चा माल तैयार करने के लिए सब्सीडी सहित अन्य दीगर सहुलियतें अगर लोगों को दी जाती हैं तो ग्रामीण भारत को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाया जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो भारत के आने वाले कल की तस्वीर ही कुछ ओर होगी।

लेखक
 (लिमटी खरे)
 (लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

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