शक्लो-सूरत में दस हजार वर्षों में कितना बदल गया इंसान


शक्लो-सूरत में दस हजार वर्षों में कितना बदल गया इंसान

शक्लो-सूरत में दस हजार वर्षों में कितना बदल गया इंसान

o ललित गर्ग o

इंसान बदल रहा है, अभी तक यह एक तरह का जुमला था जिसे आध्यात्मिक मुलम्मे में यह कहकर प्रस्तुत किया जाता था कि देख भगवान, तेरे रचे संसार का इंसान कितना बदल गया है। इंसान के बदलने का एक क्रमिक दौर रहा है और यह एक बड़ा सत्य भी है जिसे अध्यात्म के स्तर पर बार-बार उद्घोषित किया जाता रहा है लेकिन हाल ही में विज्ञान ने भी माना है कि मनुष्य बदल रहा है, यानि मनुष्य की शक्लो-सूरत में पिछले दस हजार वर्षों में काफी तब्दीलियां आई हैं। अपने पूर्वजों के मुकाबले आज मनुष्य का सिर और चेहरा तकरीबन 30 प्रतिशत सिकुड़ गया है। भले ही हमारी सूरत बदले, लेकिन सीरत भी बदले, हम अधिक पवित्र, सौहार्दपूर्ण एवं मानवीय हो, ताकि हमारा जीवन शांत, अहिंसक एवं आदर्श हो।


 वैज्ञानिकों के अनुसार इस बदलाव की जड़ हमारे खान-पान में है। मनुष्य का भोजन बीते 10 हजार सालों में इस तरह बदला है कि वह चबाने के मामले में पहले के मुकाबले आसान यानि मुलायम हो गया है। इससे हमारे दांतों, जबड़ों और अन्य मांसपेशियों का श्रम घटा और विकासवाद के सिद्धांत के अनुरूप ही उपयोगिता कम होने से अंग विशेष या तो पूरी तरह खत्म हो जाते हैं या उनका आकार आदि कम हो जाता है। विज्ञान के इस शोधपरक निष्कर्ष से यह तो स्पष्ट हो गया है कि इंसान की मुख मुद्रा बदल रही है। लेकिन यहाँ मुख मुद्रा के साथ-साथ इंसान के बदलने की भी क्रमबद्ध श्रृंखला रही है। इंसान के बदलने का अर्थ है उसका व्यवहार बदलना। उसकी नैतिकता और मानवीयता के धरातल का बदलना। जैसे मुख मुद्रा बदलने से इंसान अच्छा या बुरा दिखाई देता है वैसे ही उसके व्यवहार के बदलने से वह अच्छा या बुरा दिखने लगता है, यह एक बड़ा सत्य है। यही परिवर्तनशीलता शाश्वत सत्य भी है।

समय की परिवर्तनशीलता से कौन परिचित नहीं है? देखते-देखते समय के तेवर बदलते नज़र आते हैं। बदलते समय के साथ इंसान को भी बदलते हुए देखा है। यही कारण है कि किसी समय जो विचार समाज के लिए आदर्श कहे जाते थे, वे समय बदलने पर उपेक्षित कर दिये जाते हैं। प्रायः लोग यही कहते सुने जाते हैं -अब ‘‘वे बातें कहां! समय ही बदल गया! इंसान ही बदल गया! और अब इंसान की मुख आकृति ही बदल गयी! इसका अभिप्राय यह हुआ कि सब कुछ बदलता रहता है परंतु एक वस्तु, भाव, विचार ऐसा है जो कभी नहीं बदलता। वह है-सत्य।

किसी मुहावरे में कहा गया है कि सांच को आंच नहीं। जहाँ सत्य है वहां आंच अर्थात् अग्नि नहीं। शायद यह मुहावरा प्रह्लाद के समय से प्रचलन में आया होगा क्योंकि प्रह्लाद सत्य के मार्ग पर था। इसलिए होलिका अग्नि में जल गई परंतु प्रह्लाद पर आंच नहीं आई या यूं कहे एक तरह से सत्य पर आंच नहीं आई। लेकिन सत्य पर दृढ़ रहने के लिए उसे जो कष्ट मिलें, यातनाएं सहनी पड़ी, उसे भोगना सहज और सरल नहीं है। यही कारण रहा है कि सत्य को तप कहा गया है।

इंसान अपनी इंसानियत पर कायम रहे, सत्य पर अडिग रहे इसके लिए उसको ताप सहना पड़ता है। सत्य का यह ताप इंसान को बदलता है, निखारता है, उन्नत बनाता है एवं उज्ज्वल करता है। बंद कमरे के खिड़की दरवाजों को खोलना आसान है। पर झूठ और भ्रम की सांकल से बंद मन की खिड़कियों को खोलना उतना ही मुश्किल। इसलिए भी कि हम उनसे मिल रहे लाभ को नहीं छोड़ना चाहते और फिर परेशान होते रहते हैं। लेखक और जैव रसायन विज्ञानी आइजैक असिमोव कहते हैं, ‘हमारी सोच दुनिया दिखाने वाली खिड़कियां है। उन्हें साफ करते रहें, वरना रोशनी नहीं आ पाएगी।’

आज का समय ऐसा है कि इसमें इंसान सत्य की आंच को सहने की क्षमता खो रहा है या सत्य की आंच को सहने में संकोच करता है। एक हत्यारा हत्या करके भी गीता की पुस्तक पर हाथ रखकर कसम खाता है और हत्या स्वीकार नहीं करता जबकि सब जानते हैं कि वह हत्यारा है। ऐसे इंसान की मुख मुद्रा और इंसानियत दोनों ही मिनटों में बदल जाती है। उन्हें बदलने के लिए 10 हजार साल जितना लंबा सफर तय करने की जरूरत नहीं होती  आज ऐसे इंसानों की बहुतायत है जो हर क्षण बदलते हैं न केवल वे बदलते हैं बल्कि उनकी मुख मुद्रा बदलती है, इंसानियत बदलती है। न जाने वे कितने मुखौटे अच्छी भली मुखाकृति पर ओढ़ लेते हैं।

संसार द्वंद्व इसलिए कहा गया है क्योंकि सत्य और असत्य का द्वंद्वात्मक मिश्रण ही जगत का आधार है। कभी सत्य की प्रतिष्ठा होती है तो वह युग सतयुग नाम से जाना जाता है। वहां सत्य का प्रतिशत सर्वाधिक होता है। धीरे-धीरे मनुष्य का जीवन हृदय की अपेक्षा बुद्धि की ओर झुकता चला जाता है। जब हृदय की मात्रा कम और बुद्धि की मात्रा अधिक होती है तब कलियुग का प्रारंभ होता है। बुद्धि तर्काश्रित होती है। दया-धर्म, दान, करुणा, मैत्री, अहिंसा आदि गुण हृदयजन्य है। बुद्धि तर्क करती है, तर्क स्वार्थ प्रेरित होता है। आज का युग इसी स्वार्थ चेतना से पीड़ित है।

भौतिकता के इस युग में लोग कहते हैं, ‘सत्य का आज मूल्य क्या है? सत्यवादी भूखे मरते हैं, झूठ बोलने वाले फलते-फूलते हैं। देखते नहीं, जो सत्य के मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे सदा दुःखी रहते हैं। इसके विपरीत कदाचारी चैन की जिन्दगी बिताते हैं।’ यह बात उन लोगों के लिए सत्य है, जो अत्याचारी हैं, जो भौतिक उपलब्धियों को ही सब कुछ मानते हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि अंत समय जब उनकी भी निगाह उनके दुष्कृत्यों पर जाती है, तो उनका हृदय चीत्कार कर उठता है। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

कुछ लोग पूछते हैं, सत्य की परिभाषा क्या है? उन्हें यह प्रश्न स्वयं अपने से पूछना चाहिए। इसका उत्तर देने वाला उनके भीतर बैठा है। जब व्यक्ति सच बोलता है तो उसे एक प्रकार के आनंद की अनुभूति होती है, लेकिन जब वह झूठ बोलता है तो उसे बेचैनी होती है, पर अपने क्षुद्र स्वार्थ के कारण वह उस बेचैनी की चिंता नहीं करता। यों भी कहा जा सकता है कि प्रत्येक व्यक्ति के अंतर में सद् और असद् दोनों विद्यमान होते हैं। सद् सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, असद् असत्य के मार्ग पर चलने की। व्यक्ति की बुद्धि उसे बताती रहती है कि सत्य क्या है और असत्य क्या है।

कुछ वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि 10 हजार वर्ष पहले प्रत्येक इंसान के मुंह में अक्लदाढ़ कही जाने वाली दाढ़ हुआ करती थी, पर अब वह भी दो मनुष्य में से एक में उगती है यही कारण है कि अक्ल के बिना सत्य को परखने की क्षमता भी हम खोते जा रहे हैं। वैज्ञानिकों की घोषणा यह भी है कि इंसान का चेहरा आगे भी बदलेगा। हो सकता है कि तब हमारे चेहरों में कोई तकनीकी सौन्दर्य दिखाई दे। यह भी हो सकता है कि बाद के शोध साबित करे कि चूंकि 21वीं सदी के इंसान ने मुद्रा (धन) देखकर मुद्रा  (आकृति) बदलनी शुरू कर दी थी, इसलिए 25वीं सदी का इंसान कुछ-कुछ डालर, येन या रुपयेनुमा दिखे।

सौन्दर्य हमारा स्वभाव है, विभाव नहीं। सौन्दर्य जब भी निखरता है हमारा आभामंडल पवित्र बनता है। आभामंडल की शुद्धता और दीप्ति शरीर और मन का सौन्दर्य है। इसलिए पवित्र आभामंडल चेतना के ऊध्र्वारोहण का संवाहक है। आगम की भाषा में वह व्यक्ति सुन्दर है जो व्यवहार से विनम्र है, जिसकी इन्द्रियां नियंत्रित हैं, जो प्रशांत हैं, जो सहिष्णु हैं, जो मितभाषी हैं। हमारा बदलाव या परिवर्तन कुछ इसी तरह के सौन्दर्य के लिए हों, यह अधिक उपयोगी एवं प्रासंगिक लगता है।

हम संकल्प के साथ पवित्रता की साधना शुरू करें कि मन, भाषा, कर्म के सौन्दर्य को निखारने में हम निष्ठाशील बनेंगे, जागरूक बनेंगे और पुरुषार्थी बनेंगे। न केवल हमारी सूरत बल्कि सीरत भी उज्ज्वल होगी, पवित्र होगी और अधिक मानवीय होगी। ऐसा होने पर ही हमारा चाहे मुखमंडल बदले या हम स्वयं बदले, वह सार्थक होगा।


प्रेषक:
(ललित गर्ग)
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