बैंकिंग क्षेत्र की निगरानी की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह


बैंकिंग क्षेत्र की निगरानी की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह 



दुलीचंद कालीरमन


हाल ही में यस बैंक का मामला उजागर हुआ है। जिससे बैंकों और वित्तीय संस्थानों के प्रति आमजन का भरोसा एक बार फिर हिल गया है। अभी तक हम सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की अक्षमता का ही रोना रोते थे, लेकिन अब निजी क्षेत्र के बैंक की ऐसी स्थिति अर्थव्यवस्था का एक चिंतनीय पहलू है।

 यस बैंक के प्रमोटर राणा कपूर को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने गिरफ्तार कर लिया है। उनकी तीनों बेटियों, पत्नी के खिलाफ भी जांच जारी है। नित नए खुलासे हो रहे हैं। कपूर परिवार नें दर्जनों फर्जी कंपनियों के माध्यम से कैसे गबन किया उसके समाचार छप रहे हैं। यह एक गंभीर स्थिति है जब कोई जनता के भरोसे को महज अपने स्वार्थ की बलि चढ़ा दें। अगर  एक बैंकर ही देश की अर्थव्यवस्था में पलीता लगने का कार्य करें तो यह बैंकिंग अनैतिकता की पराकाष्ठा होगी।

 अमूमन हर बैंक या वित्तीय संस्थान प्रत्येक तिमाही में अपनी वित्तीय रिपोर्ट प्रस्तुत करता है। इस रिपोर्ट को देश के बड़े-बड़े ऑडिटर जांचते हैं। इस जांच रिपोर्ट की एक प्रति रिजर्व बैंक या बैंकिंग मामलों के विभाग, जो वित्त मंत्रालय के अधीन कार्य करता है, उसमें भी जाती होगी। वहां पर इन रिपोर्टों को क्या सिर्फ फाइलों में बांधकर रख दिया जाता है? या फिर कोई निगरानी तंत्र भी इसके प्रति जवाबदेह है?

जब-जब बैंकिंग क्षेत्र या वित्त क्षेत्र से इस प्रकार की नकारात्मक खबरें आती हैं तो इसका तथ्यात्मक जवाब देने की बजाय सरकारें और राजनीतिक दल पिछली सरकारों के सिर पर ठीकरा फोड़ने की कोशिश करने लगते हैं। यस बैंक के मामले में भी यही हुआ। बैंक के देनदारों में अनिल अंबानी, सुभाष चंद्रा की कंपनी एस्सेल, वोडाफोन, हाउसिंग क्षेत्र की कंपनी डीएचएफएल तथा दिवालिया हो चुकी सार्वजनिक क्षेत्र की आईएफएंडएफएस (IF&FS) शामिल है।

 मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल के दौरान 2018 में बैंकों की वास्तविक वित्तीय स्थिति जानने के लिए मुहिम चलाई गई थी। इस दौरान कई प्रकार की वित्तीय अनियमितताएं सामने आई। यस बैंक की कमजोर वित्तीय स्थिति का कुछ पूर्वानुमान भी उस समय हो गया था। लेकिन रिजर्व बैंक में यस बैंक के प्रमोटर राणा कपूर को पैसा जुटाने के लिए पर्याप्त समय दिया। लेकिन वह असफल रहा। कुछ निवेशकों और जमा कर्ताओं को इस स्थिति का आभास हो गया था। जिन्होंने अपनी रकम को बैंक से निकाल लिया। लेकिन जिन कर्मचारियों के वेतन में के खाते यस बैंक में थे उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। कुछ सरकारी विभागों, परियोजनाओं के खाते भी यस बैंक में थे। पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर तथा इस्कॉन के खातों में भी बड़ी रकम फंस गई है।

 ऐसे समय में जब वैश्विक मंदी पैर पसार चुकी है। भारत की विकास दर भी निरंतर गिर रही है। कोरोना वायरस के प्रभाव से दुनिया भर के शेयर बाजार चारों खाने चित हो रहे हैं। सभी प्रकार की अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक तथा आवागमन की सुविधाएं वैश्विक स्तर पर ठहर सी गई है। इससे आने वाले दिनों में वित्तीय क्षेत्र में और भी संकट मंडरा सकता है। वित्तीय क्षेत्र की एक छोटी सी नकारात्मक खबर भी निवेशकों के भरोसे ठिकाने के लिए काफी है। पहले पंजाब नेशनल बैंक में नीरव मोदी की जालसाजी, मुंबई के पीएमसी बैंक का मामला हो या फिर आईडीबीआई बैंक तथा अब यस बैंक की अक्षमता यह बताने के लिए काफी है कि एक कठोर निगरानी तंत्र खड़ा करने की आवश्यकता है।

 यस बैंक को बचाने के लिए या निवेश के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भारतीय स्टेट बैंक ने 2450 करोड रुपए की योजना तैयार की है। आईसीआईसीआई बैंक में भी येस बैंक में निवेश की रुचि दिखाई है। यहां यह प्रश्न भी विचारणीय है कि क्या भारतीय स्टेट बैंक का यह फैसला वाणिज्यिक दृष्टि से लिया गया है या फिर सरकारी दबाव के कारण? कहीं ऐसा तो नहीं कि आम नागरिक के टैक्स तथा जमा रकम को एक निजी बैंक को बचाने के लिए दांव पर लगा दिया गया हो?  इससे पहले भी आईडीबीआई बैंक की खेवनहार भारतीय जीवन बीमा निगम बना था।

 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय की प्रक्रिया भी चल रही है। इससे न केवल एक बैंकिंग क्षेत्र की तस्वीर साफ हो सकेगी बल्कि निगरानी तंत्र को भी सहूलियत होगी। जिससे रिजर्व बैंक बैंकों के दैनिक कामकाज पर पैनी निगाह रख सकता है। आज सूचना तकनीक के युग में एक आम आदमी भी यह जानता है कि किसी भी वित्तीय संस्थान की रियल टाइम रिपोर्ट रिजर्व बैंक द्वारा देखी जा सकती है। प्रतिदिन की जमा तथा अधिशेष का विवरण दैनिक आधार पर देखा समझा जा सकता है। देश की बैंकिंग व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने की जिम्मेदारी खुद बैंकों की है। लेकिन रिजर्व बैंक तथा वित्त मंत्रालय भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।

 बैंकों का एनपीए जिस गति से पिछले दिनों बढ़ा था, वह चिंता का विषय था। अब दिवालिया कानून पास होने तथा प्रक्रिया में सुधार होने से एनपीए की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है। लेकिन निगरानी तंत्र चौकस बनाकर बैंकिंग क्षेत्र में जमाकर्ताओं तथा निवेशकों का भरोसा कायम करने की जरूरत है। अन्यथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का सपना, सपना ही रह जाएगा।


लेखक
दुलीचंद कालीरमन
करनाल
9468409948

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