हरियाणा में फसलों पर कुदरत का कहर और सरकारी प्रयास



हरियाणा में फसलों पर कुदरत का कहर और सरकारी प्रयास


✍ वीरेंद्र सिंह चौहान

सप्ताह भर पहले कृषि विभाग के विशेषज्ञों से बात हुई तो वे हरियाणा के खेतों में लहलहाती गेहूं की फसल को लेकर बहुत आशावान थे। बंपर फसल का अनुमान लगाया जा रहा था। इंद्रदेव प्रसन्न रहें और पीला रतुआ आदि का हमला न हो तो प्रदेश का किसान बेहतरीन उत्पादन के साथ मंडियों में पहुंचेगा, इस बात के कयास लगाए जा रहे थे।

परंतु प्रकृति या परमेश्वर, उसे आप जिस भी नाम से पुकारे, को यह इस रूप में शायद स्वीकार्य नहीं था। बीते कई दिन से राज्य के विभिन्न हिस्सों में बरसात के साथ-साथ तेज हवाएं खेत और किसान की छाती पर कहर बरपा रही हैं। जहां गेहूं की फसल बरसात के साथ आई हवा में गिर गई, वहां किसान के हाथ पल्ले कुछ पड़ने की संभावना नहीं। जहां गिरी नहीं वहां भी अगर वर्षा एक सीमा से ज्यादा हुई तो उत्पादन घटना स्वाभाविक है। निचले इलाकों में जहां से पानी की निकासी सहजता से संभव नहीं, वहां फसल का नुकसान भी अवश्यंभावी है। परिणाम यह है कि हरियाणा के गेहूं उत्पादकों के चेहरे फसल के पकने का पीलापन आने से पहले ही पीले पड़ते देखे जा सकते हैं।

सरकारी मशीनरी इस प्राकृतिक संकट से उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए हरकत में आ चुकी है। जहां से नुकसान की खबरें आ रही हैं वहां विशेष गिरदावरी करवाकर किसानों को मौजूदा योजना के अंतर्गत मुआवजा दिलवाने की प्रतिबद्धता कृषि मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक सबने अपने अपने ढंग से दोहरा दी है। यह मुआवजा उन किसानों के लिए होगा जिनकी फसल बीमित नहीं है। प्रति एकड़ अधिकतम अर्थात शत-प्रतिशत खराबे की सूरत में ₹12000 की राहत या मुआवजा राशि किसान को मिल सकेगी।

इस प्रक्रिया में गिरदावरी का सही ढंग से होना सुनिश्चित करना पड़ेगा। हरियाणा में 2014 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनते ही फसल ओलावृष्टि से खराब हुई थी। राज्य सरकार में लगभग ₹ 11 सौ करोड़ का मुआवजा इसी योजना के तहत किसानों के खाते में पहुंचाया था। यह आंकड़ा कई मायनों में ऐतिहासिक था। लेकिन इतनी बड़ी राहत राशि किसान के खाते में पहुंचने के बाद भी राज्य के विभिन्न हिस्सों से यह शिकायत सुनने को मिली थी कि गिरदावरी करने वाले सरकारी कर्मचारियों ने अनेक स्थानों पर गड़बड़झाला किया। किसानों से घूस लेकर जिनकी फसल खराब नहीं हुई थी उनकी फसल खराब होना दर्शा दिया था और ऐसे लोग जिन्होंने यह हथकंडा अपनाने से इंकार कर दिया उन्हें खराबी के बावजूद कागजी कार्यवाही में हेरफेर कर राहत के उनके अधिकार से वंचित कर दिया गया था। ऐसा होने से रोकने के लिए उस समय भी सरकार की ओर से चौकसी बरती गई थी । मगर केवल सरकारी निगरानी धरातल पर होने वाले इस भ्रष्टाचार को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है।

गिरदावरी की प्रक्रिया चरणबद्ध ढंग से अधिक से अधिक पारदर्शी और भ्रष्टाचार रहित बने, इसके प्रयास आवश्यक हैं। साथ ही गांव के स्तर पर सामाजिक निगरानी या चौकसी का सिलसिला भी तो शुरू करना होगा। हर गांव में ऐसे जागरूक और ऊर्जावान युवाओं व वरिष्ठ किसानों के स्वयंसेवी समूह अस्तित्व में आने चाहिए जो गिरदावरी की प्रक्रिया में शामिल होने वाले सरकारी कर्मचारियों को दो टूक शब्दों में इस बात का एहसास करा दें कि उन्हें किसी भी सूरत में गलत काम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। जहां कहीं से गड़बड़ी के संकेत अथवा सूचना मिले, उसे विभिन्न माध्यमों से आला अधिकारियों और धुर कृषि मंत्री व मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचाने के लिए ईमेल से लेकर ट्विटर तक विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल किया जाए। हर गांव में यह माहौल बने कि जिसका जो अधिकार है उसे वह हर हाल में दिलवाया जाएगा और जो बेईमानी की डगर पर चलेगा उसे बेनकाब कर दंडित कराने में भी संकोच नहीं किया जाएगा। ग्रामवासियों की ओर से इस प्रकार की पहल होने पर संबंधित सरकारी विभाग भी उतनी ही ऊर्जा के साथ बेईमानी करने वालों की जवाबदेही कानूनी तौर पर तय करना सुनिश्चित करें तो व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन स्वाभाविक रूप से लाया जा सकता है।

फसल खराबे से जुड़ा हुआ दूसरा बड़ा पक्ष है उन किसानों का जिन्होंने अपनी फसल का बीमा कराया है। अगर उनका नुकसान फसल बीमा योजना के भरपाई के नियमों के दायरे में आता है तो उन्हें बिना बीमा वाले किसानों से कहीं अधिक राहत राशि मिलना तय है। प्रति एकड़ फसल पूरी तरह खराब होने पर गैर बीमित फसल की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा राहत के वे कानूनी हकदार हैं। मगर चोकसी और पहरेदारी के अभाव में बीमित फसल वाले किसान भी अपने हक से वंचित रह सकते हैं। नियम कहते हैं कि बरसात से होने वाली हानि की सूरत में बरसात होने के 72 घंटे के भीतर निर्धारित प्रपत्र पर कृषि विभाग को नुकसान की सूचना देना किसान की जिम्मेदारी है। ऐसे अनेक किसान हो सकते हैं जो समय बद्ध ढंग से अपने नुकसान की सूचना संबंधित कार्यालय में देने से चूक जाएं। इस चूकने का अर्थ है बीमा राशि से वंचित होना। सूचना देने की असफलता का कोई बहाना बीमा कंपनियां स्वीकार नहीं करेंगी। इस मामले में भी किसान की अपनी सतर्कता बहुत महत्वपूर्ण है। सरकारी अधिकारी व कर्मचारी किसानों को जागरूक करने के लिए प्रयासरत तो हैं मगर जागरूकता का लक्ष्य प्राप्त कर लिया गया है, यह कहना कठिन है। जागरूक ग्रामीणों के समूह अपने अपने गांव में अन्य किसानों को भी इस संबंध में जागरूक करें तो किसानों के हितों की अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से पैरवी और रक्षा की जा सकती है।

फसल बीमा योजना के अंतर्गत किसानों को मिलने वाली भरपाई की अदायगी में बीमा कंपनियां जटिलताएं पैदा न करें, यह सुनिश्चित करने का कार्य सरकार के कृषि एवं कृषक कल्याण विभाग के अधिकारियों का है। बीते वर्षों के दौरान यह देखने में आया है कि जहां किसान को भरपाई न मिलने के कारण एक-एक पल काटना मुश्किल हो जाता है, उसके अधिकार की लड़ाई सरकारी दस्तावेजों की कछुआ चाल या मंथर गति में उलझ कर रह जाती है। प्रकृति की मार झेल रहे किसान को विभागीय कार्यालयों के चक्कर काटने से हर हाल में बचाया जाना चाहिए।


लेखक

✍ वीरेंद्र सिंह चौहान
(लेखक ग्रामोदय अभियान के संयोजक और हरियाणा ग्रन्थ अकादमी के उपाध्यक्ष हैं)

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