डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान की कविता - अरुणोदय

अरुणोदय


अरुणोदय


घर के आंगन में अरुणोदय,
जीवन में, मन में अरुणोदय।

अरुणोदय चिंतन सरिता में
अरुणोदय सुर व कविता में। 

तम से भिड़ जाना अरुणोदय
ग़म को पी जाना अरुणोदय।

अरुणोदय सहज उदित होना
अरुणोदय सहज मुदित होना। 

नित की नूतनता अरुणोदय,
चित की चेतनता अरुणोदय।

अरुणोदय शत्रु मलिनता का
अरुणोदय हरण दीनता का।

   
 
डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान

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